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यूपीएससी परीक्षा विवाद: कम्पेन्सेटरी एटेम्पट की मांग कर रहे छात्र भूख हड़ताल पर बैठे

तर्कसंगत

January 17, 2019

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भारत में लगभग लाखों छात्र, विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के हैं और अपने सपनों की नौकरी पाने के लिए हर साल यूपीएससी परीक्षा देते हैं. उनमें से कई के लिए, यह एकमात्र रास्ता है जिसके माध्यम से वे राष्ट्र की सेवा करते हुए सफेदपोश पदों पर पहुंच सकते हैं. लेकिन जिस निष्पक्षता के साथ चयन की पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया जा रहा है, उसे सवालों के घेरे में खड़ा किया गया है.

परीक्षा पैटर्न में हालिया बदलाव को लेकर मुखर्जी नगर, नई दिल्ली में कई यूपीएससी उम्मीदवारों ने विरोध किया है. पांच छात्र भूख हड़ताल पर हैं जो पैटर्न में अचानक बदलाव के कारण हुए नुकसान के लिए प्रतिपूरक प्रयासों (कम्पेन्सेटरी एटेम्पट) की मांग कर रहे हैं. उन्होंने अपनी वास्तविक मांगों पर ध्यान देने के लिए जंतर-मंतर, नई दिल्ली के बाहर धरना दिया है.

 

 

पृष्टभूमि

2011 से शुरू होने वाले परीक्षा पैटर्न में नए बदलावों के अनुसार, ग्रामीण-क्षेत्रीय पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को नुकसान हुआ है. 2011 में CSAT की शुरुआत के साथ, क्षेत्रीय पृष्ठभूमि से चुने जाने वाले छात्रों की संख्या में भारी कमी आई है. 60वीं यूपीएससी की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2009 में मैन्स परीक्षा के लिए क्वालीफाई करने वालों हिंदी माध्यम के छात्रों का प्रतिशत 42.2% था. हालांकि, 2011 में 62 वीं रिपोर्ट में यह पता चला कि नए CSAT पैटर्न के साथ उनका प्रतिशत घटकर 15% रह गया. 2013 में निगवेकर समिति ने भी यह दावा किया था कि यूपीएससी के परीक्षा पैटर्न में हालिया बदलावों से ग्रामीण अभ्यर्थियों को असुविधा हुई है.

प्रदीप मिश्रा नाम के प्रदर्शनकारी ने तर्कसंगत के साथ बात करते हुए कहा, “2011 में नए शुरू किए गए CSAT ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले उम्मीदवारों के पक्ष में नहीं था. यह उन छात्रों के लिए भेदभावपूर्ण था जिन्होंने हिंदी या किसी क्षेत्रीय भाषा में पेपर का प्रयास किया था. 2013 में, मुख्य परीक्षा के पैटर्न में पूर्ण परिवर्तन हुआ। CSAT पेपर को 2015 में बदलाव किया गया था और हमें पेपर से केवल 90 दिन पहले सूचित किया गया था जिसके कारण हम तैयारी के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला.”

 

 

इस तरह के परिवर्तनों के बाद, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि छात्रों का ग्रामीण-शहरी के बीच का विभाजन व्यापक हो गया है. गैर-तकनीकी पृष्ठभूमि या वंचित वर्गों से संबंधित प्रशासनिक सेवाओं के लिए क्वालीफाई करने वाले छात्रों का प्रतिशत काफी कम हो रहा है. दूसरी ओर, शहरी क्षेत्रों से संबंधित छात्र नए पैटर्न के साथ लाभ में हैं. यूपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के छात्रों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है. इस स्थिति के तहत, ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों द्वारा प्रतिपूरक प्रयासों की मांग उचित लगती है.

