मेरी कहानी

मेरी कहानी: जहाँ मुझे नौकरी नहीं मिली, मैंने उसी डिस्ट्रिक्ट कलेक्ट्रेट में एक ऑफिसर बनने की ठान ली

तर्कसंगत

January 22, 2019

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बहुत से लोग आकांक्षा से प्रेरित हो कर सिविल सर्विसेज में आते हैं, मैं अपनी हार और हताशा के कारण से सिविल सर्विसेज में आया था. सिविल सर्विसेज की मेरी कहानी थोड़ी अलग है.

जब मैं +2 में पढ़ रहा था, मेरे पिता, रेवेन्यू डिपाटमेंट में एक विलेज डेवलपमेंट अफसर थे, परिवार में वह एकमात्र कमाने वाले व्यक्ति थे, मगर उनका निधन समय से पहले ही हो गया. अपने परिवार को चलाने के लिए मुझे काम करना पड़ा. मैंने जूनियर असिस्टेंट (एलडीसी) के रूप में दया के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन किया और डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ऑफिस में अपने सर्टिफिकेट जमा किये. मुझे अपना ग्रेजुएशन बीच में ही छोड़ना पड़ा.

मैंने इस नौकरी के लिए जरूरी 20 सर्टिफिकेट मुश्किल से जमा किये, लेकिन मुझे काम नहीं मिला. दूसरे लोग भी इसी दिक्कत का सामना कर रहे थे. इसलिए हमने सोचा कि, यदि हम अपनी समस्याओं को सीनियर ऑफिसर्स के सामने रखेंगे तो वह हमारी मदद करेंगे.

हमने कलेक्टर को याचिका दी.
हमने कमिशनर को याचिका दी.
हमने रेवेन्यू सेक्रेटरी को याचिका दी.
हमने चीफ सेक्रेटरी को याचिका दी.
हमने मुख्यमंत्री को याचिका दी.

कुछ नहीं हुआ!
9 साल तक कुछ नहीं हुआ!

हमारी आवाज़ क्यों नहीं सुनी गई?
हमारी वास्तविक शिकायत पर सीनियर ऑफिसर्स ने ध्यान क्यों नहीं दिया?

उन लोगों के लिए क्या उपाय है जिन्होंने इस कारण से अपनी पढाई को ख़राब कर दिया?
कोई जवाब नहीं!

एक दिन, मैंने सोचा, मुझे भीख में नौकरी नहीं मांगनी चाहिए. मुझे अपनी काबिलियत से इसे हासिल करना चाहिए.
मैंने डिस्ट्रिक्ट कलेक्ट्रेट में एक ऑफिसर बनने की ठान ली, जहाँ मुझे नौकरी नहीं दी गयी थी.

मेरे पास कॉलेज की कोई फॉर्मल शिक्षा नहीं थी, मैंने डिस्टेंस एजुकेशन से डिग्री पूरी की.
मैंने सिविल सर्विसेज सहित प्रतियोगी परीक्षाओं को लिखने का फैसला किया, कई लोगों ने सोचा कि एक व्यक्ति जो कॉलेज भी नहीं गया वह आईएएस बनने की ख्वाहिश कैसे देख सकता है. लेकिन मुझे खुद पर विश्वास था.

मैंने स्टेट की सिविल सर्विसेज की परीक्षाएँ लिखीं. मुझे ग्रुप IV, ग्रुप II, की स्टेट सिविल सर्विस के लिए चुना गया. मुझे राज्य सरकार में 6 बार नौकरी मिली. मैंने कई सारे काम किये. मैंने 7 वर्षों तक डीएसपी के जूनियर अस्सिस्टेंट के रूप में काम किया लेकिन इन नौकरियों में मेरा मैं नहीं लगा, मैं सिविल सर्विसेज की परीक्षा देता रहा, मैंने 3 बार इंटरव्यू में भाग लिया मगर मेरा सेलक्शन नहीं हुआ, अपने चौथे इंटरव्यू में, मुझे आईआरएस मिला. अंत में, मुझे 2016 में IAS के लिए चुना गया.

जब मैंने एलबीएसएनएए में आया, तो मैंने सोचा कि यह किसी और ट्रेनिंग की तरह ही होगा. लेकिन मुझे पहले दिन ही वहां की शानदार ट्रेनिंग का एहसास हुआ हो गया.
इंडक्शन ट्रेनिंग के लिए आने वाले मेल, सपोर्टिंग स्टाफ की मदद, फैकल्टी द्वारा देखभाल और ध्यान, और उम्मीद से भी ज़ायदा काम और मॉड्यूल. एलबीएसएनएए के ट्रेनिंग की तुलना किसी ने नहीं की जा सकती! इसने मुझे जीवन के हर पहलू के लिए तैयार किया है. चूंकि, मैं कभी कॉलेज नहीं गया तो मैं एलबीएसएनएए को ही अपना एकमात्र कॉलेज मानता हूं.

मैंने सरकारी कार्यालयों को एक आम आदमी के रूप में देखा है. मैं कई सालों तक उनके धक्के खता रहा, मैंने एक अनसुनी आवाज़ के दर्द को महसूस किया है.

मैं भगत सिंह के शब्दों में में अपनी बात कह सकता हूं …
मैं यहां ‘बहरों को सुनाने आया हूँ’.
और मैं अपने पूरे कैरियर में ऐसा ही करूँगा.

 

के. आलमबावत आईएएस, 2016 बैच, तमिलनाडु कैडर.

 

स्रोत: Humans Of Lbsnaa

 

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