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जानिए बजट 2019: 3,000/- रुपये की पेंशन, उन अनौपचारिक मजदूरों के लिए जो प्रतिमाह 15,000/- रुपये तक कमाते हैं.

तर्कसंगत

Image Credits: Wikimedia

February 7, 2019

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आम चुनाव से कुछ महीने पहले, 1 फरवरी, शुक्रवार को कार्यकारी वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने वर्तमान कार्यकाल के लिए मोदी सरकार का अंतरिम और आखिरी बजट पेश किया. अन्य अच्छी अच्छी योजनाओं के बीच केंद्रीय मंत्री ने एक और घोषणा की, जिसको उन्होनें अब तक का एक ‘मेगा पेंशन प्लान’ बताया. योजना का नाम – प्रधान मंत्री श्रम योगी मानधन रखा. सत्ताधरी पार्टी द्वारा इस योजना को नया बताया जा रहा है, वहीं कई लोग इसकी आलोचना भी कर रहे हैं, वे इसे नई योजना में पुराने वादे कह रहे हैं. अनऑर्गनाइज़्ड सेक्टर के कारीगरों के साथ काम करने वाले व्यापारी संघ और कार्यकर्ताओं का दावा है कि मौजूदा स्कीम ज्यादा फायदेमंद नहीं है और बेहतर परिणामों के लिए योजना में कुछ सुधार करना होगा.

 

योजना क्या है ?

संसद में पेंशन योजना की घोषणा करने से पहले श्री गोयल जी ने कहा, भारत के जी.डी. पी. का आधा हिस्सा अनऑर्गनाइज़्ड सेक्टर के उन 42 करोड़ मज़दूरों के पसीने और मेहनत से आता है जो मकान बनाने का, रिक्शा चलाने का, कचरा उठाने का, सड़क पर ठेला लगाने का, खेती, बीड़ी, चमड़ा आदि का काम करते हैं. घरेलू कारीगरों की संख्या भी बहुत है और हमें उन्हें वृद्धावस्था के लिए एक व्यापक सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना चाहिए”

श्री गोयल के अनुसार, प्रधान मंत्री श्रम योगी मानधन योजना, जो अगले पांच वषों में दुनिया की सबसे बड़ी पेंशन योजना के रूप में उभर सकती है, 60 वर्ष से अधिक के आयु के मजदूरों को 3000/- रूपये की मासिक पेंशन का आश्वासन देती है. योजना का लाभ उठाने के लिए, अगर कोई 29 वर्ष की आयु में योजना में शामिल होता है तो उसे 100 रूपये का प्रतिमाह योगदान करना होगा और यदि 18 वर्ष की आयु में शामिल होता है तो 55 रूपये प्रतिमाह का योगदान करना होगा और उसके बाद कुल धनराशि उनके पेंशन खाते में जोड़ दी जाएगी. गोयल जी ने बताया कि यह योजना उन मज़दूरों को लाभ प्रदान करेगी जिनकी आय 15000/- रूपये तक है. शुक्रवार को मेगा योजना के बारे में बात करते हुए मंत्री ने कहा कि केंद्र ने योजना के लिए 500 करोड़ रूपये आवंटित किये हैं, जिससे 10 करोड़ मजदूरों को लाभ मिलने की उम्मीद है. मंत्री जी ने यह भी बताया कि यदि ज़रूरत पड़ी तो निर्धारित धनराशि को बढ़ाया भी जा सकता है. उन्होनें यह भी कहा कि यह योजना इसी वर्ष से ही लागू होगी.

यह पेंशन योजना नई नहीं है, इससे पहले अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को पेंशन देने के लिए शुरू की गई थी.

जब से वित्त मंत्री ने भाजपा की इन बड़ी योजनाओं की घोषणा की है, जो मजदूरों को लाभ पहुँचाने के लिए बानी है, कई लोगों ने इस योजना में कुछ खामियां भी बताई हैं वही कुछ ने इस योजना के बारे में यह भी कहा है कि  ‘ये चालाक हाथों की सफाई वाली योजना है जिससे किसी को कुछ नहीं मिलेगा.’

 

अटल पेंशन योजना की तरह

गत वर्ष 2015 में, केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने अटल पेंशन योजना की घोषणा की थी, जोकि वर्तमान योजना के समान ही है. अटल पेंशन योजना भी अनऑर्गनाइज़्ड लेब्रोन को सहायता प्रदान करती है. अब जब कि एक नई योजना आ गई है तो कई लोगो का मत है कि नई योजना पुरानी अटल पेंशन योजना का एक विस्तृत रूप है.

अटल पेंशन योजना अपने ग्राहक द्वारा दी गई राशि के आधारपर 1000, 2000, 3000, 4000और 5,000 रूपये की न्यूनतम पेंशन प्रदान करती है. अटल पेंशन योजना के तहत, योजना में शामिल होने की आयु सीमा 18- 40 है, जिसकी आलोचना की गई थी. 18 वर्ष  की आयु में इस योजना में शामिल होने वाले क्रमश 42 और 210 रूपये प्रतिमाह देकर 1000 से लेकर 5000 तक की धनराशि का लाभ उठा सकते हैं साथ ही जो 40 वर्ष में शामिल होते हैं वे 291 से लेकर 1454 रूपये प्रतिमाह देकर इस योजना का लाभ उठा सकते हैं. अटल पेंशन योजना, पेंशन के ज़रिये अनिवार्य बैंक खाते की आवश्यकता का भी उल्लेख करती है. इस योजना के अनुसार,

सरकार को कुल राशि का 50% प्रतिशत या प्रतिवर्ष 1,000 रूपये, पांच वर्ष तक के लिए सहयोग करना था.

