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वीडियो: सत्यमेव जयते के अखिलेश याद हैं? कहाँ हैं वह अब?

तर्कसंगत

February 1, 2019

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अखिलेश कभी पुलिस द्वारा वांटेड मुजरिम थे. उनके खिलाफ 45 मामले दर्ज थे. फुटबॉल की बदौलत आज वह एक बदले हुए इंसान हैं. अखिलेश  ‘ब्रिजेस ऑफ़ स्पोर्ट्स’ फाउंडेशन के माध्यम से वंचितों के लिए स्कूलों में बच्चों को ट्रैंनिंग देते हैं.

यह समझना ज़रूरी है कि खेल और शिक्षा को दो विकल्पों के रूप में नहीं देखा जा सकता है, बल्कि उन्हें एक इकाई के रूप में स्कूल स्ट्रक्चर में स्वीकार करने की आवश्यकता है. भारत ने 2009 में 6 -14 वर्ष के आयु वर्ग के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम का अधिकार पारित किया. तब से सरकार कड़ी मेहनत कर रही है कि कम से कम 14 वर्ष की आयु के बच्चे माध्यमिक शिक्षा पूरी कर लें.

अखिलेश नागपुर में रहते हैं, उन्होंने 2010 में ब्राज़ील में आयोजित होमलेस वर्ल्ड कप में भारतीय टीम का नेतृत्व किया था. कुछ वर्षों पहले अखिलेश पढ़ाई में पूरी तरह से उदासीन थे और छठी क्लास में स्कूल छोड़ दिया. यह चीज़ पूरे भारत में देखी जा सकती है, हालांकि शिक्षा के लिए जिला सूचना प्रणाली के आंकड़ों के हिसाब से स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में कमी आई है. भारत में अभी भी 42 मिलियन बच्चे सेकेंडरी स्कूल से बाहर हैं. 90% से अधिक बच्चे प्राइमरी स्कूल में दाखिला लेते हैं लेकिन मिडिल स्कूल जाने से पहले 40% से अधिक ड्रॉप आउट हो जाते हैं.

 

 

अखिलेश स्कूल के बजाय असामाजिक तत्वों, शराब की लत और समाज के अन्य बुरी चीज़ों में शामिल होते थे. केवल एक चीज जिसे वह पसंद करते थे वह था, दूसरों को फुटबॉल खेलते देखना. वह मग, बोतल या जो कुछ भी मिलता उसे किक मार कर फुटबॉल खेलना शुरू कर देते. वह एक कॉलेज के मैदान में प्रोफेसर विजय भरसे से मिले, जहां उन्होंने आमतौर पर अपने दोस्तों के साथ धूम्रपान करने में समय बिताते थे. जल्द ही प्रोफेसर ने इन बच्चों को शामिल किया और एक फुटबॉल टूर्नामेंट आयोजित किया, जिसका नाम है, झोपड़पट्टी टूर्नामेंट और इसमें सिर्फ 2 टीमें हैं.

 

 

आज, यह टूर्नामेंट एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बन गया है, जहाँ समाज के कमज़ोर तबके के बच्चों को अपने फुटबॉल के टैलेंट को दिखाने का मौका मिलता है और फीफा के तहत आयोजित होमलेस फुटबॉल विश्व कप की तरफ पहला कदम है.

अखिलेश ने नियमित रूप से प्रशिक्षण में भाग लेना शुरू कर दिया और 2010 में ब्राजील में भारत के कप्तान चुने जाने से पहले डिस्ट्रिक्ट और नेशनल लेवल पर खेला. अपने समय के दौरान, उन्हें तत्कालीन मैनचेस्टर यूनाइटेड कोच द्वारा कोचिंग में शामिल होने के लिए कहा गया था, लेकिन अखिलेश खेलना नहीं छोड़ना चाहते थे, जब अखिलेश भारत लौट आए तो फिर 30 की उम्र तक आते आते और घटते अवसरों के कारण उन्होंने कोचिंग सीखने के लिए अपने सर का सहारा लेने का सोचा लेकिन उनके सर ने उन्हें कोच बनने के बारे में सोचने से पहले पहले अंग्रेजी सीखने को कहा. चूँकि अखिलेश ने अपनी स्कूली शिक्षा छोड़ दी थी, उन्हें अलग से  अंग्रेजी की क्लासेज करनी पड़ी और 3 साल के ट्रेनिंग के बाद, अखिलेश आखिरकार एक फुलटाइम फुटबॉल कोच बन गए.

