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तमिलनाडु: 14 स्वीपर की नौकरी के लिए 4000 से अधिक आवेदक, जिनमें ज्यादातर एमबीए और इंजीनियर हैं

तर्कसंगत

Image Credits: Zee News

February 7, 2019

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ऐसे समय में जब नौकरियों की कमी केंद्र और विपक्ष के बीच विवाद की एक प्रमुख हड्डी बन गई है, वहीं 4,000 लोग, जिनमें ज्यादातर इंजीनियरिंग ग्रेजुएट और एमबीए हैं उन्होनें, चेन्नई में राज्य विधानसभा सचिवालय में 14 सेनेटरी वर्कर्स की नौकरी के लिए रजिस्ट्रेशन किया है.

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, बड़ी संख्या में न केवल इंजीनियरिंग और एमबीए स्नातक, बल्कि कॉमर्स, आर्ट्स और विज्ञान से संबंधित उम्मीदवार ने इस नौकरी के लिए अर्ज़ी भरी है. लगभग 3930 उम्मीदवारों को एडमिट कार्ड भेजे जा चुके हैं. 14 खाली स्थानों में से, 10 सफाई कर्मचारी की भूमिका के लिए हैं, जबकि 4 विधानसभा सचिवालय में सैनिटरी लेबर के लिए. इसके लिए, दोनों का वेतन 15,700 रुपये से 50,000 रुपये के स्लैब में तय किया गया है. शैक्षणिक योग्यता का कोई ज़िक्र नहीं है, मगर फिजिकल फिटनेस ज़रूरी है.

यह कोई नई घटना नहीं है, क्योंकि 2018 के अगस्त में यूपी पुलिस के टेलीकॉम विंग में 54,230 ग्रेजुएट , 28,050 पोस्ट ग्रेजुएट और 3,740 पीएचडी धारकों ने चपरासी के 62 पदों के लिए आवेदन भरा है.

 

दूसरे राज्यों में भी ऐसे ही उदाहरण हैं

मई में घोषित 4,225  हरियाणा पुलिस की कांस्टेबल भर्तियों में 2,000 से अधिक एमबीए, एमटेक और लॉ ग्रेजुएट शामिल थे.

डॉक्टरों, वकीलों और इंजीनियरों सहित दो लाख आवेदकों ने अप्रैल में 1,137 मुंबई पुलिस कांस्टेबल की खली पोस्ट के लिए आवेदन किया था. उसी महीने, पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में एक चपरासी के 70 पदों के लिए 11,000 लोगों ने आवेदन किया था. आवेदन करने वालों में पीएचडी, एमएससी, एमटेक, बीएससी, बीटेक थे जबकि उस पद के लिए कैंडिडेट को केवल आठवीं पास होना था और न्यूनतम वेतन 15,000 रुपये थे.

2017 के हिसाब से भारतीय रेलवे देश की पब्लिक सेक्टर में 13 लाख से अधिक कर्मचारियों के साथ देश में सबसे ज़ायदा नौकरी देती है. हालांकि, मार्च में रेलवे में लगभग 90,000 पदों के लिए 2 करोड़ से अधिक आवेदन प्राप्त हुए, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा भर्ती अभियान कहा जा रहा था, समझ लीजिये कि हर एक पद के लिए लगभग 225 उम्मीदवार कम्पीट कर रहे थे फिर, पीएचडी और पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री वाले बहुत सारे अयोग्य व्यक्तियों को इंजन ड्राइवर और तकनीशियनों जैसे पोस्ट के लिए आवेदन करते देखा गया.

फरवरी में, तमिलनाडु लोक सेवा आयोग (TNPSC) ने कक्षा 10 की न्यूनतम योग्यता के साथ ग्राम-स्तर के क्लर्कों के 9,500 पदों को भरने के लिए एक परीक्षा आयोजित की. इस परीक्षा के लिए 20 लाख आवेदकों में से, 992 पीएचडी थे , 23,000 एम.फिल होल्डर थे, 2.5 लाख पोस्ट-ग्रेजुएट और आठ लाख ग्रेजुएट थे.

2015 में, 2 लाख इंजीनियर और 255 पीएचडी धारकों सहित 23 लाख उम्मीदवारों ने उत्तर प्रदेश में 368 प्रवेश स्तर की नौकरियों के लिए अप्लाई किया था.

 

भारत में बेरोज़गारी

2014 के आम चुनावों के लिए अपने प्रचार अभियान के दौरान, पीएम मोदी ने वादा किया था कि चुने जाने पर, उनकी सरकार हर साल 10 मिलियन नए रोजगार देगी.

2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में देश में बेरोजगारी दर 2013-14 में 4.9% से 5% तक बढ़ी, 2016 तक लगभग 20,000 नौकरियों घाट गयी.

क्वार्ट्ज इंडिया के अनुसार, हर साल लगभग 17 मिलियन लोग वर्क फाॅर्स में प्रवेश कर रहे हैं मतलब नौकरी के काबिल हो रहे हैं, लेकिन उनके लिए केवल 5.5 मिलियन नौकरियां पैदा हो रही हैं. सरकारी नौकरियों में भर्तियां ज्यादातर यूपीएससी और कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) के माध्यम से की जाती हैं. हालांकि, बेरोजगारी इस साल एसएससी सीजीएल परीक्षा के देरी के कारण से और भी बढ़ी है जिसकी कि कुछ भी वजह नहीं बताई गयी है.

इस साल की शुरुआत में, पीएम मोदी ने कहा था कि पकोड़े बेचना भी रोजगार का एक रूप है.

प्रधानमंत्री मोदी ने कि अगर हम रोजगार की संख्या पर नजर डालें, तो ईपीएफओ पेरोल डेटा के आधार पर सितंबर 2017 से अप्रैल 2018 तक 41 लाख से अधिक औपचारिक नौकरियां बनायीं गईं,” स्वराज्य की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अनौपचारिक नौकरी के क्षेत्र में सभी नौकरियों के 80% के बराबर का रोज़गार बनाया गया. “हम यह भी जानते हैं कि औपचारिक क्षेत्र में नौकरी बनने से अनौपचारिक क्षेत्र में भी रोजगार बनने पर प्रभाव पड़ सकता है. अगर आठ महीने में औपचारिक क्षेत्र में 41 लाख नौकरियां पैदा हुईं, तो कुल औपचारिक प्लस अनौपचारिक क्षेत्र की नौकरियां कितनी होंगी? ”

पूर्व पीएम और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने देश में बेरोजगारी की स्थिति के लिए सरकार के दृष्टिकोण की आलोचना की है. विपक्ष 2019 के आम चुनावों के प्रकाश में इस मुद्दे को उजागर करना जारी रखे हुए है.

 

तर्कसंगत का तर्क

सरकारी नौकरी में कैंडिडेट की इतनी अधिक संख्या तो सरकारी नौकरी की सुरक्षा के कारण है. यह देश के पढ़े लिखे रिसोर्स की एक तरह से बर्बादी है कि निम्न स्तर की नौकरियों के लिए ऐसे पढ़े लिखे लोगों को काम दिया जा रहा है. हमारे नेताओं को आंकड़ों से छिपने के बजाय यथार्थ को समझ कर उसके हिसाब से उपाय खोजने चाहिए.

 

 

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