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झारखण्ड: ‘निमित्त’ ने साथ रह रहे 132 गैर शादी शुदा जोड़ों का सामूहिक विवाह कराया

तर्कसंगत

Image Credits: Times Of India

January 16, 2019

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भारत जैसे देश में, शादी सिर्फ दो परिवारों के एक साथ होने का उत्सव नहीं है, बल्कि एक स्टेटस सिंबल भी है – जितना खर्चीला उतना अच्छा.  हालांकि, भारत में कुछ ऐसे समुदाय भी हैं जो शादी का खर्च नहीं उठा सकते. शायद इसलिए वह बिना शादी के साथ रहते हैं.

 

132 जोड़ों ने ब्याह रचाई

झारखंड की रमेश गोप और मनोनित केरकेट्टा, पिछले 14 वर्षों से एक साथ रह रहे हैं और अंत में 15 जनवरी को शादी कर के समाज द्वारा स्वीकृति प्राप्त का चुके हैं, ये दंपति एक आदिवासी समुदाय से हैं और उनके दो बेटे और एक बेटी है. कोल इंडिया लिमिटेड (CIA), पंजाब नेशनल बैंक और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) के सहयोग से, रांची में स्थित एक गैर-सरकारी संगठन, ‘निमित्त’ इस जोड़े को शादी के बंधन में बांधने में सफल रहा. झारखंड के विभिन्न जिलों रांची, खुंटी और गुमला से 131 अन्य जोड़े रांची के IAS क्लब में एक सामूहिक विवाह में शादी के बंधन में बंधें जिससे इन जोड़ों को नयी ज़िन्दगी मिली.

झारखंड के आदिवासी समुदाय में, पुरुष और महिला अपने जीवन साथी का चयन कर सकते हैं और बिना किसी वैवाहिक स्थिति के साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं. उनकी परंपरा में, इस प्रक्रिया को ढुकुआ विवाह कहा जाता है और महिला को ‘ढूकुनी’ कहा जाता है. चूँकि समाज में उन्हें पति पत्नी के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं हैं, इस कारण से इस विवाह में महिला और उनके बच्चों को पति के संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है. कथित तौर पर, यह प्रथा झारखंड के ओरांव, मुंडा और हो आदिवासियों के बीच आम है.

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए रमेश गोप ने कहा, “मेरी पत्नी और मैं एक जाति से नहीं हैं, इसलिए हमें में दावत देने की जरूरत है, जिसकी लागत लगभग 1.5 लाख होगी, इसके बाद समाज हमें  एक विवाहित जोड़े के रूप में मान्यता देगा. चूंकि मेरी आय बहुत कम है, हम दावत देने की स्थिति में नहीं हैं और इसलिए हमें कोई कानूनी अधिकार नहीं मिला है.

निकिता सिन्हा, एनजीओ की सचिव ने द टाइम्स ऑफ इंडिया को कहा “हमने 2016 से ऐसे जोड़ों के लिए सामूहिक विवाह करनी की प्रक्रिया शुरू की है. मुझे तीन साल पहले खूंटी की अपनी यात्रा से ‘ढुकुआ  शादी के बारे में पता चला. 2016 से हमने चौसठ जोड़ों को शादी कराने और समाज में वैवाहिक स्थिति हासिल कराने में मदद की है.”

उन्होंने कहा कि इस साल, 76 सारण जोड़े, 36 हिंदू जोड़े और खूंटी और गुमला जिले के 20 ईसाई जोड़ों का विवाह हुआ है, “विचार यह है कि जोड़ों को आधिकारिक तौर पर समाज में पति-पत्नी के रूप में मान्यता दिलाई जाए. दंपति को विवाह पंजीकरण दस्तावेज भी प्रदान किया जाएगा. कथित तौर पर, इस साल शादी करने वाले जोड़ों की संख्या तीन साल पहले की तुलना में तेजी से बढ़ी. इसके अलावा, प्रत्येक जोड़े को कम से कम 10 मेहमानों को बुलाने की अनुमति दी गई थी, इस प्रकार एक दावत आयोजित करने की उनकी ज़रूरत को भी पूरा किया गया.

 

तर्कसंगत का पक्ष

कहा जाता है कि शादियां स्वर्ग में तय होती है, लेकिन हमारे देश में कभी-कभी धर्म, जाती और प्रेम के कारण शादी का अंजाम अच्छा नहीं होता. ऐसे परिदृश्य में इन जोड़ों को शादी करने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें एकजुट करना एक बहुत ही सराहनीय प्रयास है. इन जोड़ों को अब पति और पत्नी के रूप में कानूनन जीने का नया मौका मिलेगा जो हमारे देश में किसी भी वयस्क के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. तर्कसंगत ‘निमित्त’ के प्रयासों की सराहना करता है और उम्मीद करता है कि ये हमारे समाज की सोच में सकारात्मक परिवर्तन लाएगा.

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