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सीबीआई बनाम ममता बनर्जी: सीबीआई के पास कितना अधिकार है?

तर्कसंगत

February 6, 2019

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लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही कोलकाता एक राजनीतिक बवंडर में फंस गया है. पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी के खिलाफ तख्तापलट की साजिश का आरोप केंद्र पर विशेष रूप से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह आरोप लगाते हुए, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 3 फरवरी की रात को राजधानी कोलकाता में “संविधान बचाओ” अभियान की शुरुआत की.

 

विवाद आखिर था क्या?

विवाद तब शुरू हुआ जब सीबीआई के 40 अधिकारीयों की टीम कोलकाता पुलिस के कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ करने के लिए रविवार शाम को उनके घर पहुंची. वे कथित तौर पर रोज़ वैली और शारदा घोटाले सहित पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न पोंजी घोटाले की “दबाने” में कुमार की भूमिका की जांच करने गए थे. इस बीच, कोलकाता पुलिस की एक टीम ने सीबीआई के आठ अधिकारियों को घेर लिया जो कुमार के घर पर गए थे. टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया कि स्थानीय पुलिस सीबीआई के लोगों को पास के शेक्सपियर सरानी पुलिस थाने ले गई, जिसके बाद सारा विवाद बढ़ा सीबीआई के लोगों ने अपने स्तर से राज्यपाल से संपर्क साधने की कोशिश की सीबीआई की टीम भी डरी हुई थी, सीबीआई के कोलकाता ऑफिस को पुलिस ने घेर लिया यह देखते हुए केंद्र ने सीआरपीएफ की टुकड़ी मैदान में उनके सामने उतार दी. कल्पना कीजिये उस घड़ी की एक ही राष्ट्र के लॉ एंड आर्डर मशीनरी एक दूसरी के खिलाफ खड़ी हो फिर जनता किस पर विश्वास करे. कोलकाता के कमिश्नर राजीव कुमार उस विशेष जांच दल (एसआईटी) का नेतृत्व कर रहे थे जो सीबीआई से पहले इन घोटालों की जांच कर रही थी.

हालांकि,  इन सभी राजनीतिक ड्रमों के बीच विभिन्न राज्यों में सीबीआई के कामकाज के संबंध में एक महत्वपूर्ण सवाल उठने लगे हैं . सीबीआई एक राष्ट्रीय एजेंसी है जिसे देश के किसी भी राज्य में जांच करने का अधिकार है मगर उसकी भी कुछ सीमाएं हैं. वर्तमान में कानून केवल सीबीआई को अन्य राज्यों की सहमति से अपने अधिकार क्षेत्र (दिल्ली और केंद्र शासित प्रदेशों) के बाहर काम करने की अनुमति देता है.

 

“जनरल कंसेंट” क्या है?

पश्चिम बंगाल राज्य के लिए, 1989 में तत्कालीन वाम मोर्चे ने सीबीआई को यह जनरल कंसेंट दी थी, जिसे वर्तमान ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार ने नवंबर 2018 में वापस ले लिया था. टीएमसी के नेतृत्व वाली सरकार ने आंध्र प्रदेश में हुए सीबीआई से जुड़े विवाद के बाद ऐसा किया था. जनरल कंसेंट एक राज्य सरकार द्वारा  समय समय पर दी जाने वाली जांच के सम्बन्ध में अनुमति है जो सीबीआई और दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 1946 के तहत अन्य एजेंसियों को दी जाती है.

द हिंदू के एक लेख के अनुसार, राज्यों द्वारा अपनी जनरल कंसेंट वापस लेने का उदाहरण सिक्किम में सबसे पहले हुआ है जब सीबीआई द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री नर बहादुर भंडारी के खिलाफ मामला दर्ज किए जाने के बाद राज्य ने अपनी सहमति वापस ले ली थी. नेताओं द्वारा जनरल कंसेंट वापस लिए जाने के कारणों में मुख्य रूप से केंद्र-राज्य के संबंधों में तनाव रहा है, राज्य के मामलों में सीबीआई का हस्तक्षेप और एजेंसी द्वारा केंद्र की विपक्षी दलों के खिलाफ दुरुपयोग किया जाता है, जैसा कि पश्चिम बंगाल में हो रहा है.

