मेरी कहानी

मेरी कहानी: मैंने बचपन से किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझा

तर्कसंगत

January 31, 2019

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“मेरा बचपन जहाँ बीता, वहाँ की स्थितियों के हिसाब से मैं सोच भी नहीं सकता कि इतनी बड़ी परीक्षा में शामिल भी हो सकता हूँ। एक आर्थिक रूप से विपन्न परिवार में जन्म लेने के अपने कुछ जन्मजात नुकसान होते हैं। जहाँ सपने भी देखना अपने हक में नही होता है।

महज दो साल के उम्र में बायें पैर में पोलियो हो गया। बड़ा परिवार होने और आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से सही इलाज नही हो पाया। मेरी पढ़ाई पर घर वाले उतना जोर नही देते थे जैसे कि वो जानते थे कि पढ़-लिख कर क्या कर लेगा।

मैंने बचपन से किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझा।
यही कारण है कि चौथी कक्षा से पान और फूल की दुकान पे बैठना शुरु कर दिया, जिसपे मेरी दादी बैठती थी। जहाँ मै सुबह-शाम बैठता था स्कूल टाईम को छोड़कर।

मुझे याद है हमारे यहां हर मंगलवार और शुक्रवार को हाट लगती थी, और मेरी दादी पान के बीड़े बनाकर एक डलिया में रख देती थी मैं पूरे बाज़ार में सबको पान बीड़ी देकर आता था। मैंने अपने पिताजी से कभी आर्थिक मदद नहीं ली, जब तक मैं घर पर रहा अपनी स्कूल की पढ़ाई के दौरान, शुरू से ही अपने खर्चे खुद वहन किये.क्योंकि मंगलवार और शुक्रवार को सब्ज़ी मार्केट कभी गोभी, टमाटर, मिर्च खरीद के मैं खुद बेचता था जिससे मेरी फ़ीस, कपड़े और किताबों का इन्तजाम हो जाता था।

बायें पैर में पोलियो की वजह से मैं चप्पल नही पहन पाता था और जूता खरीदने की हैसियत नही थी। नौवीं में आकर अपने लिए नया जूता खरीदा। पढ़ने में एक एवरेज स्टूडेंट था दसवीं में एक बार फेल भी हुआ था लेकिन पास भी हुआ तो थर्ड डिवीज़न के साथ। बारहवीं बायोलॉजी से करने की इच्छा थी जिससे मै डॉक्टर बन सकूँ, लेकिन थर्ड डिवीजन की वजह से ऐडमिशन नही हुआ।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी. ए. करने के बाद जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली में मेरा ऐडमिशन हो गया। जहाँ पर फ़ीस, मेस बिल, हॉस्टल बिल इतना कम था कि मै दिल्ली जैसे महानगर में
टिक पाया। यहाँ आकर मैने सिविल सर्विस के बारे में जाना और समझा तब तैयारी शुरु की।

दिल्ली में पढाई करते हुए भी अपने गाँव अपनी मिट्टी को नहीं भूला और अपने गाँव में प्रथम पुस्तकालय “गांधीजी जन पुस्तकालय” खोला जहाँ पर गाँव के सभी लोग आकर पुस्तके पढ़ सके, इस पुस्तकालय के लिए कहीं से अनुदान नहीं लिया बल्कि छात्रवृति के पैसो का उपयोग पुस्तकालय के लिए किया, आज इस पुस्तकालय में केवल गाँव भर के ही नहीं अपितु आसपास के गाँव के लोग भी पढने आते है,और कई नियमित पाठक भी है पुस्तकालय के।

वर्ष 2016 मेरे लिया बड़ी उपलब्धि वाला रहा, पहली 23 जनवरी को साहित्य के क्षेत्र में युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने हेतु “काका साहेब कालेलकर” सम्मान से “विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान और गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा” के द्वारा सम्मानित किया गया, उसके बाद उनकी दूसरी उपलब्धि रही फरवरी माह में लोकसेवा आयोग उत्तर प्रदेश से मार्केटिंग इंस्पेक्टर के पद पर चयन हुआ, और 10 मई को निकले संघ लोकसेवा आयोग के अंतिम परिणाम में सिविल सर्विसेस में 771वा रेंक प्राप्त करना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। ”

लाल बहादुर पुष्कर
भारतीय राजस्व सेवा (आईटी), 2016

स्रोत : Humans Of Lbsnaa

 

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