सप्रेक

गुजरात में आदिवासी किसान जल्द ही बनेंगे ‘लखपति’-परियोजना का श्रेय गांव की महिलाओं को जाता है

तर्कसंगत

February 8, 2019

SHARES

टाटा संस्था की ‘लखपति किसान’ योजना की प्रगति को  देखने के उद्देश्य से ‘पॉइंट्स फॉर पीपल’ और ‘टाटा संस्था’ के निमंत्रण पर, तर्कसंगत ने साबरकांठा जिले गुजरात के खेड़ब्रह्म ब्लॉक का दौरा किया. यह क्षेत्र मुख्य रूप से निर्भय भील जनजातियों के वंशजों द्वारा बसा हुआ है, जिन्होंने पिछले कुछ साल अत्यधिक गरीबी में गुजारे थे. छोटे भूखंडों में छोटे पैमाने पर खेती, और बकरियों, गायों और भेड़ों को पालना यही इनकी दैनिक दिनचर्या थी और इन आदिवासी ग्रामीणों को अपने जीवन की स्थिति में सुधार की उम्मीद कम ही थी। वर्तमान में, बेहतर उपजाऊ ज़मीन के बीच रहते हुए, उन्होंने जीवन के एक नए आयाम की खोज की है. कृषि विकास के प्रारूप में इन उपेक्षित गांवों के परिवर्तन को गांव की महिलाओं द्वारा संभव बनाया गया है, जिन्हें ‘टाटा संस्था’ के विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षित और भविष्य के नेताओं के रूप में तराशा गया है.

खेडब्रह्म के लोगों  के जीवन के पहलू को बताने से पहले, इस असाधारण पहल के बारे में एक संदर्भ देना यहाँ ज़रूरी है.

 

 

‘लखपति किसान’ का लक्ष्य 1 लाख घरों को बदलना है

 

वर्ष 2007 में, टाटा संस्था ने गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्यों को लाभ देते हुए मध्य भारत की अनदेखी जनजातीय, प्रजातियों के उत्थान पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इंटीग्रेटेड लाइवलीहुड इनिशिएटिव की स्थापना की.

गुजरात में, उनका नवीनतम कार्यक्रम – ‘मिशन 2020: लखपति किसान’ – गरीबी से त्रस्त ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, रिसोर्स मैनेजमेंट , शिक्षा, स्वच्छता और आजीविका में सुधार करने के लिए लगभग 1 लाख परिवारों पर केंद्रित है है जिनकी सालाना आय 35,000 से 1.2 लाख रुपये तक है. पॉइंट्स फॉर पीपल एक क्राउडफंडिंग प्लेटफार्म है जो टाटा ट्रस्ट से आपकी पॉइंट्स रिडीम कराती है. लखपति किसान पहल को काफी हद तक सराहा गया है.

विशेष रूप से, कृषि और आजीविका क्षेत्रों में अरावली पहाड़ियों से घिरे गुजरात-राजस्थान सीमा के साथ खेड़ब्रह्म के 23 गांवों में महत्वपूर्ण विकास देखा गया है. कार्यक्रम के उप निदेशक महेश पटेल ने कहा, “2015 में शुरू किये गए इस कार्यक्रम से अब तक हम प्रति परिवार लगभग 72,000 रुपये की आय का स्तर प्राप्त करने में सफल हुए हैं.”

 

 

सूखी भूमि को हरा भरा करना

कपास के रसीले हरे खेतों और पके मक्का और दालों के सुनहरे खेतों से होते हुए CInI टीम के नेता सुजीत कुमार ने बताया कि कैसे ये इलाके कभी सूखे, मिट्टी के कटाव और फसल की विफलता से प्रभावित थे. CInI और VIKSAT के विशेषज्ञों ने बताया कि ग्रामीणों ने स्वयं इन बारिश से प्रभावित क्षेत्रों में पानी के संरक्षण के लिए स्थानीय सामग्रियों से डैम, बाँध और बेलनाकार संरचनाओं का निर्माण किया है.

