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मिलिए कर्नाटक से देश के एकमात्र BIS प्रमाणित खादी उद्योग से, जहाँ 90% महिलाएं झंडा बनाती हैं

तर्कसंगत

January 28, 2019

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गणतंत्र दिवस के आते ही हमारे आस पास हर जगह तिरंगा झंडा दिखने लगता है, ट्रैफिक सिग्नल, दुकानों में, खादी भंडारों में. लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि ये झंडे कहां से आते हैं? ये झंडे बनाना किसी पेंटर की कला से कम नहीं है.

भारतीय तिरंगा हमें सम्मान की भावना देता है पूरी दुनिया में यह हमारी पहचान बनाता है. हमारे देश में गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर कई जगह झंडे फहराए जाते हैं. हालाँकि हम केवल इसे कपड़े के एक टुकड़े के रूप में देखते हैं, लेकिन इसके पीछे काफी मेहनत लगी होती है.

खादी उद्योग 1957 में कर्नाटक में शुरू की गई प्रोडक्शन यूनिट है. वो पूरे देश से खादी का कपड़ा इकट्ठा कर उसे बांटते हैं.

1981 में सूखा पड़ने के बाद, सूखे और अकाल से पीड़ित गाँव वालों के लिए संस्थापक वेंकटेश मगाडी ने इस छोटी इकाई को प्रोडक्शन यूनिट में बदल दिया.

 

 

तर्कसंगत से बात करते हुए  इस  खादी उद्योग के सेक्रेटरी शिवानंद ने कहा “2002 में हमनें भारत सरकार के ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड्स (बीआईएस) से सर्टिफिकेशन की मांग की थी, 2005 में हमें तिरंगे के प्रोडक्शन की अनुमति मिल गयी. एक साल में हम लगभग 26000 से 30000 झंडे बनाते हैं.”

 

कितने प्रकार के झंडे?

वेंकटेश बताते हैं कि ” झंडे कुल 9 तरह के होते हैं. 6 प्रकार के झंडे पिलर या पोस्ट पर फहराए जा सकते हैं. 2 प्रकार के झंडे कार और टेबल पर लगाए जाने के लिए हैं और एक बचा हुआ झंडा हाथ में पकड़ने के लिए होता है. इस पूरे प्रक्रिया की जांच और सर्टिफिकेशन को बनाये रखने के लिए बीआईएस के अधिकारी हर साल दौरा करते हैं.”

वेंकटेश ने आगे बताया कि ” हमारे यहां कुल 500 लोग झंडा बनाते हैं, जिनमें 90% महिलाएं हैं. हुबली और बागलकोट में हमारी प्रोडक्शन यूनिट में, झंडा बनाने के लिए अलग अलग काम हैं जैसे कताई, रंगाई, कटाई, बुनाई. महिलाओं को उस दिन के काम के आधार पर उसी दिन पैसा दे दिया जाता है. जैसे कि मान लीजिए वे कपड़े को काटने का काम कर रही हैं, तो कितने कपड़े की कटाई हुई और उसकी लम्बाई के आधार पर उनका भुगतान कर दीया जाता है, लेकिन भुगतान की जाने वाली राशि केंद्र सरकार द्वारा तय की जाती है. हर व्यक्ति कम से कम हर महीने 4000 रूपये कमा लेता है.

 

 

काम के बाद महिलाओं को प्रोडक्शन यूनिट में ही बने उनके लिए घर में रहने का विकल्प दिया जाता है. केंद्र में काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं गृहिणी हैं और अपने पति के काम पर जाने के बाद वहां काम करने आती हैं. उनके ज्यादातर पति किसान हैं. केंद्र महिलाओं को जो अवसर देता है वह ज़रूरी है क्योंकि उन्हें केवल घर के काम करने के बजाय खुद के लिए कमाने का भी मौका मिलता है. वे कलाकारों के रूप में अपने लिए एक अलग पहचान बनाते हैं.

हालाँकि झंडे बनाने वाली दूसरी भी प्रोडक्शन यूनिट हैं, लेकिन यह एकमात्र ऐसी जगह है जो BIS प्रमाणित है. एक प्रोडक्शन यूनिट, जिसने अपनी शुरुआत एक वर्ष में चार लाख रुपये कमाए थे, वह अब देश भर में हर जगह झंडा भेजने के बाद, प्रति वर्ष तीन करोड़ रुपये कमाने लगी है.

तर्कसंगत खादी उद्योग की इस सफलता और नारीशक्ति की पहल को आगे बढ़ाने के लिए उनकी सराहना करता है.

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