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गरीबों के लिए न्यूनतम आय, जानें कि यह कहां लागू किया गया है और क्या यह सफल रहा है या नहीं?

तर्कसंगत

Image Credits: Pixoto/Hindustan Times

February 11, 2019

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जैसे-जैसे 2019 का चुनाव नजदीक आ रहा है, यूनिवर्सल बेसिक इनकम के विचार ने भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण ध्यान केंद्रित किया है. जबकि एनडीए सरकार ने 2019 के बजट में छोटे और सीमांत किसानों के लिए प्रति वर्ष 6,000 रुपये की सुनिश्चित आय का प्रावधान किया है, विपक्षी नेता राहुल गांधी जी ने भी 28 जनवरी को छत्तीसगढ़ में किसान सम्मान सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान वादा किया था कि हर गरीब को न्यूनतम आय प्रदान की जायेगी. उन्होंने कहा, “कांग्रेस पार्टी ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया है”.  कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार न्यूनतम आय की गारंटी देने जा रही है.  इसका मतलब यह है कि भारत के प्रत्येक गरीब व्यक्ति की एक न्यूनतम आय होगी. इसका मतलब यह है कि अब भारत में कोई भी भूखा और गरीब व्यक्ति नहीं रहेगा. हालांकि यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) एक आय का वादा है सभी के लिए,  राहुल गांधी द्वारा घोषित यह न्यूनतम आय स्कीम गरीबों के लिए एक न्यूनतम राशि का वादा करता है. जैसा कि यह मुद्दा चर्चा में है, यह समझना महत्वपूर्ण है कि क्या इस पहल को अतीत में कहीं भी लागू किया गया है और यदि हाँ, तो यह सफल रहा है या नहीं. तर्कसंगत संक्षेप में बेसिक आय के विचार को विश्व और राष्ट्रीय स्तर पर सभी प्रयोगों की जांच करता है और इसकी उपयोगिता और व्यवहारता को समझने की कोशिश करता है.

 

 

अलास्का में गारंटीड आय सफल रही है.

यूबीआई का सबसे पुराना उदाहरण अलास्का, अमेरिका है. जहाँ पर एक न्यूनतम आय की गारंटी है. 1982 में इसकी शुरुआत करने के बाद से, अलास्का के सभी मूल निवासियों (वर्तमान में लगभग 650,000 लोग) को हर साल तेल और खनन से प्राप्त आय से एक समान आय प्रदान की गयी है. सर्वेक्षण बताते हैं कि 72% निवासी अपने लाभांश को आपात स्थिति के लिए बचाते हैं और 81% कहते हैं कि यह स्कीम उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करता है.

 

अन्य शुरू की गयी स्कीम ने मिश्रित परिणाम दिखाये हैं.

मैनिटोबा, कनाडा में किए गए एक “ऍम-इनकम” प्रयोग से पता चला है कि प्राप्तकर्ताओं ने अस्पताल में भर्ती होने में, विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य निदान के मामले में बहुत कमी देखने को मिला है. एक अन्य मामले में, उत्तरी कैरोलिना में एक आकस्मिक बुनियादी आय स्कीम ने खुलासा किया कि प्राप्तकर्ता के परिवारों में बच्चों के व्यवहार संबंधी समस्याये कम थी और उनके अपराध करने की संभावना भी कम थी. सभी परिणाम उतने आशाजनक नहीं हैं. ओटजीवेरो, नामीबिया में दो साल के बेसिक आय प्रयोग का प्रभाव पद्धतिगत कमियों के कारण स्पष्ट नहीं है. इसी तरह, रिपोर्ट के सकारात्मक नतीजों के बावजूद, ब्राजील के क्वाटिंगा,वेलहो ब्राज़ील में इस स्कीम के अध्ययन में इसके अनुचित रूप से छोटे भुगतान के लिए आलोचना की गई है.

