पर्यावरण

रिपोर्ट: अंटार्टिका के बर्फ 80 के दशक के मुक़ाबले 6 गुना तेज़ी से पिघल रहे हैं, तटीय क्षेत्र के शहर ख़तरे में

तर्कसंगत

January 17, 2019

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एक अध्ययन से पता चला है कि अंटार्कटिका में ग्लेशियर 1980 के दशक के मुक़ाबले छह गुना अधिक तेजी से पिघल रहे हैं. प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित अध्ययन से पता चला है कि 1979 से 2017 तक अंटार्कटिक बर्फ के पिघलने से वैश्विक समुद्र का स्तर 1.4 सेंटीमीटर से अधिक बढ़ गया है. अध्ययन से पता चला है कि जो क्षेत्र अपेक्षाकृत स्थिर थे और परिवर्तन के प्रतिरोधी थे, वे भी नाटकीय रूप से बर्फ खो रहे हैं. यह मानव के कारण हुए जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख संकेत है.

 

जलवायु परिवर्तन का विरोध करने वाले क्षेत्र पिघल रहे हैं

अध्ययन में एक बयान में उल्लेख किया गया है कि ग्लेशियर द्वारा बड़े पैमाने पर नुकसान उन क्षेत्रों में हो रहा है जो गर्म, नमकीन, उपसतह परिधीय गहरे पानी के करीब हैं. इनमें पूर्वी अंटार्कटिका शामिल है जो कथित तौर पर पूरी अवधि में समुद्र के बढ़ते सजलस्तर का प्रमुख कारण है. अध्ययन में एक बयान में कहा गया है कि एक ही सेक्टर के अंटार्कटिका में दशकों से समुद्र के स्तर में वृद्धि होने की संभावना है. पिछली रिपोर्टों से पता चला है कि पूर्वी अंटार्कटिका के तरफ जलवायु परिवर्तन का असर कम था और मेल्टडाउन केवल पश्चिमी तरफ देखा गया था. हालांकि, पूर्व अंटार्कटिक के बर्फ की चादर पिघलने के कारण समुद्र का स्तर बढ़ रहा है. अनुमान है कि इस क्षेत्र में एक साल में 56 बिलियन टन बर्फ की कमी हो रही है. 14 जनवरी, 2019 को जारी की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि अंटार्कटिका ने 2009-2017 के दौरान हर साल 252 बिलियन टन बर्फ खो दी. 1979-1990 से खोई बर्फ का औसत आंकड़ा काफी कम था, जिसे 40 बिलियन टन माना गया.

 

समुद्र के स्तर में वृद्धि से तटीय क्षेत्रों पर खतरा मंडरा रहा है

वैज्ञानिकों ने कहा है कि अंटार्कटिका के ग्लेशियरों के पिघलने से जलस्तर बढ़ा है जो पिछले 40 वर्षों में समुद्र के 13.2 मिलीमीटर के बराबर है. अध्ययन के प्रमुख लेखक एरिक रिग्नोट ने कहा कि पूर्वी अंटार्कटिका के ग्लेशियरों का पिघलना परेशान करने वाला है क्योंकि इससे अगली शताब्दी में समुद्र के स्तर में 10 फीट से अधिक की वृद्धि होगी. कई अध्ययनों से पता चला है कि पिछली सदी में वैश्विक समुद्र का स्तर 8 इंच तक बढ़ गया है. बांग्लादेश, फ्लोरिडा, शंघाई और लंदन जैसे तटीय क्षेत्र खतरे में हैं.

 

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