कथित तौर पर, जनरल कंसेंट की वापसी सीबीआई को राज्य में नए मामले की जांच करने से रोकती है. हालांकि, 1994 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किया कि मौजूदा मामलों को उनके फैसले तक पहुँचाने के लिए अनुमति दी जाएगी. सीबीआई को विशिष्ट मामलों के संबंध में राज्यों से व्यक्तिगत सहमति लेने का भी अधिकार है. इसके अलावा, अधिकांश मामलों में, राज्यों ने केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ सीबीआई जांच के लिए अपनी सहमति दी है, साथ ही एक एजेंसी संसद सदस्य की जांच भी कर सकती है.

हालांकि, वर्तमान में, विपक्षी दल देश की संघीय प्रकृति को नष्ट करने का आरोप लगाते हुए केंद्र सरकार को घेर रही है. हालांकि, सीबीआई का कहना है कि सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा ने 2018 में राज्य के डीजीपी को लिखा था, जहां उन्होनें “पूर्ण सहयोग” का वादा किया था.

 

तर्कसंगत का तर्क

शारदा चिट फण्ड का खुलासा 2013 में हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने साल 2016 में सीबीआई जांच के आदेश दिए, इसके पहले और बाद इस केस से जुड़े कई लोगों पर आरोप लगते रहे और जैसे जैसे वे बीजेपी में शामिल होते रहे, आरोप लगाने का दौर खत्म होता गया. बीते कुछ समय में आगामी चुनाव के कारण विपक्ष गठबंधन ने अपना शक्ति प्रदर्शन कोलकाता में ममता बनर्जी के नेतृत्व में किया. सीबीआई की अपनी आंतरिक लड़ाई भी जग जाहिर हो चुकी है, सीबीआई के अंतरिम निदेशक नागेश्वर राव का भी कार्यकाल जब यह सब मामला हुआ उसके कुछ घंटों में समाप्त होने वाला था. कोलकाता सरकार का कहना है कि उन्हें पहले से सूचित नहीं किया गया कोई भी कागज़ी करवाई नहीं हुई थी. सीबीआई ने इस पर उस वक़्त कुछ जवाब नहीं दिया बाद में आनन फ़ानन में कुछ ज़रूरी प्रक्रियाएं पूरी की गयीं. मगर किसी पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करने के लिए 40 लोगों की टीम कि क्या आवश्यता थी? क्या सीबीआई को पहले से अंदाजा था कि वो कुछ ऐसा करने जा रही है जिसमें संख्या बल की भी ज़रूरत पड़ेगी? सीबीआई को ऐसी कौन सी ख़ुफ़िया जानकारी मिली की सुबह का इंतज़ार किये बगैर वह पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करने उनके घर पहुंची और फिर उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश की. सीबीआई का कहना है की राजीव कुमार जांच से समबन्धित इलेक्ट्रॉनिक सबूतों से छेड़छाड़ की है. क्या सीबीआई को अपनी तरफ से सारी तैयारियां पुख्ता नहीं करनी चाहिए थीं ?

सुप्रीमकोर्ट न हालाँकि राजीव कुमार को जांच में सहयोग करने को कहा है मगर गिरफ्तारी की बात नहीं कही है, इस फैसले को केंद्र और राज्य दोनों ही अपनी अपनी जीत बता रहे हैं. जांच में अगर पुलिस कमिश्नर भी दोषी हैं तो सजा मिलनी चाहिए, मगर संवैधानिक पद पर कार्यरत पुलिस के आला अधिकारी की गिरफ़्तारी के लिए सीबीआई की ऐसी हड़बड़ी कुछ हद तक उसी की फ़ज़ीहत करा बैठी.

तर्कसंगत ये अनुरोध करता है कि केंद्र और राज्य इस केस या किसी भी केस में अपनी निजी मतभेदों को अलग रख कर जनता के डूबे पैसों की फक्र करें संविधान के तहत कदम उठाएं.

 

 

 

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