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ऑक्सफेम रिपोर्ट: दुनिया भर में महिलाओं द्वारा किये गए गैर वेतन काम का मूल्य एप्पल के टर्नओवर से 43 गुना ज़्यादा

Kumar Vibhanshu

February 1, 2019

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ऑक्सफैम द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में महिलाओं द्वारा किया जाने वाला बिना वेतन का काम हर साल लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर के बराबर का होता है. यह राशि एप्पल के वार्षिक कारोबार का 43 गुना है. बाजार मूल्य के मामले में एप्पल  दुनिया की अग्रणी कंपनियों में से एक है.

 

महिलाएं और गैर वेतन के काम

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में महिलाओं द्वारा अपने घरों और उनके बच्चों की देखरेख में किए गए अवैतनिक कार्य देश के जीडीपी का 3.1% है. उल्लेखनीय रूप से, शहरी क्षेत्रों में रहने वाली महिलाएं प्रति दिन 312 मिनट अवैतनिक काम करती हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं प्रति दिन 291 मिनट खर्च करती हैं.

यह संख्या पुरुषों द्वारा अवैतनिक देखभाल कार्य पर बिताए जाने वाले मिनटों की संख्या से 10 गुना ज़्यादा है. शहरी क्षेत्रों में रहने वाले पुरुष दिन में सिर्फ 29 मिनट बिताते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष प्रतिदिन 32 मिनट अवैतनिक कार्य में बिताते हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है, “यह समझा जाता है कि एक महिला की पहली भूमिका घर और उसके परिवार की देखभाल करना है और इसके बाद ही उसकी कमाने की भूमिका होती है” रिपोर्ट में पुरुषों और महिलाओं के बीच मौजूद वेतन के अंतर पर भी प्रकाश डाला गया है भारत के लिए पुरूषों और महिलाओं में वेतन का अंतर 34% है. अध्ययन ने 2018 के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स पर भारत की खराब रैंकिंग 108 का हवाला दिया है. यह रैंक 2006 में वैश्विक औसत से काफी नीचे होने के साथ-साथ 10 पायदान से भी कम है. इस रैंकिंग में भारत चीन और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से पीछे है.

स्विट्जरलैंड के दावोस में डब्ल्यूईएफ वार्षिक बैठक की शुरुआत से पहले अंतरराष्ट्रीय अधिकार समूह द्वारा जारी एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत सहित दुनिया भर में महिलाएं और लड़कियां बढ़ती आर्थिक असमानता की वजह से प्रभावित हुई हैं. साथ ही, 119 सदस्यीय अरबपति क्लब में सिर्फ 9 महिलाएं हैं.

 

शारीरिक, मानसिक और यौन उत्पीड़न

अध्ययन में आगे कहा गया है कि पुरुष प्रधान समाज के कारण, महिलाओं के खिलाफ हिंसा से निपटने वाले कई कानूनों कमज़ोर हैं. कार्यकर्ताओं और वकीलों द्वारा 17 साल के लंबे संघर्ष के बाद, 2013 में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से निपटने का कानून बनाया. वह भी केवल उसी जगह पर लागू है जहाँ आप किसी ऑर्गनाइज़्ड सेक्टर में काम कर रहे हैं मगर अनऑर्गनाइज़्ड सेक्टर में महिलाओं को इस कानून का लाभ नहीं है. ऑक्सफेम अध्ययन में कहा गया है कि इस कारण से, महिलाएं अक्सर वर्कफोर्स से पूरी तरह से बाहर हो जाती हैं या ऐसी स्थिति में भी काम करना जारी रखती हैं.

अध्ययन में बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में किए गए 1,000 घरों के सर्वेक्षण का भी हवाला दिया गया है. सर्वेक्षण में शामिल 53% लोगों ने कहा कि यदि महिलाएं बच्चों की अच्छी देखभाल करने में विफल रहती हैं तो उनकी कठोर आलोचना करेंगे, तो 33% ने कहा कि इस कारण से उन्हें पीटना भी स्वीकार है.

60% ने कहा कि किसी महिला पर आश्रित या बीमार वयस्क को छोड़ कर उसकी कड़ी आलोचना करना ठीक था और 36% ने महसूस किया कि उसे उसी के लिए पीटना स्वीकार्य था. 68% के साथ महिला की एक स्थायी भूमिका की भावना सबसे ज़्यादा पाई गई, यह महसूस करते हुए कि अगर वह खाना नहीं बनाती, तो एक महिला की कठोर आलोचना करना स्वीकार्य था, और 41% ने कहा कि ऐसा नहीं करने के लिए उसे पीटना ठीक था. डिपेंडेंट के रूप में महिलाओं की स्थिति इस तथ्य से पुष्ट हुई कि 86% ने महसूस किया कि एक महिला को घर छोड़ने से पहले घरवालों से पूछने की जरूरत है, जिसमें विफल रही तो 54% ने उन्हें पीटना ठीक समझा.

रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक असमानता और खराब सार्वजनिक सेवाओं में महिलाएं और लड़कियां प्रमुख शिकार हैं. एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, ऑक्सफैम इंडिया के प्रमुख अमिताभ बेहार ने कहा, “जाति, वर्ग, लिंग और धर्म से आर्थिक असमानता को युद्ध स्तर पर निपटने की जरूरत है.”

 

 

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