 

आलोचनाएं

लागू होने के दो साल बाद भी, असंगठित वर्ग के लिए 42 करोड़ रूपये की लागत वाली इस योजना ने फरवरी 2017 तक केवल 42.8 लाख मजदूरों को लाभ दिया है. बजट 2019 में, वित्त मंत्री ने इस योजना का उल्लेख भी नहीं किया है और यह भी नहीं बताया कि इस योजना ने गत तीन वषो में  कैसा प्रदर्शन किया है. पेंशन फंड रेगुलेर्टरी एंड डेवलपमेंर्ट अथॉररर्टी के मुताबिक, अटल पेंशन योजना के तहत, 48% लोग ऐसे हैं, जिन्होनें 1,000 रूपये की सबसे कम पेंशन वाले विकल्प को चुना है.

 

अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस की महासचिव,अमरजीत कौर ने यह दावा किया कि नई योजना में कुछ भी जोड़ा नहीं गया है. उन्होनें यह भी कहा कि  ईपीएफओ पहले से ही अनऑर्गनाइज़्ड सेक्टर के मजदूरों के लिए पेंशन प्रदान करता है. द वायर से बात करते हुए, वह कहती है कि अगर सरकार के पास लाभ का विस्तार करने या  राशि को बढ़ाने की स्पष्ट रणनीति नहीं है, तो योजना में नया कुछ भी नहीं है. सेण्टर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियंस  के महासचिव तपन सेन ने प्रधानमंत्री श्रम-योगी मानधन योजना की आलोचना करते हुए कहा कि जिन मजदूरों के पास स्थिर आय नहीं है, वे पेंशन के

लिए मासिक योगदान कैसे कर पाएंगे जिससे उन्हें 60 वर्ष की आयु के बाद कुछ मिले. वह सरकार से सवाल करते है, “क्या सरकार इसकी भरपाई करेगी? उन्हें कैसे पंजीकृत किया जाएगा जब वे अक्सर रोजगार बदल रहे हैं?” जबकि कौर का कहना है कि किसी भी मज़दूर के लिए प्रतिमाह 3,000 रूपये की पेंशन बहुत कम है. द वायर को उन्होनें  बताया “इन कर्मचारियों की मांग 7,000 रूपये और एक गरिमामयी आजीविका के

लिए मासिक पेंशन की है.”

अर्थशास्त्री और कार्यकर्ता दीपा सिन्हा ने द स्क्रॉल से कहा कि 100 रूपये का योगदान गरीब लोगों के लिए बहुत है, यही कारण है कि वे इसे मासिक आधार पर नहीं कर सकते हैं. “उनके

लिए 3,000 रूपये के लिए लम्बे समय तक इंतज़ार करना संभव नहीं है. 60 वर्ष के होने पर 3000 का मूल्य क्या होगा? उन्होनें कहा कि गरीब लोगों को अपनी दैनिक जरूरतों का ध्यान भी रखना होगा. कई अन्य लेबर एक्टिविस्ट जो ‘मेगा पेंशन योजना’ की आलोचना कर रहे हैं, उनका कहना है कि पेंशन प्रदान करना सरकार की जिम्मेदारी है. लेबर एक्टिविस्ट ने वायर से ये भी कहा कि ‘योगदान राशि कितनी भी कम हो, मजदूरों को इसका भुगतान नहीं करने देना चाहिए.’

 

मजदूरों की लाइफ एक्सपेक्टेंसी (औसत जीने की उम्र) बहुत कम है

लाभार्थी की आयु के रूप में 60 वर्ष निर्धारित करने के लिए भी इस योजना की आलोचना की जा रही है. कई आलोचकों का दावा है कि जब यह पेंशन योजना मजदूरन के लिए मेच्योर होगी, तब तक कई मजदूर इसका लाभ प्राप्त करने के लिए जीवित ही नहीं रहेंगे.

विद्वानों और रीसर्चर्स का दावा है कि भारत में कमजोर सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले लोगों के लिए लाइफ एक्सपेक्टेंसी कम है. हमारे देश में, सामाजिक-आर्थिक आधार पर, लाइफ एक्सपेक्टेंसी भी बदलती है. लाइफ एक्सपेक्टेंसी अलग-अलग सेक्टर मेदिन अलग होती है. अभी के लिए, भारत में वर्तमान औसत लाइफ एक्सपेक्टेंसी 68.8 वर्ष है और ग्रामीण पुरुषों के लिए, यह 65 वर्ष है.

असंगठित क्षेत्र के कामों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों की भी बड़ी संख्या है, जिनकी अप्पर मिडिल क्लास के भारतीयों की तुलना में जीने की उम्र कम है.

 

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