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‘भयमुक्त भारत’: बाल यौन शोषण और इसे समझने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान

तर्कसंगत

January 30, 2019

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बच्चे दुनिया का भविष्य हैं. उनका पालन-पोषण, शिक्षा ही हमारी दुनिया का भविष्य तय करेगा. उनकी भलाई के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि हम उन्हें बड़े होने के लिए एक सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण दें. दुर्भाग्य से, लगभग हर दिन हम बच्चों पर हो रहे यौन उत्पीड़न की खबरें सुनते हैं.

सरकार ने गंभीर स्थिति को समझते हुए बाल यौन अपराधियों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया है. एक पहलू, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है, वह है बच्चों, उनके माता-पिता और शिक्षकों को इस सामाजिक बुराई के बारे में जागरूक करना. इसके लिए एक कदम उठाते हुए, बेंगलुरु से बाहर एक एनजीओ, मुक्ता फाउंडेशन, ने बाल यौन उत्पीड़न की रोकथाम के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान  ‘भयमुक्त भारत’ शुरू किया है.

 

भयमुकत भारत

मुक्ता फाउंडेशन, केवल महिलाओं से बनी मेन्टल हेल्थ प्रोफेशनल्स की एक टीम है जो आपसी दुर्व्यवहार को रोकती है और मेन्टल हेल्थ को प्रमोट करती है. संगठन का आदर्श वाक्य “फ़ोर लिब्रेशन बिटवीन अस एंड विदिन अस​” है. एनजीओ का मुख्य उद्देश्य हमारे मुख्य क्षेत्रों से संबंधित प्रशिक्षण, हस्तक्षेप, अनुसंधान और वकालत में संलग्न होना है.

 

 

यह संगठन अब पूरे देश में बाल यौन शोषण के बारे में जागरूकता फैलाने के मिशन पर है. एक जनवरी को शुरू हुआ ‘भयमुक्त भारत’ अभियान 28 राज्यों की राजधानियों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों की यात्रा के बाद 31 मार्च को समाप्त होगा. भयमुक्त भारत का उद्देश्य बाल सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना है. इस टीम का नेतृत्व मुक्ता फाउंडेशन के संस्थापक-निदेशक अश्विनी एनवी, एनजीओ के चार अन्य सदस्यों- श्रुति चैतन्य, एनेट शजू, नुपुरा बयरमुडी और सुप्रिया चौधरी के साथ कर रही हैं. तर्कसंगत से बात करते हुए, अश्विनी ने कहा, “बाल यौन शोषण एक भयावह वास्तविकता है जो आज हमारे बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा है. बाल यौन शोषण की रोकथाम के कार्यक्रमों को अक्सर-‘गुड टच-बैड टच’ और ‘स्ट्रेंजर डेंजर’ के रूप में चित्रित किया जाता है. लेकिन यह विषय सबसे अधिक सोचने की तुलना में काफी ज़्यादा बारीक है.”

 

 

अभियान का उद्देश्य इससे जुड़े सभी लोगों को शामिल करना है, जिनमें वे पेरेंट्स, टीचर्स और स्कूल मैनेजमेंट को भी शामिल करते हैं, न कि केवल बच्चों तक सिमित रहते हैं. अश्विनी ने तर्कसंगत को बताया, “लगभग 70% बार, एक बच्चे को एक परिचित द्वारा ही यौन शोषण किया जाता है. इसके अलावा, बहुत बार, एक बच्चे को भी पता नहीं चलता है कि उसका यौन शोषण किया जा रहा है. इसके साथ ही, यौन शोषण के शिकार सिर्फ 2% बच्चे ही इसकी शिकायत करते हैं. इसलिए, टीचर्स और पेरेंट्स जैसे लोगों के लिए यह जरुरी है कि वे हमेशा संकेतों की तलाश करें.”

 

 

 

सिर्फ स्कूल ही नहीं, टीम कई कॉलेजों, दफ़्तर, एनजीओ, कम्युनिटी रेडियो, धार्मिक मंडलों और शेल्टर होम्स आदि का भी दौरा कर रही है. अश्विनी का कहना है कि कई स्थानों पर जहाँ जहाँ वे गए हैं, बच्चे, शिक्षक और माता-पिता एक जैसे ही आशंका ले कर उनके सामने आये हैं. यह एक तरह से विशेष रूप से उत्साहजनक है, जो यह दर्शाता है कि लोग इस बारे में खुल के बात कर रहे हैं, जैसा कि लोग अक्सर नहीं करते.

 

 

 

तर्कसंगत का तर्क

यह अभियान ऐसे समय में आया है जब हमारे बच्चों की सुरक्षा सवालों के घेरे में है. माता-पिता और शिक्षकों को इस तरह के ट्रेनिंग और वर्कशॉप की ज़रूरत है ताकि समय आने पर वह इस समस्या को पहचान सकें और निपट सकें. इस दिशा में भयमुक्त भारत एक महान पहल है. तर्कसंगत को उम्मीद है कि यह अभियान जागरूकता पैदा करेगा और बाल यौन उत्पीड़न और इसकी रोकथाम के लिए समाज भी आगे आएगा और खुल कर बात करेगा.

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