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जानिए कि कैसे कैंसर सर्वाइवर सारिका राणा ने कैंसर पीड़ितों के लिए ही काम करना शुरू कर दिया

तर्कसंगत

February 5, 2019

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आज के समय में हम नए नए बिमारियों से घिरे हुए हैं. हर दिन किसी न किसी नए वायरस और बीमारी के बारे में जानते रहते हैं. शुक्र है कि एक तरफ रिसर्चर्स बिमारियों के बारे में पता लगाते हैं और दूसरी तरफ उसकी दवाई बन कर तैयार रहती है. हम अब बिमारियों से नहीं घबराते, कुछ तो अपनी मेडिकल साइंस पर भरोसा है और कुछ  इस नए पीढ़ी में मुश्किलों से जूझने का नजरिया अलग है. कई तरह की जानलेवा बिमारियों में से एक है कैंसर. हर साल 4 फरवरी को ‘वर्ल्ड कैंसर डे’ मनाया जाता है. आज हम एक ऐसी लड़की की कहानी आपसे शेयर करने जा रहे हैं जिन्होनें काफी कम उम्र में इस कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी को झेला भी, लड़ी भी, मात भी दी और अब औरों को इससे लड़ने के लिए हिम्मत, हौसला और साथ दे रहीं हैं. हम बात कर रहे हैं – सारिका राणा की.

 

 

शुरूआती ज़िन्दगी

सारिका का जन्म उत्तराखंड के एक छोटे से शहर चमोली में हुआ था, और उनका बचपन माँ बाप के दुलार प्यार और प्रकृति की खूबसूरती के बीच बीता. मगर नियति ने इस प्रेम दुलार को ज़्यादा दिन तक उनके ज़िन्दगी में रहने नहीं दिया, उनके माता पिता का निधन काफी जल्दी हो गया और वह अकेली पड़ गयीं. मगर सारिका इस मुश्किल की घड़ी से भी उबर गयीं उनका मानना है कि ज़िन्दगी में आपको किसी एक चीज़ पर भरोसा रखना होगा या तो वह आपकी किस्मत हो, अपने अंदर की फीलिंग हो, खुद पर हो या अपने कर्म पर हो और इसी चीज़ के सहारे उन्होनें आगे चलकर बायोटेक्नोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन कर के रिसर्च के क्षेत्र में दिल्ली में काम करना शुरू किया.

 

कैंसर से लड़ाई

साल 2013 में एक दिन अचानक से उन्होनें अपने शरीर में एक गैरमामूली बदलाव महसूस किया, पढ़े लिखे होने के कारण उन्होनें इस चीज़ को नज़रअंदाज़ करना सहीं नहीं समझा और बद से बदतर की उम्मीद करते हुए उन्होनें कैंसर स्पेशलिस्ट से कंसल्ट किया. शक सही निकला और कैंसर की बीमारी कन्फर्म हो गयी, मगर स्टीव जॉब्स को अपनी प्रेरणा मानने वाली सारिका उस स्थिति में भी यह सोच कर खुश थी कि इस बीमारी का पता समय रहते चल गया. उनके इलाज में छः महीने का समय लगा. उस छः महीने के समय के बारे में सारिका बताती हैं कि ” वो समय आसान नहीं था, मेरी भी हिम्मत टूटी ऐसा भी समय रहा जब मैं घंटो रोया करती और मेरा खुद पर से आत्मविश्वास ख़त्म हो चूका था.”

 

 

 

‘आनंदी शीरोज़’ की शुरुआत

कैंसर के उस मुश्किल दौर से गुज़रते हुए उन्होनें इस चीज़ को भी गौर किया कि हमारे देश में कैंसर के बारे में लोगों की सोच काफी अलग और गलत है. लोगों में उसे एक कलकं के रूप में देखा जाता, ऐसा समझा जाता है  कि जिसे कैंसर है अब वह ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रह सकता, कैंसर से जो बच गए लोग उनके प्रति भी काफी उदासीन रवैया रखते थे. इन सब चीज़ों को देख कर उन्होनें  2013 में ‘आनंदी शीरोज़’ (कैंसर पेशेंट सपोर्ट ग्रुप) की शुरआत की और 2016 में पब्लिक ट्रस्ट के रूप में नीति आयोग के अंतर्गत रजिस्टर करवाया. ‘आनंदी शीरोज़’ नाम उन्होनें देश की पहली महिला डॉक्टर आनंदीबाई गोपालराव जोशी  के नाम पर रखा है.