 

 

उनकी उपलब्धि को तब बीबीसी, आउटलुक द्वारा कवर किया गया था और आखिरकार, वह 2014 में सत्यमेव जयते में भी दिखाई दिए थे.

अब अखिलेश का एक बेटा है और वह यह कोशिश करते हैं कि वह अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करे, वह केवल अपने बेटे की नहीं बल्कि स्कूल में अपने सभी छात्रों की उपस्थिति की निगरानी करते हैं और स्कूल में उनकी प्रोग्रेस को ट्रैक करने के लिए उनके शिक्षकों के साथ लगातार बातचीत करते हैं. यह उनकी अनूठी कोचिंग शैली है, जहां हर सुबह फुटबॉल क्लासेज लेने के बाद वह अपने छात्रों के स्कूल का दौरा करते हैं और निरंतर नज़र रखते हैं. मुंबई स्थित एक एनजीओ, दसरा ने एक अध्ययन में ब्राजील में चल रहे एक प्रोग्राम “फुल-टाइम एजुकेशन” पर रिसर्च किया, जिसने खेल पर आधारित कोकरीकुलर जैसे चीज़ों को बढ़ावा देकर ज़्यादा से ज़्यादा स्टूडेंट्स को स्कूल में लाने की कोशिश की. इससे न केवल बच्चों की अटेंडेंस में सुधर हुआ बल्कि 8000 बच्चे जो स्कूल छोड़ चुके थे वह स्कूल वापस आ गए.

अजीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन द्वारा ड्रॉप आउट दरों को समझने के लिए किए गए रिसर्च में पाया गया कि लड़कों को स्कूल जाने की दिलचस्पी नहीं थी जबकि लड़कियों के मामले में माता-पिता की मर्ज़ी और आर्थिक स्थितियों पर निर्भर थी. जाहिर है, स्कूल में बच्चों के नामांकन पर बहुत अधिक ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन स्कूलों में स्टूडेंट्स को बनाए रखने के लिए बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है. स्कूलों को आकर्षक बनाने के लिए बेहतर सुविधाएं दे कर स्कूली शिक्षा के प्रति अरुचि को कम किया जाना चाहिए. अखिलेश यही काम अपने फुटबॉल क्लासेज के माध्यम से कर रहे है. ब्रिड्जस ऑफ़ स्पोर्ट्स ने एक और चीज़ पर गौर किया कि स्कूलों में रोज़गार सम्बंधित कुछ पढ़ाई नहीं थी जिससे कि सेकेंडरी स्कूल के बाद वह नौकरी कर सकें. अखिलेश ने अपने शुरूआती वर्षों के दौरान इस चीज़ का फायदा उठाया और उन सारे बुरे लत को छोड़ फुल टाइम फ़ुटबाल कोच बन गए.

दुर्भाग्य से, जब अखिलेश की मां को किडनी फेलियर के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया, तो उन्हें अपने जीवन के सबसे कठिन समय में किसी से पैसे की कोई मदद नहीं मिली. बाद में उन्होंने स्थानीय स्कूलों में तीनों बच्चों को मुफ्त में कोच करना जारी रखा, जैसा कि उनका मानना था, यह कम से कम कुछ और बच्चों को समाज के बुराई के जाल में फंसने से बचा सकता है. अपने लिए कोई निश्चित भविष्य नहीं होने के कारण, उन्हें यकीन नहीं था कि वह कब तक मुफ्त में कोचिंग जारी रख सकते हैं. अपनी सभी उपलब्धियों के बाद भी, वह अपने परिवार और अपने बच्चे की स्कूली शिक्षा को बनाए रखने के लिए रोजगार पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. अखिलेश से मिलने के बाद, ब्रिजेस ऑफ़ स्पोर्ट्स ने महसूस किया कि अखिलेश इस काम के मॉडल पर पूरी तरह से फिट बैठते हैं. अखिलेश अब नागपुर के स्पोर्टस फुटबॉल ऑपरेशन्स के लीड होंगे. हमारा मानना है कि यह अखिलेश जैसे लोगों को मौका देने का समय है और जब वह  भारतीय खेलों के भविष्य को आकार देने का भार अपने कंधे पर ले सकें.

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