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हरियाणा के देवदास गोस्वामी पिछले 35 साल से लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार और जरूरतमंदों की सेवा कर रहे हैं

तर्कसंगत

February 5, 2019

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नई दिल्ली से 62 किमी उत्तर में स्थित हरियाणा राज्य के सोनीपत जिले का एक छोटा सा शहर है गणौर. शहर में, जहाँ लोगों को अपनी छोड़ किसी और की फिक्र नहीं है वहीं. 60 वर्षीय देव दास गोस्वामी ने अपने जीवन के 35 साल जरूरतमंदों के लिए समर्पित कर दिया.

यह एक आम बात लग सकती है और ऐसा भी लग सकता है कि देश भर में कई गैर-सरकारी संगठन हैं जो ऐसे काम करते हैं, लेकिन नहीं, गोस्वामी जी की कहानी थोड़ी अलग है. गोस्वामी के पिता वर्ष 1925 में सेना में

थे. अपने बचपन में, गोस्वामी गरीबों और जरूरतमंदों को सड़क पर पड़ा देखा करते थे. जब वह बड़े हुए तो उनके लिए कुछ करने की इच्छा की.

 

यात्रा की शुरुआत

“वर्ष 1978 में, मैंने अपना घर छोड़ दिया. मैं ड्राइवर बनना चाहता था और मेरे पिता इससे बहुत खुश नहीं थे. इसलिए मैंने अपना घर छोड़ दिया और ट्रक चलाना शुरू कर दिया. मैंने जिस ट्रांसपोर्ट एजेंसी के लिए काम किया, उसके पास और भी कई ड्राइवर थे, और मैंने देखा, कि हाइवे पर कई बार, चालक कुत्तों और अन्य जानवरों को मारते हुए निकल जाते थे. मेरे लिए जो कष्टदायक था वह यह था कि ड्राइवर उनकी मदद करने के लिए कभी नहीं रुके. गोस्वामी ने तर्कसंगत से बातचीत में कहा कि “वे ड्राइवर मरे हुए, घायल या अधमरे जानवरों को यूँ ही छोड़ दिया करते थे.”

इससे  बेहद परेशान होकर, गोस्वामी ने ड्राइवरों के मुखिया को इस बारे में सूचित किया. बदले में उन्हें ही पीट दिया गया.

“उस दिन के बाद से, मैंने अपने दिमाग में किसी भी मरे हुए जानवर को दफनाने का मन बना लिया. मैं एक कुदाल और अन्य औज़ार अपने साथ रखता जो कब्र खोदने में मदद करते थे. हाईवे पर चाहे मुझे कितने भी मरे हुए जानवर मिलें, मैंने उन्हें अपने हाथों से दफनाया. मैं उन बाकी लोगों की तरह कभी नहीं हो सकता” उन्होंने कहा.

 

 

गोस्वामी यह महसूस करते रहे कि उनके जीवन से कुछ कमी थी और वह इसके लिए कुछ करना चाहते थे. कई अन्य लोगों के विपरीत, जो शायद इंजीनियर या डॉक्टर बनना चाहते हैं, गोस्वामी की महत्वाकांक्षा थोड़ी अलग थी. वह केवल आठवीं कक्षा पास थे. वह मदद करना चाहते थे. वह लोगों, जानवरों और किसी की भी मदद करना चाहता था, जिसे मदद की ज़रूरत थी, और इसी में उन्होनें अपना जीवन समर्पित कर दिया.

 

जरूरतमंदों की मदद करना

“जब मैंने अलग-अलग सड़कों पर ट्रक चलाया, तो मैंने कई बेघर लोगों को देखा जिनके पास कपड़े नहीं थे, खाने के लिए खाना नहीं था और उनके पास  कोई पहचान नहीं थी. उन्हें उस तरह छोड़ने में मेरे दिल को तकलीफ होती थी.”

