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देहरादून: इलेक्ट्रीशियन के आभाव में डॉक्टरों ने 9 महिलाओं की डिलीवरी मोमबत्ती और टोर्च की रौशनी में की

तर्कसंगत

Image Credits: Representational Image

January 31, 2019

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उत्तराखंड के देहरादून से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहां 21 जनवरी, 2019 को सरकारी दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मोमबत्ती और टोर्च  के ज़रिये नौ महिलाओं की डिलीवरी कराइ गयी. यह अस्पताल गढ़वाल मंडल का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है जो कई पहाड़ी जिलों में रहने वाले लोगों के लिए बना है, टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार. भारी बारिश के बाद, मंगलवार सुबह 8 बजे से बिजली बंद हो गई और अगले दिन (बुधवार) सुबह 10.30 बजे बिजली वापस आयी. अस्पताल के अधिकारी ने बताया कि बिजली खराब होने का कारण जनरेटर में तकनीकी खराबी थी और साथ ही अस्पताल का अकेला इलेक्ट्रीशियन छुट्टी पर था.

एक निवासी, रविंद्र सिंह को अपने गर्भवती बीवी को निजी अस्पताल में ले जाने के लिए कहा गया था क्योंकि वहां बिजली नहीं थी. चूंकि उनकी पत्नी पहले से ही प्रसव पीड़ा में थीं, इसलिए उन्होंने अस्पताल को मोमबत्ती की रोशनी में डिलीवरी कराने की अनुमति दे दी.

एक अन्य उदाहरण में, ऋषिकेश निवासी ममता, अपनी गर्भवती बहन मनीषा के साथ डिलीवरी रूम में गई. उसने कहा कि उसकी बहन की डिलीवरी और टांके मोबाइल फोन की लाइट में किये गए. मनीषा ने द टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि वह इस अस्पताल में बेहतर देखभाल के लिए टिहरी के घनसाली से आई थीं, लेकिन इस तरह के बदतर हालत की उम्मीद कभी नहीं की थी. उन्होनें कहा कि वह ऐसी परिस्थिति में एक स्वस्थ लड़की को जन्म देने के लिए खुद को भाग्यशाली मानती हैं एक और महिला संजू गुप्ता ने कहा कि जब उन्हें अँधेरे डिलीवरी रूम में ले जाया गया तो वह काफी डर गयी थीं.

अस्पताल की महिला विंग की मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, मीनाक्षी जोशी ने कहा कि इन्वर्टर लोड को लेने में असमर्थ था और बिजली मिस्त्री छुट्टी पर था. उन्होनें कहा कि उन्होनें स्थिति के बारे में अधिकारियों को लिखा है ताकि आगे ऐसी स्थिति आने पर कर्मचारियों और रोगियों को इस भयावह स्थिति से न गुजरना पड़े.

घटना पर टिप्पणी करते हुए, सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत, जो स्वास्थ्य विभाग की देखभाल भी करते हैं, ने कहा, “यह एक बार की घटना है और अगर बिजली नहीं थी, तो क्या उन्हें मोमबत्ती नहीं जलानी चाहिए थी?”

 

पिछली घटनाएं

यह पहली बार नहीं है जब महिला विंग में इस तरह की भयावह घटनाएं हुई हैं. इससे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया कि मां ने कॉरिडोर में बच्चे को जन्म दिया था जिसके बाद अस्पताल में बच्चे की मौत हो गई. एक अन्य महिला ने वॉशरूम के पास एक बच्चे को जन्म दिया था क्योंकि उसे बिस्तर नहीं मिला था.

 

तर्कसंगत का तर्क

यह सौभाग्य की बात है कि इन 9 डिलीवरी में किसी को भी कोई नुक्सान नहीं हुआ. सीएम की टिप्पणी से पता चलता है कि वह इस मुद्दे को कितना हल्का समझते हैं. यह देश में स्वास्थ्य सेवा की निराशाजनक स्थिति और उस गंभीरता के उदाहरणों में से एक है. इलेक्ट्रीशियन के अवकाश पर होने के कारण अस्पताल को एक विकल्प की व्यवस्था करनी चाहिए थी. यह तकरीबन सभी सरकारी और निजी अस्पताल का हाल है जहाँ स्टाफ़ की कमी होने के बाद भी नए लोगों की बहाली नहीं होती, रोज़गार नहीं दिया जाता. कोशिश यह रहती है कि एक आदमी से चार आदमी  के बराबर  का काम लिया जाये. सरकारी अस्पताल में डॉक्टर और नर्सेज की बेरुखी तस्वीर भी कोई नयी बात नहीं. सरकार को चाहिए कि अस्पताल की बुनयादी रखरखाव के अलावे अस्पताल में काम करने वालों की संख्या और वर्कलोड पर ध्यान दें. स्वस्थ्य व्यवस्था सुचारु रूप से चले ये बेहद ज़रूरी है.

 

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