पर्यावरण

एक एनजीओ जो गांवों में सोलर लैंप के ज़रिये रौशनी फैला रहा है

तर्कसंगत

January 24, 2019

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भारत देश कई मायनों में विवधताओं से भरा हुआ देश है. आज हम जब एक तरफ इकनोमिक पावर बनने की राह पर चल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश का एक हिस्सा अंधेरे में रहता है. जहां भारत के भीतरी इलाकों में इलेक्ट्रिफिकेशन के कई प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, वहीं ‘चिराग रूरल डेवलपमेंट फाउंडेशन’ नाम की एनजीओ, सात भारतीय राज्यों के सैकड़ों गांवों में रौशनी फैला रही है.

 

प्रोजेक्ट चिराग की शुरुआत

 

 

प्रतिभा, हमेशा से सोशल वर्क में हिस्सा लेती हैं और उनका मानना है की यह लोगों को अंदर से बदल देती है. तर्कसंगत से बात करते हुए, उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि आज कल के टीचर्स के पास बच्चों में सोशल सर्विस की सोच पैदा करने का इससे बेहतर और कोई उपाय नहीं है कि वह उन्हें इसमें शामिल करें.” वह अपने पहले बैच और कॉलेज की डीन इंदु शाहनी की शुक्रगुज़ार हैं कि उन्होनें इस प्रोजेक्ट में उनकी मदद की.

 

 

2011 में पूरी तरह से पढ़ाना छोड़ने के बाद, उन्होंने अपना ध्यान प्रोजेक्ट चिराग पर देना शरू किया, जिसका उद्देश्य कई सारे भारतीय गाँवों का इलेक्ट्रिफिकेशन करना है. प्रोफेसर प्रतिभा पाई ने कहा, “यह एक 360 डिग्री मॉडल है जो न केवल गाँव में बिजली लाता है बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, पर्यावरण जैसी चीज़ों पर भी ध्यान देता है.” सोलर पावर का इस्तेमाल कर के पाई और उनकी टीम दूसरों के ज़िन्दगी को रोशन करने का मन बना चुकी है.

 

लोगों की ज़िन्दगी में बदलाव

 

लगभग नौ वर्षों में, एनजीओ ने 7 राज्यों – महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, असम और मेघालय में 400 गांवों का एल्क्ट्रिफिकेशन किया है. उनकी पहल से 16,000 से अधिक गांवों को रोशन करने में मदद मिली है, जबकि लगभग एक लाख लोग को फायदा हुआ है. उन्होनें कहा, “हम इलेक्ट्रिफिकेशन के लिए उनकी जरूरतों के आधार पर गांवों की पहचान करते हैं, क्षेत्र का दौरा करते हैं और एक प्रस्तावित योजना के साथ आते हैं.” टीम गाँव वालों  के साथ सोलर पावर की ज़रूरत को समझने की कोशिश करती है.

 

 

एनजीओ अपने बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट्स के लिए धन जुटाने के लिए कॉर्पोरेट और प्राइवेट फंडिंग की मदद लेता है, जिसमें आमतौर पर लाखों रुपये खर्च होते हैं. हालांकि, ग्रामीणों को ओनरशिप का एहसास कराने में मदद करने के लिए, एनजीओ सोलर पावर डिवाइस के लिए कुछ पैसे चार्ज करता है. सोलर पैनल के मेंटेनेंस के बारे में प्रतिभा पाई ने कहा, “सोलर पैनलों को धूल पड़ने पर केवल पोछ देना पड़ता है और बैटरी को हर दो से तीन साल में एक बार बदलना पड़ता है.” एनजीओ हर जगह की आर्थिक स्थिति देख कर उन्हें बैटरी के लिए पैसे कैसे बचाना चाहिए वह भी बताता है जिनकी कीमत 300 रुपये से 500 रुपये के बीच हो सकती है. पाई ने कहा, “हमने उन गाँवों के लिए मामूली शुल्क माफ करना शुरू कर दिया है जो बेहद गरीब हैं.”

इसके अतिरिक्त, रूरल इंडिया के बारे में नई जेनेरेशन को बताने के लिए, एनजीओ स्कूल और कॉलेज के छात्रों को गांवों में ले जाता है, जहां वे इस आर्गेनाईजेशन के साथ पैनल फिक्स करते हैं. पाई ने कहा, “हम विभिन्न विद्यालयों के साथ टाई अप कर के गाँवों में इलेक्ट्रिफिकेशन के बारे में अवेयरनेस फैलाते हैं और फण्ड भी रेज करते हैं.”

 

प्रोजेक्ट चिराग देश के 15,000 और घरों तक पहुँचना चाहता है, और दो लाख लोगों को छूना चाहता है. तर्कसंगत प्रोफेसर प्रतिभा पाई और उनकी टीम को इस तरह की पहल के लिए शुभकामनाएं देता है.

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