मेरी कहानी

मेरी कहानी: मैं इंजीनियर साहब नहीं बन सका मगर, बैटरी वाले काका के रूप में मैंने अपनी पेहचान बना ली

तर्कसंगत

January 25, 2019

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“मुझे अपने आप पर विश्वास था कि मैं कुछ करने के लिए पैदा हुआ था. मेरे पिताजी एक मिस्त्री थे और ज़्यादा पैसे न होने का मतलब था कि पढ़ाई छोड़नी पड़ती. मैं जानता था कि मेरे लिए उस गरीबी से निकलने का रास्ता पढ़ाई से ही मिल सकता है. इसलिए 13 साल की उम्र से मैंने सड़क पर सब्ज़ी बेचना शुरू कर दिया जिससे मैं अपने स्कूल की फीस दिया करता था.

दिवाली में, मेरे भाई और मैं पटाखे बेचते थी, जिससे मैं अपनी जूनियर कॉलेज की फीस दिया करता था. मेरे पास अपनी पढ़ाई जारी रखने का यही तरीका था. मैं 12 बजे तक कॉलेज में पढ़ता था और फिर दिन के अंत तक अपनी दुकान पर काम करता था, रात को मैं देर तक पढ़ता ताकि अपने असाइनमेंट पूरे कर सकूँ.

मैं 27 साल का था जब मैंने एक वर्कशॉप शुरू की, जिसमें बिजली के पुर्ज़े बनते थे. उस समय रिमोट कंट्रोल बाजार में नया नया आया था मुझे ढेरो आर्डर मिले, मेरा वर्कशॉप अच्छी तरह से चलने लगा मैंने 2 साल के भीतर, 2 घर खरीदे. मैंने सोचा की मेरी कड़ी मेहनत के बदले – ऊपरवाला मुझे इनाम दे रहा था.

2005 तक सब ठीक चल रहा था, जब चीनी कंपनियों ने 1200 रुपये के रिमोट  600 रुपये में बेचने शुरू किये तब ऐसा लगा की मेरे ऊपर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा हो. मैंने जो कुछ भी बनाया था वह सब डूब रहा था और मुझे नहीं पता था कि कैसे बचाया जाए? मैं अपनी कंपनी से इतना जुड़ा हुआ था कि मैं उसे खोना नहीं चाहता था. मैंने पूरी कोशिश की और उम्मीद करता रहा कि यह बेहतर होगा लेकिन घाटा और कर्ज बढ़ता रहा.

मुझे अपनी कंपनी को बंद करना पड़ा और उधर चुकाने के लिए एक घर को बेचना पड़ा. मुझे नहीं पता था कि क्या करना है. उन कुछ महीनों के लिए, मेरी बेटी ने अपने पैसे से घर चलाया. मेरी पत्नी और बेटी उस वक़्त मेरे साथ चट्टान की तरह खड़ीं थीं. मैं अपने मन में होने वाली परेशानियों का कोई उपाय नहीं खोज पा रहा था, मैंने 13 साल की उम्र से लगातार काम किया था, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है?

एक दिन, मैं स्टेशन पर था जब मैंने एक सब्जी वाले से बात कर रहा था उसने मुझे बताया कि पेट्रोमैक्स को रिफिल करना कितना महंगा और मुश्किल था और उसकी आधी आमदनी उसी पर खर्च हो जाती है. मुझे एक आईडिया आया, मैंने अगले 20 दिन स्पेयर पार्ट्स से बैटरी से चलने वाला बल्ब बनाने में लगाए. यह पोर्टेबल और सस्ता था. मैंने इसे रेड़ी वालों को बेचा जिन्हें यह काफी पसंद आया, कुछ ही समय में, मैंने 2000 बल्ब और बेच दिए और मेरा नया बिज़नेस चल पड़ा.

इसने मुझे खुद पर दोबारा से विश्वास हुआ मैंने सोचा था कि मैंने केवल अपना कारखाना खोया था, मैंने अपनी पहचान नहीं खोई थी – अब मैं ‘इंजीनियर साहब’ नहीं हूँ. लेकिन अब मैं अपनी नई पहचान बैटरी वाले काका ’के रूप में बना ली है.

ज़िन्दगी ने पूरा एक चक्कर काटा  – सड़क पर सब्जियां बेचने से लेकर दशकों बाद सड़क के इन्ही विक्रेताओं की मदद करने तक.

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स्रोत: Humans Of Bombay

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