कुछ वर्षों के बाद, गोस्वामी घर वापस आ गए और अपनी माँ के समर्थन के साथ, वे बेघर लोगों को अपने घर लाने लगे और उनकी देखभाल करने लगे.

“जब से मैंने परिवहन सेवा को छोड़ा है, मैं लोगों की हर तरह से मदद कर रहा हूँ. मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और मेरी माँ मेरी ताकत के आधार रहे हैं, ”गोस्वामी ने कहा.

इसके बाद गोस्वामी ने लावारिस मृतकों का अंतिम संस्कार करना शुरू कर दिया. इस समय तक, उन्होंने कई टेंट बना लिए थे जहाँ वे बेघर लोगों को रखते थे, और उनमें से कई बीमार होते थे, जब वे मर जाते, तो गोस्वामी और उनकी पत्नी ने उनका अंतिम संस्कार करते. न केवल ये दोनों, बल्कि जो लोग उन्हें जानते थे वह भी खुशी-खुशी मदद करने आते थे.

 

 

“मेरे और मेरी पत्नी के आसपास ऐसे लोग थे जो ये कहते थे कि हमने अपनी पवित्रता खो दी है, खासकर इसलिए क्योंकि एक ऐसी दुनिया में जहाँ लोग अपने धर्म के आधार पर दूसरों के साथ भेदभाव करने से नहीं हिचकिचाते हैं, मैं हिन्दू होने के नाते, मुसलमानों के शवों को अपने कंधों पर उठया करता था. मैंने कभी भी भेदभाव में नहीं बल्कि मानवता में विश्वास किया है. मैं हमेशा लोगों की मदद करना चाहता था, चाहे वे किसी भी जाति, पंथ या धर्म के हों. मेरी पत्नी, तारा, मोहल्ले की पहली महिला थीं, जिन्होंने मुस्लिमों सहित दूसरे शवों को अपने कंधों पर उठाया था.” उन्होंने कहा.

लोगों की मदद करने के अलावा, वे कई स्ट्रीट डॉग को हर दिन भोजन करते हैं. लोगों जब उनसे कुत्तों के कारण गंदगी फैलने की शिकायत करते हैं, तो वे लोगों को अपने घर के दरवाजे पर एक कटोरी पानी और थोड़ा-सा भोजन रखने को कहते हैं, क्योंकि कुत्ते केवल यही चाहते हैं.

 

सालों की निःस्वार्थ  सेवा

“दिल्ली में तिहाड़ जेल के पास एक फ्लाईओवर के नीचे, मैंने बेघर लोगों के लिए घर बनाया था जिनकी मैं मदद करता हूँ लेकिन, सरकार ने मुझे कुछ समय के लिए लोगों को कहीं और स्थानांतरित करने के लिए कहा, जिसके बाद उन्होंने कहा कि वे एक घर प्रदान करेंगे. लेकिन मुझे सरकार से कभी कोई मदद नहीं मिली, बल्कि लगभग 20 से 25 लोग हैं, कुछ विदेश से भी हैं, जो मेरे काम में मेरी मदद करते हैं. उन्होंने जो पैसा दिया है, उससे आज मैं एक उचित भूमि में एक उचित घर बनाने की कोशिश कर रहा हूँ जहाँ मैं इन लोगों को रहने दे सकूँ. मैं उन्हें अब किसी भी हाल में टेंट में नहीं रखना चाहता.”

कुछ साल पहले गोस्वामी की बेटी रेखा की शादी होने वाली थी, और उसकी माँ ने इस उद्देश्य के लिए बहुत बड़ी रकम बचाई थी.

