पर्यावरण

युपी : किसान एग्रीकल्चर वेस्ट को खाद में तब्दील कर 45000 किलो. कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में फ़ैलने होने से रोक रहे हैं

तर्कसंगत

February 7, 2019

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पिछले साल उत्तर भारत के कई राज्यों  ने अपने बैड एयर क्वालिटी इंडेक्स रिकॉर्ड को पार होते देखा. जिसका प्रमुख कारण पंजाब और हरियाणा में स्टबल बर्निंग बताया जा रहा है. इस समस्या को हल करने रोटेवेटर जैसे महेंगे मशीन और स्टबल बर्निंग करने पर दंड करने का सुझाव दिया गया पर एक भी सुझाव का व्यापक स्तर पर अमल संभावित नहीं है .

हालांकि एक उपाय जो सभी समस्या को हल कर सकता है वो है ‘ललित – रमन मॉडल’ जिसे दो मित्र ललित त्यागी और रमन कांत ने विकसित किया है और जिसका अमल युपी के कम से कम 50 गाँवो में सफलतापूर्वक हुआ है.

 



ललित – रमन कम्पोस्ट पिट     

ललित त्यागी और रमन कांत ने 2004 में नीर फाउंडेशन की स्थापना की थी. पर्यावरण के प्रति उत्साहित दोनों मित्र तन, मन और धन से संतुलित पर्यावरण के लिए कार्यरत हैं.

 



2015 में जब स्टबल बर्निंग को एयर पॉल्यूशन का मुख्य कारण माना जाने लगा उसी समय ललित और रमन इस समस्या के एक आसान और सस्ते उपाय पर काम कर रहे थे. लगभग एक साल के अथक परिश्रम, और रिसर्च के बाद ललित – रमन कम्पोस्ट पिट का इज़ाद हुआ, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों में मुख्य रूप से गन्ने और चावल की फसल होती है और जिसका नतीजा है भारी मात्रा में एग्रीकल्चर वेस्ट जिनमे गन्ने के पत्ते और धान का कचरा शामिल है. इस स्थिति में किसान के पास कचरा जलाने के अलावा कोई उपाय नहीं होता था कि जिससे वो फसल के लिए खेत को तैयार कर सके. स्टबल बर्निंग की प्रक्रिया से ना केवल जमीन के क़ुदरती तत्वों का नाश होता था बल्कि वे वातावरण में खरतनाक ग्रीनहाउस गैस जैसे कार्बन डाइऑक्साइड को फैलाते थे.

 



दूषित पर्यावरण से जुड़ी कई समस्याओ में से उन्होंने भूमि गुणवत्ता और खुले खेतों में  स्टबल बर्निंग की समस्या से लड़ने का निश्चय किया. उन्होंने उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के एक गाँव से शुरुआत की, जहाँ भारी मात्रा में गन्ने और धान की फसल होती है और जिसके कारण गन्ने के पत्ते और धान के कचरे के रूप में एग्रीकल्चर वेस्ट जमा होता है. कम्पोस्ट पिट का बाहरी माप है 8 *3 *1 मी. और अंदरूनी माप है 7.1*2.1*1 मी है . पिट को गन्ने के पत्तो, धान के कचरों, गाय के गोबर, मिट्टी और पानी से भरा जाता है. जो आसानी से उपलब्ध है. लगभग 2 महीने में पूरे खेत के लिए पर्याप्त ठोस खाद तैयार हो जाता है. रमन कांत ने तर्कसंगत को बताया कि ” उनके पास पिट में अलग से एक भाग है जो सिर्फ तरल खाद इकठ्ठा करता है, हम किसानों को पिट जल स्रोत के पास बनाने की सलाह देते है, जिससे तरल खाद सिंचाई के पानी से मिल जाये, जो खेत में जंतुनाशक और कीटनाशक के छिड़काव से ज्यादा फायदेमंद है.”

 

 

ललित त्यागी और रमन कांत ने अपने सर्वे के दौरान पाया के किसानों के इस खाद प्रक्रिया को कम अपनाने के 3 प्रमुख कारण है प्राणीओ की कम संख्या, श्रम बल का अभाव और  गुणवत्ता सभर कम्पोस्ट तकनीक के बारे में जानकारी का अभाव.” सबसे बड़ी चुनौती किसानों को ललित – रमन कम्पोस्ट पिट का उपयोग करने के लिए प्रेरित करना था, वे इसके बारे में काफी दुविधा में थे. असल में, कम्पोस्ट पिट का उपयोग करने वाले प्रथम किसान के पिट के निर्माण का खर्चा हमने दिया था. हालांकि बाद में कई किसानों ने इसका उपयोग करना शुरु किया. अभी, मेरठ जिले के 50 गाँव के 250 किसान कम्पोस्ट पिट का लाभ ले रहे है.

 



सस्ता और टिकाऊ   

मित्रों के अनुसार पिट की लागत लगभग 25000 है. ये पिट लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट है क्योंकि इस पिट की जीवन अवधि 20-25 साल तक की है. उनके मुताबिक” पिट के बड़े आकार के कारण इसे भरना आसान है और ठोस खाद तैयार होने के बाद इसका उपयोग करना आसान है. तरल खाद को 20 दिन के अंतराल पर सिंचाई के पानी के साथ दिया जा सकता है या उसका छंटकाव भी किया जा सकता है.”  वे दावा करते है कि पिट के उपयोग से 45000 kg . कार्बन डाइऑक्साइड को पर्यावरण में फैलने से रोका जा सकता है.

 


कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय, भारती सरकार, इंडो ग्लोबल सोशलस सर्विस सोसाइटी (जर्मनी),  पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और यूनाइटेड नेशन’स डेवलपमेंट प्रोग्राम, नई दिल्ली ने ललित – रमन मॉडल को स्वीकृति दी है.

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