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उत्तराखंड के ‘वृक्ष मानव’ जिन्होनें 50 लाख पेड़ लगाए, 96 वर्ष में गुज़र गए.

तर्कसंगत

Image Credits: Hindustan Times

January 21, 2019

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वृक्ष मानव (ट्री मैन) के रूप में विख्यात, उत्तराखंड के विश्वेश्वर दत्त सकलानी का शुक्रवार सुबह टिहरी जिले में 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया. उनके परिवार में उनके बेटे और 80 वर्षीय पत्नी हैं. उनके परवारवालों ने  कहा कि पेड़ सकलानी जी के लिए सब कुछ थे, वह हमेशा अपने चेहरे पर एक मुस्कान रखते थे, यहां तक कि 96 साल की उम्र में भी, वह एक पुराने दरख़्त की तरह मजबूत थे.

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया था और एक संरक्षणवादी थे. प्रकृति के प्रति प्रेम उनके जीवन में बहुत पहले ही आ गया था, सकलानी जी ने सिर्फ आठ साल की उम्र में पेड़ लगाना शुरू कर दिया था, और 96 साल की उम्र तक वह पेड़ लगाते रहे, उनके परिवार का कहना है कि उन्होंने अपने जिले में 50 लाख से अधिक पेड़ लगाए.

उनके बेटे, संतोष स्वरूप सकलानी, जो राज्यपाल कार्यालय में काम करते हैं, ने कहा, “एक दशक पहले, उन्होंने अपनी दृष्टि खो दी क्योंकि पेड़ लगाते समय कीचड़ और कंकड़ उनकी आँखों में चले गए. लेकिन, इससे वह डिगे नहीं. यहां तक कि आंखों की रोशनी के बिना, उन्होंने हजारों पेड़ लगाए.”

उन्होंने अपने मूल सकलना गांव में वृक्षारोपण किया, और अपने क्षेत्र को सुंदर बनाने के लिए उन्होंने रोडोडेंड्रोन, अमरूद और कई अन्य चौड़े पत्तों वाले वृक्ष और फलदार वृक्षों का चयन किया था.

जब उन्होंने पहल शुरू की थी,तब वह ज़मीन बंज़र थी अब उसी ज़मीन पर हरे-भरे पेड़ हैं. 1986 में, उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा इंदिरा प्रियदर्शिनी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

 

विरोध का भी सामना किया

सकलानी जी को कभी भी किसी के द्वारा परेशान नहीं किया जा सकता था, शुरू में जब उन्होंने पेड़ लगाना शुरू किया तो उनका विरोध कई स्थानीय लोगों ने किया, जिन्हें विश्वास नहीं था कि वे पर्यावरण के लिए पेड़ लगा रहे हैं. स्थानीय लोगों ने सोचा कि वह पेड़ लगाकर उनकी जमीन पर अतिक्रमण करने की कोशिश कर रहे हैं. हालाँकि, स्थानीय लोगों को प्रकृति के प्रति उनके प्रेम को समझने में कुछ समय लगा और बाद में कई लोगों ने पर्यावरण के संरक्षण के उनके प्रयासों की सराहना की. स्थानीय लोगों का दावा है कि जिले के लोग आने वाले वर्षों के लिए उनके उत्कृष्ट कार्य की सराहना करेंगे.

1958 में, सकलानी ने अपनी पहली पत्नी को खो दिया, जिसके बाद उन्होंने भगवती देवी से शादी की, जिन्होंने वर्षों तक पेड़ों के प्रति उनके जुनून का समर्थन किया. “पेड़ उनके लिए सब कुछ थे, वह कहते थे, पेड़ मेरे परिवार, मेरे माता-पिता, मेरे दोस्त और मेरी दुनिया हैं। उन्होंने दुनिया को देखने की इच्छा नहीं जताई क्योंकि उनके लिए हर पेड़ अपनी एक दुनिया थी.” भगवती जी ने कहा.

वर्षों तक सकलानी जी ने अपने जिले में पेड़ लगाए, और जिस क्षेत्र में उन्होंने लाखों पेड़ लगाए, उसका नाम अब उनके बड़े भाई-नागेंद्र दत्त सकलानी वन के नाम पर रखा गया है, जो एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे. 1948 में टिहरी के शासक के खिलाफ विद्रोह करने में उनके भाई नागेंद्र की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका थी और उनके विद्रोह ने टिहरी राज्य को भारतीय संघ में विलय करा दिया.

 

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