 

कई और स्कीम आपत्तिजनक स्थिति में हैं

कई बेसिक आय स्कीम दुनिया भर में शरू की गयी हैं और वर्तमान में वह शुरुआत के बाद से विभिन्न चरणों में दिख रही हैं. फिनिश प्रयोग, जो 2017 में शुरू हुआ और दो साल तक जारी रहने की उम्मीद है, इसने काफी ध्यान आकर्षित किया है, लेकिन यह एक वास्तविक बेसिक आय स्कीम होने के लिए, पैमाने और अवधि दोनों में बहुत सीमित है. केन्या के 120 गांवों में एक और उल्लेखनीय स्कीम की शुरूआत की है. दुनिया के सबसे बड़ी बेसिक आय स्कीम को केन्या ने जन्म दिया है,  यह 2017 में शुरू हुई और इसमें 12 वर्षों के लिए 16000 लोगों का अध्ययन शामिल होगा. संयुक्त राज्य अमेरिका में ओकलैंड, नीदरलैंड में उट्रेच, इटली में लिवोर्नों, कनाडा में ओंटारियो और स्कॉटलैंड में फिफे, ग्लासगो में बेसिक आय परीक्षण भी चल रहे हैं. सफल होने पर, इन स्कीम का उपयोग मॉडल के रूप में यूबीआई के प्रभाव को प्रदर्शित करने के लिए उपयोग किया जा सकता है. लेकिन उनकी विफलता का भी गहरा असर होगा.

 

भारत में यू.बी.आई.

भारत के लिए एक बेसिक आय होनी चाहिए, इसके पहले अधिवक्ताओं में से एक अर्थशास्त्री, प्रणब बर्धन थे. उन्होंने तर्क दिया,  2014 में, कि सभी नागरिकों के लिए एक बेसिक मासिक आय, अयोग्य सब्सिडी की जगह, गरीबी उन्मूलन के लिए बेहतर लक्षित है. तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम द्वारा लिखित आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में शामिल किए जाने के बाद भारत में यूबीआई की बहस भाप बन गई. सर्वेक्षण ने यूबीआई को एक वैचारिक रूप से आकर्षक विचार और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के संभावित विकल्प के रूप में बतलाया.

 

मध्य प्रदेश में SEWA स्कीम के अध्ययन ने जीवन को बदल दिया.

2014 में,  सेल्फ-एम्प्लोयेड महिला संघ(SEWA) द्वारा भारत में एक बेसिक आय स्कीम का संचालन किया गया था,  जिसमें मध्य प्रदेश के 8 गाँवों में लगभग 6000 लोगों को 18 महीनों के लिए एक छोटी मूल आय प्राप्त हुई. कई परिवर्तनकारी प्रभाव देखे गए: पहला, कल्याण के लाभ थे – बेहतर पोषण,  बेहतर स्वास्थ्य,  बेहतर स्कूली शिक्षा;  दूसरा, सकारात्मक अपक्षपात प्रभाव थे – बेसिक आय ने विकलांगों,  महिलाओं और अनुसूचित जाति के परिवारों को अधिक मदद की;  तीसरा, सकारात्मक आर्थिक प्रभाव थे – अधिक लेबर(श्रम) की भागीदारी,  उत्पादकता और उत्पादन बढ़ा,  और माध्यमिक,  सेल्फ-एम्प्लोयेड कार्यों में वृद्धि. परिणामों ने संदेह को दूर कर दिया जैसे कि क्या गरीब प्राप्तकर्ता अपने पैसे को गैर-कानूनी तरीके से खर्च करेंगे,  उदाहरण के लिए,  शराब खरीदने के लिए और मुफ्त आय उन्हें काम करने के लिए आलसी और अव्यवस्थित कर देगी. इस तरह की आशंकाएं अक्सर व्यक्त की जाती हैं, क्योंकि “उन्हें सब कुछ हाथो हाथ दे देना”  को आधारहीन साबित कर दिया गया.

 

भारत में यूबीआई को लागू करना निषेधात्मक रूप से महंगा हो सकता है

नीति और सकारात्मक स्कीम के परिणामों को व्यापक रूप से, एक मॉडल को समर्थन देने के रूप में देखते हुए, एक आश्चर्य है कि भारत में एक यूबीआई क्यों लागू नहीं किया गया है. यूबीआई को व्यापक रूप से अपनाने के लिए मुख्य बाधा यह है कि यह महंगा/खर्चीला है. आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 मूल आय की गणना करने के लिए तेंदुलकर समिति की गरीबी रेखा (अन्य लाइनों की तुलना में कम) का उपयोग प्रति वर्ष 7620 रुपये के रूप में करता है. इन आंकड़ों के आधार पर, सर्वेक्षण का अनुमान है कि वास्तव में पूरी-जनसंख्या, बेसिक आय के प्रभाव के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे और इसके बजाय 75% आबादी की अर्ध-जनसख्याँ दर की सिफारिश की जाएगी, जो देश के जी.डी.पी. 4.9% के बराबर राशि से वित्त पोषित(आधी-अधूरी) हो सकती है.

 

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