 

 

पुरानी सिंचाई तकनीक को छोड़ते हुए, उन्होंने अब अपनी पैदावार को बढ़ाते हुए पंक्तिवद्ध सिंचाई, सौर ऊर्जा से चलने वाली लिफ्ट सिंचाई और उर्वरकों का उपयोग करना शुरू कर दिया है. पढ़े लिखे किसान एक कोने में रखे सौर-ऊर्जा से चलने वाले पंप की पूरी तकनीक बताते हैं, कपास के किसान भोज भाई ने एक सेकंड के लिए भी मुस्कराना बंद नहीं किया. शहर के लोग उनकी मुस्कान में, उनके दोस्तों द्वारा खोदे गए 35 मीटर गहरे कुएँ का गर्व स्पष्ट देख रहे थे.

 

 

मुन्नी बेन, किसान और ‘अंजलि’ की एक सक्रिय सदस्य हाँ जो इस क्षेत्र के 476 स्वयं सहायता समूहों में से एक हैं,  उन्होनें हमसे कहा “तीन साल पहले, सोलर पंप के बिना, मेरे पति और मैं एक महीने के अंत में 100 रुपये बचाने के लिए संघर्ष करते थे. पर अब हमारे खेतों को देखो. इस कपास की कटाई के बाद, मैं गेहूं, बाजरा, सब्जियां और क्या- क्या नहीं उगाऊंगी, अपनी बचत के साथ, मैं अपने बच्चों को अब अच्छे स्कूल में भेज रही हूँ. हमने अपने घर को पुनर्निर्मित किया है और यहां तक ​​कि कस्बे में एक मोबाइल मरम्मत की दुकान भी शुरू की है”  एक शर्मीली मुस्कान के साथ वह बोलती रहीं.

 

 

स्वादों से भरी थाली

परंपरागत रूप से, ये काली मिट्टी की भूमि मक्का और अन्य प्रकार की दालों के अलावा दूसरे फसलों को उगाने में असफ़ल रही है सब्जियां, फल तो बहुत दूर की बात थीं. हालांकि, उपलब्ध संसाधनों के उचित उपयोग के साथ, अब एक ही भूमि में विभिन्न प्रकार के साग की पैदावार हो रही हैं. प्रमुख खाना मकाई की रोटेला ’(मकई के आटे से बनी मोटी रोटी) के रूप में जारी है, टमाटर, आलू, करेला और बैंगन जैसी सब्जियों ने ग्रामीण थाली में अपना रास्ता बना लिया है.

पहले कीटों को मारने करने के लिए कीटों नाशकों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता था यह समस्या अब बीज उपचार और पॉलीहाउस नर्सरी से दूर हो गई है.

“मैं अपने माता-पिता की खेती में मदद करती थी, वहां बहुत काम था,” स्कूल की वर्दी में एक 7 साल की लड़की ने हमें बताया, “इस नर्सरी को खोलने के बाद, मेरे पिता ने बोला कि उन्हें अब मेरी मदद की ज़रूरत नहीं होगी, इसलिए मैं अब स्कूल जाती हूँ.”

 

 

इन छोटे पैमाने के कपास किसानों के बारे में सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि वे कपास की मुख्य रूप से बीज उत्पादन के लिए खेती करते हैं, जो अत्यधिक लाभ देने वाला है. CInI के बीज उत्पादन विशेषज्ञ इन किसानों को प्रशिक्षित करते हैं, जिनमें से अधिकांश पहले अकुशल थे. Monsanto, Mahyco जैसे बीज की कंपनियां अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार इन किसानों से बड़े मूल्य पर बीज प्राप्त करती हैं.

 

लड़कियाँ – जो दुनिया चलाती हैं

शायद इस पहल की सबसे बड़ी उपलब्धि महिलाओं का व्यापक एकीकरण है, जो पहले रसोई, बच्चों और कामों तक ही सीमित थी. “अब महिलाओं में 60% कृषि श्रम शक्ति शामिल है. हम उनकी अटूट सहनशक्ति देखकर चकित हैं ” महेश पटेल ने घोषणा की, “वास्तव में, स्वयं सहायता समूह पूरे प्रोजेक्ट की रीढ़ होते हैं.”

