मेरी कहानी

मेरी कहानी: कॉलेज में मैंने पहली बार महसूस किया कि लोग मेरे साथ अलग तरह से व्यवहार कर रहे हैं

तर्कसंगत

January 23, 2019

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जब मैं बच्ची थी तो मेरी पीठ पर सूजन थी, लोगों ने सोचा कि यह कैंसर हो सकता है. जब मैं सिर्फ 25 दिन की थी तब डॉक्टर ने सुझाव दिया कि मेरा ऑपरेशन करा दिया जाये. ऑपरेशन की प्रक्रिया में, एक नस गलती से कट गई थी और मैं एक दिव्यांग बन कर रह गयी.

लेकिन बड़े होते के साथ साथ मैं इन सब चीज़ों की आदि हो चुकी थी. जब लोगों ने मुझसे पूछा कि मैं अपनी बैसाखी के साथ कैसे चलती हूँ, तो मैं कुछ जवाब नहीं दे पाती थी क्यूंकि मेरे लिए सब आसान था’  मुझे खुद में कुछ भी कमी महसूस नहीं होती थी – मेरे माता-पिता ने मुझे स्पेशल स्कूल में नहीं बल्कि नार्मल बच्चों के स्कूल में भेजा जहाँ मैं खुद को दूसरों के बराबर समझ सकूँ.

मुझे स्कूल में कभी कोई परेशानी नहीं हुई क्यूंकि मैं वहां पहली क्लास से थी, मेरे बहुत से दोस्तों ने मेरा साथ दिया. उन्होंने छोटी छोटी चीज़ों में भी मेरा साथ दिया.

असली चुनौती तब हुई जब में कॉलेज जाने लगी, मेरी क्लास तीसरी मंजिल पर थी और वहां कोई लिफ्ट भी नहीं थी. मैंने उन्हें कई बार कमरा बदलने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने हर बार इनकार कर दिया. मैं भी हर दिन बैसाखी के सहारे तीन मंज़िला इमारत चढ़ती रही.

मैं पहली बार हॉस्टल में रहने आयी थी, मैं घबरा रही थी और खुश भी थी क्यूँकि मुझे अपने दम पर सब कुछ करना था, लेकिन मेरे माता-पिता मुझे हौसला देते रहे और वहां के छात्रों की तरह ही मेरे लिए भी उस माहौल में ढल गयी.

कॉलेज में मैंने पहली बार महसूस किया कि लोग मेरे साथ अलग तरह से व्यवहार कर रहे हैं. एक बार, हम कहीं जाने की योजना बना रहे थे तो मेरे दोस्तों ने मेरे कारण से जगह बदली, लेकिन उनके चेहरे पर यह साफ़ दिख रहा था कि ‘हम तुम्हारे लिए जगह बदल रहे हैं’. बाद में उन्होंने अपने व्यवहार के लिए माफी मांगी, लेकिन मैंने इससे खुद को फ़र्क़ नहीं पड़ने दिया.

आखिरकार, मैंने उन चीज़ों पर ध्यान देना शुरू किया, जिनमें मुझे अधिक दिलचस्पी थी, जैसे फिल्ममेकिंग. लोगों ने कहा कि मुझे कोई और कोर्स चुनना चाहिए क्योंकि मैं एक कैमरा नहीं संभाल सकती थी, और मुझे काफी सफर करना पड़ सकता था लेकिन मैंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया. मैंने सिर्फ अपने काम पर ध्यान दिया और अपना कोर्स अच्छे से कम्पलीट किया. मैंने वही किया जिससे मुझे ख़ुशी मिल सकती थी.

वास्तव में, मेरे दोस्तों में से एक ने मेरे डॉक्युमेंट्रीज़ को दूसरों को दिखाया और वे फिल्म प्रोडूसर से मिलना चाहते थे, उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मैं दिव्यांग थी, मुझे लेक्चर देने के लिए स्पेन बुलाया गया था. पूरा अनुभव कमाल का था. यह भारत के बाहर मेरी पहली यात्रा भी थी और वह भी स्पॉन्सर्ड! यह मेरा लिए सबसे गर्व का क्षण था. इसके बाद, मैंने अपनी फिल्मों के माध्यम से सुलभता के बारे में जागरूकता फैलाने का काम शुरू किया. और अब, मुझे यकीन है कि आने वाले समय में और भी कई गर्व के क्षण आनेवाले हैं.

बहुत सारे लोग सोचते हैं कि मेरी कहानी एक संघर्ष के बारे में है, लेकिन यह नहीं है. यह केवल मेरे खुद के बारे में है – यह लोगों को इस बात का एहसास करने के बारे में है कि उनके और मेरे बीच कोई अंतर नहीं है और जो है वह बस इतना कि वो, वो हैं और मैं, मैं हूँ.

स्रोत: Humans Of Bombay

 

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