“फ्लाईओवर के नीचे घर बनाने के लिए, मैंने वो सारा पैसा लगा दिया. मेरी बेटी की शादी आज तक नहीं हुई है. हालांकि, अच्छी खबर यह है कि वह इस साल फरवरी में शादी करने वाली है और बहुत से लोगों ने मेरी मदद करने का वादा किया है. मेरे पास व्यक्तिगत रूप से उसकी मदद करने के लिए कोई पैसा नहीं है. मुझे जो भी पैसा मिलता है वह जरूरतमंदों की मदद करने में जाता है, और मैं इसे कहीं और इस्तेमाल नहीं करूंगा. उनके बेटे कमल की शादी हो चुकी है.

 

 

कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग कितना मदद करते हैं, पर्याप्त धन होना अभी भी एक समस्या है, और गोस्वामी को उम्मीद है कि अधिक लोग उनकी मदद के लिए आगे आएंगे. उन्होंने देव एनिमल वॉलन्टरी आर्गेनाईजेशन नाम से एक एनजीओ भी बनाया है, लेकिन यह केवल जानवरों के लिए काम नहीं करता है.

उन्होंने कहा, “हमने 5,000 से 10,000 महिलाओं की शादी कराने में मदद की है और हम कक्षा I से V तक के बच्चों को भोजन, किताबें, कपड़े, तौलिए, स्टेशनरी और अन्य चीजें प्रदान करते हैं, जिनकी उन्हें जरूरत है.”

15 से 85 वर्ष की उम्र के लोग हैं जो मानसिक रूप से ठीक नहीं हैं, जो एक-दूसरे से नहीं बल्कि खुद से बात करते हैं और एनजीओ उन्हें उचित जीवन जीने में मदद करता है. वे उन्हें खेल में उलझाए रखते हैं. वे लोगों को दूध और दूध से बने उत्पाद उपलब्ध कराने के लिए गायों की देखभाल भी करते हैं.

“कई लोगों ने धन देकर मेरे काम में मेरी मदद की है, सिग्नेचर ग्लोबल नामक एक फर्म से सरदार उज्ज्वल सिंह और प्रदीप अग्रवाल हैं. इस फर्म ने हमें कई तरह से सहायता की है, ”गोस्वामी ने कहा.

 

 

गोस्वामी की सबसे बड़ी इच्छा केवल उन लोगों के लिए एक डिस्पेंसरी बनाने की है जिनकी वो मदद करते हैं. वह कहते हैं कि सरकारी अस्पताल अक्सर हमारी ज़रूरत के हिसाब से मदद नहीं देते हैं और न ही वे किसी पर निर्भर रहना चाहते हैं. हालांकि, अब वह एक एम्बुलेंस के मालिक हैं.

“मैं एक गरीब आदमी हूँ और मैं मुश्किल से अपने लिए कुछ कमाता हूँ. मैं वह खाता और पहनता हूँ जो दूसरे मुझे देते हैं, और ईमानदारी से कहूँ  तो ऐसा मैं कुछ भी नहीं करने जा रहा हूँ जिससे मुझे व्यक्तिगत रूप से कुछ फायदा हो. मैं देश के हर हिस्से में बेघरों के लिए घर बनाना चाहता हूँ. मैं दूसरों की सेवा करने के लिए जी रहा हूँ, और उनकी मुस्कान मेरा प्रतिफल है. मैं उनसे पैसे नहीं लेता. मैं मरने के बाद याद किया जाना चाहता हूँ. मुझे प्रसिद्धि नहीं चाहिए, लेकिन मुझे वह प्यार चाहिए जो मुझे इतने सालों से मिल रहा है. मुस्कान और कुछ प्यार से बेहतर रिटर्न गिफ्ट क्या हो सकता है? ”गोस्वामी ने कहा.

भौतिकवादी जरूरतों से भरे लोगों में, एक ऐसी दुनिया में जो हर दिन हिंसा और अपराध का गवाह बनती है, देव दास गोस्वामी जैसे व्यक्ति का अस्तित्व हमारे दिलों में आशा को जीवित रखता है. तर्कसंगत  समाज के लिए निस्वार्थ सेवा के लिए उनको सलाम करता है.

 

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