शिखा वत्स नाम की एक और प्रदर्शनकारी जो भूख हड़ताल पर हैं, तर्कसंगत के साथ बात करते हुए कहती हैं, “परीक्षा पैटर्न 2011 से अस्थिर है. हर साल, हमें पैटर्न में नए बदलावों का सामना करना पड़ता है और हमने इस अवधि में अपने कीमती प्रयासों को इसके कारण खो दिया है. मैं नए पैटर्न के भेदभावपूर्ण प्रकृति के खिलाफ विरोध करती हूं, जो उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि को संज्ञान में नहीं लेता है. मैं संबंधित अधिकारियों से अपील करना चाहती हूं कि वे परीक्षा पैटर्न में किए गए प्रयोग के बाद कम्पेन्सेटरी एटेम्पट भी करवाएं.”

 

 

बदलाव की मुख्य विशेषताएं

2011: प्रारंभिक चरण में वैकल्पिक पेपर को CSAT पेपर (सिविल सेवा एप्टीट्यूड टेस्ट जीएस पेपर- II के रूप में) की जगह लिया गया था. कोई कम्पेन्सेटरी एटेम्पट नहीं करवाया गया था.

2012: मुख्य परीक्षा के सिलेबस में बदलाव किया गया, जिससे यह सामान्य हो गया कि प्रश्न पैटर्न में पूरी तरह से बदलाव हो जायेगा.

2013: मैन्स परीक्षा को पूरी तरह बदलते हुए एक ऑप्शनल पेपर की जगह दो जनरल स्टडीज के पेपर को परीक्षा में सम्मिलित कर लिया गया और इसके लिए केवल एक नोटिफिकेशन जारी कर सूचित किया गया, जिससे                अभ्यर्थियों को इस बदले पैटर्न के हिसाब से तैयारी करने एक मौका भी नहीं मिला.

2014: CSAT के पेपर में, अंग्रेजी की समझ से प्रश्नों के अंकों को मेरिट ग्रेड  के बाहर रखा गया था और इसकी घोसणा परीक्षा हॉल में की गई.

2015: CSAT (GS पेपर- II) को प्रीलिम्स में मेरिट का आधार नहीं बनाया गया था. इसकी सुचना भी केवल 90 दिन पहले दी गयी थी.

इन सभी हालिया संशोधनों को उम्मीदवारों को पर्याप्त समय प्रदान किए बिना लागू किया गया था. यह उनके लिए बहुत बड़ा नुकसान लेकर आया क्योंकि उन्होंने अपने बहुमूल्य सीमित प्रयासों को खो दिया है जिसके लिए वे वर्षों से तैयारी कर रहे हैं. समय के साथ पैटर्न में हुए और बदलाव प्रतिपूरक प्रयासों के साथ आये.

1979 में जब प्रारंभिक परीक्षा शुरू की गई थी, तब छात्रों को तीन प्रतिपूरक प्रयास दिए गए थे. 1992 में जब निबंध का पेपर शुरू किया गया था, तब भी उम्मीदवारों को पांच साल की छूट के साथ एक प्रतिपूरक प्रयास दिया गया था. उत्तर प्रदेश सरकार और ओडिशा सरकार ने सीएसएटी पैटर्न में बदलाव के लिए राज्य सिविल सेवा परीक्षा 2017 और 2018 में उम्मीदवारों के लिए कम्पेन्सेटरी एटेम्पट दिलवाये थे.

 

 

तर्कसंगत के साथ अपनी शिकायतों को साझा करते हुए, प्रदर्शनकारियों में से एक का कहना है, “हमने अपने मुद्दे के बारे में पत्र, याचिकाओं का मसौदा तैयार किया है और इसे प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा है. हम अपनी स्थिति पर ध्यान देने के लिए मंत्रियों तक भी पहुँच चुके हैं. आज तक, हमें सरकार से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है. अगर हमारी दलीलों को नहीं सुना गया तो सभी ग्रामीण उम्मीदवार पीड़ित होंगे.”

31 दिसंबर, 2018 से भूख हड़ताल पर बैठे प्रदर्शनकारियों को नई दिल्ली के अशोक विहार स्थित दीप चंद बंधु सरकार अस्पताल में भर्ती कराया गया है. वे संबंधित अधिकारियों और मंत्रियों का ध्यान अपनी अपील की ओर खींचना चाहते हैं.

 

 

 

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