चांगोद गांव में, रंग- बिरंगी साड़ियों में महिलाओं का एक समूह कुछ गंभीर चर्चा में व्यस्त दिखता है, जो दोपहर की छाया में बैठे हैं. “यह स्व-सहायता समूहों में से एक है। इनमें से कुछ महिलाएं हर हफ्ते समय पर इन बैठकों में भाग लेने के लिए 5-6 किलोमीटर की पैदल दूरी तय करती हैं, ”बोर्ड के सदस्यों में से एक ने बताया. मुस्कुराते हुए उसने ये भी कहा “हर SHG ने अपने लिए एक ड्रेस तैयार किया है, जैसा कि आप यहाँ देख सकते हैं,”

 

 

टीम की निर्वाचित नेता, रेखा बेन, एक अविश्वसनीय रूप से आश्वस्त रवैये के साथ बोलना शुरू करती हैं. अपनी टीम का परिचय देते हुए, वह स्पष्ट रूप से इस बात पर चर्चा करती हैं कि कैसे उनके समूह ने पूंजीगत आधार पर ग्रामीणों के लिए बचत बैंक की शुरुआत की है. 2011 की जनगणना के अनुसार 37% की साक्षरता दर वाले इन गांवों में अब अपने वित्तीय प्रबंधन और बेहतर भविष्य के लिए योजना बनाने की बुनियादी वित्तीय साक्षरता है. एक अन्य महिला रेखा बेन की बयानबाजी के बारे में बताते हुए कहती है, “उसने जिलाधीश से भी बात की है.”

 

 

बायोमीट्रिक-नियंत्रित एफपीसी (किसान उत्पादन कंपनियों) की शुरुआत से पहले, कालाबाजारी उनके जीवन को खतरे में डालती थी. “थोक व्यापारी हमें धोखा देते थे हमारी उपज के लिए खराब दरों की पेशकश करते थे या उनके वजन को कम ज्यादा करते थे. अब हम गणना जानते हैं, और दरें भी तय कर दी गई हैं. वे आपकी पहचान को अंगूठे के निशान से सुरक्षित करते हैं. भगवान की कृपा से, हमें अपनी मेहनत का मूल्य मिल जाता है. अब आपको बाजार में एक भी अवैध व्यापारी नहीं मिलेगा” बल्ली बेन ने मुस्कुराते हुए हमें बताया. संयोग से चांगोद में एक इंटरनेट प्रशिक्षित है, जो एक स्मार्टफोन चलाना, YouTube देखना, वीडियो बनाना और व्हाट्सएप का उपयोग करना जानता है.

एक नई महत्वाकांक्षा के साथ चमकती हुई युवा आशा बेन ने कहा, “मैं सिलाई और हस्तशिल्प सीखना चाहती हूं,” हम अब बहुत व्यस्त हो गए हैं, मैडम. हमें विश्वास है कि हम कुछ भी कर सकते हैं. यहाँ तक कि हमारे पति भी अब हमारी बात सुनते हैं.”

 

तर्कसंगत के विचार

परिवर्तन का हमें हमेशा स्वागत करना चाहिए. लेकिन, एक बदलाव जिसने एक पूरे समुदाय की नसों को मजबूत कर दिया और उनके जीवन में क्रांति की लहर ला दी, वह निश्चित रूप से प्रसंशा के लायक है. तर्कसंगत टीम, पॉइंट्स फॉर पीपल के सहयोग से टाटा संस्था द्वारा शानदार पहल को सलाम करता है. पॉइंट्स फॉर पीपल के सह-संस्थापक ब्रायन अल्मेडा कहते हैं, “यह पहल हमारे देश में समुदायों को आत्मनिर्भर और आत्मरक्षक बनाने की दृष्टि से शुरू की गई थी. किसी के प्रति वफादारी को भुनाने और योग्य कारणों से दान देने की अवधारणा लोगों के बीच उदारता की भावना पैदा करती है और वास्तव में यह एक वैश्विक समाज के रूप में प्रकट होती है.

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...