 

 

 

इस पहल में उन्होंने अपने साथ दूसरे कैंसर सर्वाइवर और कैंसर पर रिसर्च कर रहे लोगों को अपने साथ मिलाया और समाज में कैंसर से जुड़ी सोच को बदलने के लिए काम करना शुरू किया. लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा अपने इस पहल से जोड़ने के लिए उन्होनें स्पर्श, नारी, नयी शुरुआत और शक्ति जैसे प्रोग्राम को भी शुरू किया है. आनंदी शीरोज़ इसके माध्यम से लोगों के बीच कैंसर की रोकथाम, सप्पोर्टिव केयर, और कई महत्वपूर्ण मुद्दों के बारे में जागरूकता फैलाता है, जिन्हें हमें भारत में कैंसर के मरीज़ों की बेहतर देखभाल और ध्यान देने की आवश्यकता है. ‘साइंस फॉर सोसाइटी’ भी उनकी इसी तरह की कोशिश में से एक है जहाँ वे कैंसर से जूझ रहे लोगों और उनके परिवारवालों से मिलकर उन्हें कैंसर के बारे में सही वैज्ञानिक जानकारी देती हैं.

 

 

उन्होनें अपने इस अभियान को और मज़बूत बनाने के लिए कई प्रतिष्ठित संस्थानों कई सारे वर्कशॉप्स किये हैं  जैसे आई आई टी रुड़की, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेट्रोलियम देहरादून, ‘कैंसर अवेयरनेस प्रोग्राम’ के नाम से वह दिल्ली के कई जगहों पर समय समय पर वर्कशॉप करती रहती हैं. ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से जुड़ने के लिए उन्होनें  ऍफ़ एम स्टेशन रेडियो ज़िन्दगी, देहरादून से लोगों को अपने इस प्रयास के साथ जोड़ा है.

 

 

उपलब्धियां

अपने एनजीओ के द्वारा समाज में जागरूकता फैलाने के लिए और खुद कैंसर से लड़ कर एक मिसाल बनने के लिए, उन्हें स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा द्वारा डाबर वाटिका ब्रेव एंड ब्यूटीफुल अवार्ड दिया गया है. उन्हें Wellowise द्वारा वर्ल्ड कैंसर डे पर ‘Super Surviovr- Girl Extraordinaire’ पुरस्कार दिया गया है. वह साल 2017 की  YourDOST और TheBetterIndia  द्वारा #WomanOf2017 ऑनलाइन कैंपेन की विजेता भी रहीं हैं.  कैंसर से जुड़ी उनके द्वारा लिखी गयी आर्टिकल को फार्मा बिज़ नाम की प्रसिद्ध जर्नल में भी प्रकाशित किया गया है.

 

 

समाज के लिए सन्देश

स्टीव जॉब्स की एक बात दोहराते हुए वह कहती नहीं कि कोई भी मरना नहीं चाहता है. यहां तक कि जो लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, वे वहां जाने के लिए मरना नहीं चाहते हैं. फिर भी, मृत्यु वह जगह है जहाँ हम सभी को जाना होता है. अब तक कोई भी इससे बच नहीं पाया है, और ऐसा ही होना चाहिए, क्योंकि मौत लाज़मी है और यह  जीवन का रास्ता भी है.

सारिका का यह मानना है कि कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाना किसी एक सरकार, समाज या एक व्यक्ति का काम नहीं है, यह हर किसी की ज़िम्मेदारी है कि हम कैंसर से जुड़े गलतफ़हमियों को दूर करें, कैंसर से बचने के लिए उसके होने वाले कारणों से दूर रहे, कैंसर की इलाज के बारे में लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा बताएं, कैंसर पीड़ित का अच्छे से ख्याल रखें. उनका मानना है कि हम एक कैंसर मुक्त समाज बना सकते हैं ज़रूरत है अपने तरफ से हर किसी की ईमानदार भागीदारी की.

 

तर्कसंगत का तर्क

कैंसर से जूझ कर भी अपने हौसले को बुलंद रखना और न केवल खुद की एक नयी ज़िन्दगी की शुरुआत बल्कि दूसरों कैंसर के रोगियों की ज़िन्दगी, के लिए भी प्रयास करना करना तारीफ़ के काबिल है. सारिका राणा ने यह सब कुछ कर दिखाया है और तर्कसंगत  इसके लिए उनकी सराहना करता है और अपने पाठकों से अपील करता है कि उनके इस एनजीओ से जुड़ कर कैंसर से लड़ रहे लोगों के काम आएं और सारिका की पहल में उनका हाथ बटाएं.  

कैंसर सर्वाइवर से बात करने के लिए और कैंसर से जुड़ी ज़रूरी बातों को समझने के लिए +918755721041 पर व्हाट्स अप के ज़रिये जानकारी ली जा सकती है.

 

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