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रिसर्च से पता चला है कि कपड़ों के मेजर वेस्टर्न ब्रांड भारतीय कामगारों को केवल प्रति घंटे 11 पैसे देते हैं

तर्कसंगत

February 6, 2019

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कंज़्यूमर के रूप में हम अपने कपड़ों की चमक दमक की तारीफ़ करते नहीं थकते हैं, लेकिन हम ध्यान नहीं देते हैं कि असल में जो कपड़े बनाते हैं वह असली तारीफ़ के काबिल हैं, उनमें से कुछ दुनिया की कमजोर महिलाएं और लड़कियां हैं.

लगभग एक हफ्ते पहले ही यह खुलासा हुआ स्पाइस गर्ल्स टी-शर्ट बनाने वाली बांग्लादेश की एक फैक्ट्री में महिलाओं को एक घंटे में 35 पैसे मिलते हैं. ये टी-शर्ट कॉमिक रिलीफ के लिए पैसे कमाने के लिए बनाए गए थे. हालांकि, एक नई रिपोर्ट में अब भारत में इस तरह के शोषण का खुलासा किया गया है.

 

रिसर्च में क्या मिला

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक रिसर्च में पता चला है कि सबसे अधिक समाज के नीचले तबके से संबंधित महिलाएं और लड़कियां कई घरों में लगभग 11 पैसे के भुगतान पर काम करती हैं.

द गार्जियन ने बताया कि एक व्यापक स्तर पर किये गए रिसर्च में, यह पाया गया कि इनके कामों में कपड़ों की कढ़ाई, टैसलिंग, बीडवर्क और बटन लगाना शामिल हैं. सिद्धार्थ कारा के अनुसार, रिपोर्ट के लेखक और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने कहा कि प्रत्येक प्रमुख ब्रांड से लेकर प्रत्येक बुटीक रिटेलर, वास्तव में, देश में कपड़ों की सोर्सिंग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस मुद्दे के बारे में मालुम है.

रिसर्च के अनुसार, पांच में से एक कपड़ा व्यापारी 17 साल या उससे कम उम्र का था. शोधकर्ताओं ने 1,452 श्रमिकों का साक्षात्कार लिया है, और उनमें से सबसे युवा 10 वर्ष के थे. हालाँकि, शोधकर्ताओं ने कई छोटे बच्चों को भी देखा. उत्तरी भारत में दस में से एक व्यक्ति को ज़बरदस्ती इस काम में लगाया गया है, और 6% बंधुआ मजदूरी में फंसे पाए गए. बंधुआ मजदूरी में, किसी के कर्ज का भुगतान करने के लिए काम किया जाता है. शोध में पाया गया कि तीन-चौथाई महिलाओं ने बताया कि, पैसे की कमी और पारिवारिक दबाव के कारण वो इस काम में शामिल हैं. मजदूरी कर रहे दो-तिहाई  बच्चे तो पहले से ही स्कूल छोड़ चुके थे.

 

रिसर्च में क्या सामने आया

इन महिलाओं के पास कोई रिटेन कॉन्ट्रैक्ट नहीं है न ही वे एक ट्रेड यूनियन से संबंधित हैं, इसलिए वे किसी भी प्रकार के अपमानजनक या अनुचित व्यवहार की शिकायत नहीं कर सकती हैं. 99.2% महिलाएं ज़बरन काम करने को मजबूर हैं; उन्हें उनके लिए न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता. कई मामलों में, उन्हें केवल न्यूनतम वेतन का दसवां हिस्सा मिलता है. मजदूरी का भुगतान भी देर से किया जाता है, और कई श्रमिकों को समय पर काम पूरा करने में विफल रहने के लिए दंडित भी किया जाता है. क्रिसमस जैसे व्यस्त समय के दौरान, जब दुकानें माँगों को पूरा करने की जल्दी में थीं, तो ऐसी समस्याएँ और भी बदतर हो जाती हैं.

“कल्पना कीजिए कि आप एक घंटे में 11, 12, 14 पैसे कमा रहे हैं. फिर कल्पना करें कि आपके भुगतान समय पर नहीं हैं, उन्हें एक या दो महीने की देरी है. फिर आप कल्पना करें कि आपको एक आदेश दिया गया है जिसे पूरा करने में आपको पांच दिन लगेंगे और अगर आप इसे समय पर पूरा नहीं कर पाए तो आपको पाइए भी नहीं मिलेंगे ”कारा ने कहा.

ये महिलाएं हफ्तों या महीनों के लिए,अपने घरों को छोड़ने में असमर्थ हैं, कई पुरानी बीमारियाँ जैसे पीठ दर्द और आँखों की रोशनी कम होना इनके लिए आम बात है. जिन श्रमिकों का इंटरव्यू लिया गया, उनमें से किसी को भी काम करते वक़्त लगे चोट के लिए पैसे नहीं मिले हैं.

हालाँकि रिपोर्ट में किसी भी ब्रांड का नाम विशेष रूप से नहीं है, लेकिन अध्ययन में पाया गया कि इन होम बेस्ड लेबर में से 85%  यूरोप और अमेरिका के कपड़ों के सप्लाई चैन का हिस्सा थे.

कारा ने कहा, कुछ सप्लायर फैक्टरियों में कंपनियों द्वारा दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रयास किए गए हैं. हालांकि, वे शायद होम बेस्ड लेबर के परशानियों को दूर करने के लिए काफी नहीं हैं.

 

तर्कसंगत का तर्क

एक्सपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग के लिए, भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री दुनिया में सबसे बड़ी है. अनफॉर्मल फैक्ट्री यहाँ 12.9 मिलियन लोगों को रोजगार देती है, और एक तरह से, लाखों होम बेस्ड लेबर को इस, सेटिंग्स में काम दिया जाता है.भारत से कपड़ों की सोर्सिंग करने वाले कपड़े ब्रांड महिलाओं को नौकरी के अवसर देते हैं. हालांकि यह उनके लिए एक फायदा हो सकता है, लेकिन जलालत व्यवहार और कम आमदनी के कारण ये एक लोड में बदल जाता है.

बंधुआ मजदूरी और ज़बरदस्ती काम में लोगों को शामिल करना एक अपराध है, और तर्कसंगत उम्मीद करता हैं कि इन मुद्दों को अधिक गंभीरता से संबोधित किया जाता है.

 

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