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सीबीआई चीफ नियुक्ति के मामले में सरकार के खिलाफ ट्ववीट करने पर प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट से नोटिस

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Image Credits: NDTV

February 11, 2019

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सुप्रीम कोर्ट ने 6 फरवरी, 2019 को केंद्र और अटॉर्नी जनरल के द्वारा अवमानना का आरोप लगाने के बाद नागेश्वर राव की सीबीआई चीफ के रूप में नियुक्ति के मामले पर ट्वीट करने के लिए वकील-कार्यकर्ता प्रशांत भूषण को नोटिस जारी किया है. अदालत में मौजूद श्री भूषण ने नोटिस स्वीकार किया और जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा. एनडीटीवी ने बताया कि इस मामले की सुनवाई 7 मार्च को होनी है.

 

मामला क्या है?

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने अदालत को बताया कि श्री भूषण ने Tweet करके सरकार पर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने का आरोप लगाया है जबकि श्री राव की नियुक्ति की याचिकाएं अभी भी अदालत में लंबित हैं. हालाँकि श्री वेणुगोपाल, जिन्होंने इस मुद्दे पर एक अलग याचिका दायर की है, ने कहा है कि वह सज़ा के लिए दबाव नहीं डालना चाहते हैं बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र में उप-न्यायिक मामले पर चर्चा करने वाले वकीलों के इस मुद्दे पर एक बड़ा निर्णय चाहते हैं. दूसरी ओर, सरकारी वकील तुषार मेहता ने केंद्रीय सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए कहा है कि केंद्र भूषण को दंडित करना चाहता है क्योंकि यह ऐसा कुछ नहीं है जो उन्होंने पहली बार किया है, वे पहले भी सरकार पर बेबुनियादी आरोप लगा चुके हैं.

जनवरी के महीने में श्री राव की सीबीआई के अंतरिम प्रमुख के रूप में नियुक्ति को एक एनजीओ ‘कॉमन कॉज’ द्वारा अदालत में चुनौती दी गई थी. भूषण उस एनजीओ का प्रतिनिधित्व करते हैं. 1 फरवरी को श्री भूषण ने अपने Tweet से केंद्र के कार्यों का विरोध किया. जिसमें कहा गया है कि श्री राव को नियुक्त करने का निर्णय 11 जनवरी को एक बैठक में लिया गया था और मल्लिकार्जुन खड़गे ने जो कहा, यह उससे अलग है।

श्री मल्लिकार्जुन खड़गे, जो सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता हैं और सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति पर फैसला करने वाले तीन सदस्यीय समिति के सदस्य भी हैं. बैठक में दो अन्य सदस्य भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के मुख्य न्यायाधीश थे.

श्री भूषण के Tweet में कहा गया है कि उन्होंने श्री खड़गे से पुष्टि की है कि सीबीआई के अंतरिम निदेशक के रूप में नागेश्वर राव की नियुक्ति के बारे में उच्च स्तरीय समिति की बैठक में कोई चर्चा नहीं हुई है। उनके Tweet में आगे कहा गया है कि सरकार ने अदालत को गुमराह किया है और हो सकता है कि वह उच्च स्तरीय समिति की बैठक की मनगढंत बातें पेश किये गए हो.

 

 

केके वेणुगोपाल ने इस मामले को रेखांकित करते हुए कहा कि श्री भूषण को इस बारे में Tweet करने की बजाए बैठक की समय दर समय की जानकारी पूछनी चाइये थी. उन्होंने आगे उल्लेख किया कि अब समय आ गया है कि ये दिशा निर्देश दिए जाये कि क्या वकील ऐसे मामलों पर टिप्पणी कर सकते हैं या नहीं?

 

अदालत ने कहा कि यह प्रतिकूल नहीं है कि मीडिया अदालती कार्यवाही पर रिपोर्टिंग करे, लेकिन एक मामले में शामिल वकीलों को उप-न्यायिक मामले में सार्वजनिक बयान देने से बचना चाहिए.

 Livemint के एक रिपोर्ट के अनुसार, वेणुगोपाल ने दावा किया कि भूषण ने अपने ट्वीट के माध्यम से जानबूझकर न्याय के प्रशासन में बाधा डाली है और उसकी ईमानदारी पर शक किया है.

 

 

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