मेरी कहानी

मेरी कहानी: उस दिन से मैंने फैसला किया कि मैं किसी भी घायल व्यक्ति को सड़क पर अकेला नहीं छोडूंगा

Kumar Vibhanshu

January 21, 2019

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उस दिन मेरी पत्नी का जन्मदिन था. उसे उसकी माँ के घर पर छोड़कर मैं एजेसी फ्लाईओवर से घर लौट रहा था. अचानक मैंने एक भीड़ देखि जो खड़े हो कर कुछ देख रही थी, मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वे सब के सब खड़े होकर एक आदमी को देख रहे थे जो बुरी तरह से घायल था और खून से लथपथ फ्लाईओवर के एक कोने पर पड़ा हुआ था. मदद के लिए कोई भी व्यक्ति आगे नहीं आ रहा था. रात काफी हो चुकी थी लगभग 11 बजे होंगे. मैंने उस पीड़ित की मदद करने के लिए भीड़ में कुछ लोगों से कहा मगर कोई आगे नहीं आया, मैं बुरी तरह कांप रहा था लेकिन फिर भी मुझे लगा कि सोचने में समय गंवाना नहीं चाहिए. मैं समझ नहीं पा रहा था कि वह जीवित है या मर गया. मैंने कुछ कारों को रोकने की कोशिश की लेकिन किसी ने भी अपनी गाडी नहीं रोकी.

अचानक मैंने एक बीएमडब्लू को आते देखा, जिस पर एक डॉक्टर का लोगो लगा हुआ था, मैंने जबरदस्ती उस कार को रोका लेकिन जब डॉक्टर ने यह कहकर इंकार कर दिया कि “मैं एमेर्जेंसी के मरीज़ नहीं देखता” तो मैं यह सुनकर हैरान रह गया. उस समय मैं डॉक्टर को जवाब देने की स्थिति में नहीं था. मैं असहाय महसूस कर रहा था. बहुत कोशिश के बाद एक सूमो कार रुकी और कार का ड्राइवर मेरी मदद करने के लिए राज़ी हुआ.

मैंने कुछ और लोगों से भी मेरे साथ आने को कहा लेकिन जब मैंने पीछे मुड़कर देखा तो मुझे कोई नहीं दिखाई दिया. ड्राइवर की मदद से हम सफलतापूर्वक उस पीड़ित को नजदीकी पीजी अस्पताल ले गए. पीड़ित बेहोश था और उसकी वजह से हमें उसे उठाने और अस्पताल के अंदर ले जाने में दिक्कत हो रही थी फिर मैंने दौड़ कर वहां खड़े कोलकाता पुलिस अधिकारी से मदद मांगी. मैं उनका बहुत आभारी हूं कि उनकी मदद से हम उस व्यक्ति को आपातकालीन वार्ड में ले जल्दी से ले जा सके.

डॉक्टर ने वहां पहुँचने के साथ उनका इलाज शुरू किया. मैंने उन घायल व्यक्ति का फोन उठाया और उनके परिवार के सदस्यों को सूचित किया,15 मिनट के बाद परिवार के सदस्य और एक डॉक्टर आए जिन्होंने तुरंत और सक्रिय रूप से उनका इलाज चालू किया, कुछ समय बाद मुझे पता चला कि पीड़ित डॉक्टर के पिता थे. कुछ समय बाद डॉक्टर और उनकी पत्नी मेरे पास यह कहते हुए आये कि “मैंने उन्हें सही समय पे ले आया नहीं तो उनकी जान भी जा सकती थी.”

थोड़ी देर बाद भवानीपुर पुलिस स्टेशन का एक अधिकारी प्रभारी मेरे पास आये और दुर्घटना के बारे में पूरी पूछताछ की और पीड़ित की जान बचाने के लिए मुझे बधाई दी और मेरी प्रशंसा की.

उस दिन से मैंने फैसला किया है कि मैं किसी भी घायल व्यक्ति को सड़क पर अकेला नहीं छोड़ूंगा और यथासंभव मदद करने की कोशिश करूंगा.

 

कहानी: नविन श्रीवास्तव

 

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