मेरी कहानी

मुझे 2009 में पता चला कि मुझे स्टेज 3 कैंसर है, मैं ज़िन्दगी जीने के लिए जीती हूँ न कि नाम के लिए

तर्कसंगत

Image Credits: Humans Of India/Ruby Ahluwalia

January 17, 2019

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मुझे 2009 में पता चला कि मुझे स्टेज 3 कैंसर है. मैंने सोचा ये मेरे साथ नहीं हो सकता, मैं इस चीज़ को मानने से इंकार कर रही थी. उस समय के दौरान मैंने अपने अनुभव को गौर करना शुरु किया. यह मेरे लिए एक आध्यात्मिक क्षण था. मैं समझ गयी थी कि मुझे अपने शारीरिक अनुभव से खुद को कैसे अलग करना है. मैं समझ गयी कि मेरे भीतर शक्ति है जब मैं अपने शरीर से अपने को अलग कर सकती हूँ. इतना ही नहीं मुझे यह भी पता चला कि मैं अपने मन के भाव से अपने शरीर के स्थिति में परिवर्तन ला सकती थी. उस दिन से मैंने अपनी वास्तविकता को स्वीकार कर लिया और कभी भी अपनी शारीरिक स्थिति को मेरी आत्मा को प्रभावित नहीं करने दिया.
मैं समझ गयी कि यद्यपि कैंसर के क्षेत्र में अद्भुत काम हो रहा है, फिर भी मैं उस आदमी की तलाश में थी जो कैंसर के सारे अनुभव मुझे बता सकता हो, मुझे किसी ऐसे व्यक्ति की सख्त जरूरत थी जिसके साथ मैं अपनी चिंताओं को साझा कर सकूं. मैंने पाया कि अधिकांश सामाजिक कार्य सहानुभूति से किये जाते हैं, बिना अधिक ज्ञान के और साथ ही पहचान प्राप्त करने के भावना से. मुझे यह भी पता चला कि अधिकांश लोग कैंसर से लड़ाई हार जाते हैं क्योंकि वे मनोवैज्ञानिक स्तर पर इससे निपटने में सक्षम नहीं होते हैं.

 

एक पुलिस अधिकारी की बेटी होने के नाते मुझे जीवन ने बहुत कुछ सिखाया है और मैंने चुनौतियों का सामना किया है. मैं हमेशा से अपने पिता पर गर्व करती थी. अर्थशास्त्र में मास्टर्स करने और अपनी थीसिस लिखने के बाद मैंने यूपीएससी सिविल सेवाओं की परीक्षा दी और भारतीय रेलवे के साथ काम करना शुरू कर दिया. वर्तमान में मैं केंद्रीय रेलवे के वित्तीय सलाहकार के रूप में काम कर रही हूँ.

 

मुझे 1991 में सबसे खूबसूरत इंसान से शादी करने का सौभाग्य मिला. हम पूरी तरह से अलग हैं, लेकिन हम जीवन के मूल मूल्यों को बाँटते हैं और यात्रा में रुचि रखते हैं और अपने जीवन को सरल रखते हैं. हम पिछले 26 वर्षों में एक साथ बड़े हुए हैं. हम हर गुजरते दिन को प्यार और जीवन के जश्न की तरह मनाते हैं और हमारे लिए हर दिन एक वैलेंटाइन डे की तरह है!
जब मैं कैंसर के अपने उपचार से गुज़र रही थी, तो एक वही थे जो मेरी ताक़त थे, कभी-कभी मैं खुद को उनका ज़रूरत से ज़्यादा समय बर्बाद करने के लिए दोषी मानती हूँ मगर वो कहते हैं कि मेरी देखभाल कर वो अपनेआप को भाग्यशाली मानते हैं.

 
हम चार परिवार हैं और हमारा संजीवनी परिवार भी हजारों लोगों से भरा हुआ है.
इस पूरे सफर में मैं कुछ खूबसूरत लोगों से भी मिली, एक ऐसे व्यक्ति ने मेरे दिल को छुआ जब मैं उनसे मिलने गयी, जब वह कैंसर से गुजर रहे थे, वह शायद ठीक से बोल भी नहीं सकते थे और मुझे नहीं पता था कि मैं उन्हें कुछ राहत कैसे दूँ, जब मैं उनसे कुछ कहने की सोच ही रही थी, उन्होनें मुझसे कहा “कृपया मुझे बताएं कि मैं संजीवनी की मदद कैसे कर सकती हूं?” मैं उनके शब्दों से अभिभूत हो गयी और तब मुझे लगा कि मैं कुछ सही कर रही हूँ. ऐसी घटनाओं ने मेरे संकल्प को और मजबूत किया. भगवान ने मुझे शिक्षित होने और आत्मनिर्भर होने के अवसर देकर बहुत दया की है. मैं खुश रह कर और ख़ुशी फैलाकर इसके लिए धन्यवाद देती हूँ.
मैं हमेशा खुश और खुश रहने के कारणों की तलाश करती हूँ, मैं जीवन जीने के लिए जीवन जीती हूं न कि नाम के लिए. मैं ऐसा कोई जगह बनाना चाहती हूँ जहां कैंसर से बचे लोग अब कैंसर रोगी की सेवा कर सकें. कैंसर से ठीक हुए लोग कैंसर से गुज़र रहे लोगों को हर संभव मदद दे सकते हैं जिससे कि रोगियों को आशा का अनुभव हो न कि जीवन के अंत का. संजीवनी के माध्यम से हम कैंसर से परे जीवन देने में सक्षम हैं!
हमारे रोगियों में से एक ने कहा “कैंसर एक जीवन के लिए खतरनाक बीमारी की तरह लग रहा था और मैं बिखर गया था लेकिन अब मेरी धारणा अलग है. आपको यह अजीब लग सकता है, लेकिन आप जानते हैं कि मुझे हर समय नृत्य करने का मन करता है, बिना किसी कारण के. उस रात मैं खुशी से नहीं सो पायी.

 

 
प्रत्येक अनुभव हमारे जीवन से हो कर गुज़रता है. कैंसर भी उन अनुभवों में से एक है. हमें इसे गुज़र जाने देना चाहिए, हमें इसमें फँस कर नहीं रहना चाहिए, अगर हम इसे अपने मन में जगह नहीं देते हैं, तो शारीरिक स्तर पर भी ये गुज़र जायेगा.
‘संजीवनी- लाइफ बियॉन्ड कैंसर’  भारत में कैंसर के देखभाल के मानक को ऊपर उठाने के लिए प्रतिबद्ध है जहाँ कैंसर के रोगी, कैंसर से ठीक हो चुके रोगी, रोगी के देखभाल करने वाले लोग एक साथ एक जगह पर एक दूसरे के काम आ सकें.

 

कहानी: रूबी अहलूवालिया

 

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