मेरी कहानी

मेरी कहानी: “हर 4 साल में, आर्म-चेयर स्पेशलिस्ट ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन की आलोचना करते हैं”

तर्कसंगत

February 6, 2019

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मैंने इस बात की गिनती रखनी छोड़ दी है कि भारत में लोगों ने कितनी बार मुझसे पूछा है: “स्पोर्ट पार्ट टाइम है / आप तैराकी के अलावा क्या काम करते हैं?” यह वह जगह है जहाँ सबसे अधिक शिक्षित लोग भी गलत सोचते हैं. लोग मानते हैं कि खेल में अपने देश का प्रतिनिधित्व करने में ज्यादा मेहनत नहीं लगती है और यह काफी आसान है.

इस चीज़ को और बेहतर से समझने के लिए इतना समझ लीजिये कि एक तैराक आमतौर पर एक सप्ताह में 50 किमी तैरता है और 4 जिम सेशन दिन के करता है. सर्दियों सहित 50 ट्रेनिंग वीक मानते हुए, एक तैराक लगभग 2500 किमी एक साल में तैरता है, फिर कई अन्य छोटी चीजें जैसे डाइट, नींद, के साथ साथ पढ़ाई लिखाई आदि चीज़ पर भी ध्यान देने की भी ज़रूरत होती है, इतना सब करते हुए भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि एक तैराक एक राष्ट्रीय चैंपियन होगा या भारतीय टीम में जगह बना पायेगा कि नहीं. मैडल कुछ माइक्रोसेकंड में जीते या हारे जाते हैं.

सिर्फ राज्य / राष्ट्रीय स्तर पर भाग लेने में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मैडल जीतने में ज़मीन आस्मां का फ़र्क़ है. हर 4 साल में,  हर बार अलग अलग क्षेत्र के ‘आर्म-चेयर स्पेशलिस्ट’ अपनी आराम कुर्सी पर बैठे बैठे भारत के प्रदर्शन की आलोचना करते हैं, बिना इस चीज़ को समझे हुए कि वहां तक पहुँचने के लिए क्या करना पड़ता है.

अगर यह इतना आसान और सीधा होता, तो कई लोग खेल को करियर के रूप में अपना रहे होते. अगली बार जब आप किसी खेल से किसी एथलीट से मिलें, तो यह समझने की कोशिश करें कि मैडल जीतने के लिए कितनी मेहनत करनी होती है.

 

I have lost count of how many times people in India have asked “Sport is part time/ What job do you do apart from…

Posted by Anshul Kothari on Sunday, 27 January 2019

 

कहानी: अंशुल कोठारी

 

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