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मिलिए पीएचडी छात्रा श्रीलेखा चक्रवर्ती से झारखंड के जनजातीय क्षेत्र में पीरियड हाइजीन की हिमायत करती हैं

Kumar Vibhanshu

February 12, 2019

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वर्ष 2018 में पीरियड्स और उसकी स्वच्छता पर बातचीत पूरे जोरों पर है, या हम ऐसा मानते है! विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों, एनजीओ  और यहां तक ​​कि पैडमैन जैसी बॉलीवुड फिल्मों के कारण मासिक धर्म का विषय कम से कम सामने आना शुरू हो गया है, लेकिन भारत के ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में किशोर लड़कियां अभी भी ज्ञान और जागरूकता की कमी के कारण  इसके बारे में बोलने से कतराती हैं.

ग्रामीण भारत में पीरियड्स की स्वच्छता के लिए श्रीलेखा की लड़ाई

जादवपुर विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्र, श्रीलेखा चक्रवर्ती झारखंड के कुछ सबसे दूरदराज के समुदायों में युवा लड़कियों के बीच मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में आवश्यक जानकारी देने के लिए पिछले पांच वर्षों से प्रयास कर रही हैं. तर्कसंगत से बात करते हुए, श्रीलेखा ने 2011 में टीच फ़ॉर इंडिया (टीएफआई) की साथी बनने से झारखंड में युवा आदिवासी और दलित लड़कियों के लिए सेक्सुअल रिप्रोडक्टिव हेल्थ वर्कर बनने की अपनी यात्रा के बारे में बात की.

श्रीलेखा ने पुणे में अपनी फैलोशिप खत्म करने के बाद झारखंड में NEEDS नाम के एक NGO के साथ काम करना शुरू किया. वहां काम करते हुए, श्रीलेखा ने महसूस किया कि जिन लड़कियों और महिलाओं के साथ उन्होंने काम किया है, वे मासिक धर्म और मासिक धर्म की स्वच्छता के बारे में बहुत कम जानती थीं. उन्होनें कहा, “हालांकि केंद्र सरकार की योजना चल रही है, मैं यह देखकर हैरान रह गई कि लड़कियों को मासिक धर्म के बारे में बात करना तो दूर मासिक धर्म के बारे में बहुत कुछ नहीं पता है

 

 

 

अब पीरियड्स हाइजीन के गाइडलाईन का पालन किया जाने लगा 

इतना ही नहीं, बल्कि झारखंड के पाकुड़, साहिबगंज और चाईबासा (पश्चिम सिंहभूम) में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत करने पर, श्रीलेखा ने महसूस किया कि मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में जानकारी  कितनी कम है. उन्होंने कहा, “आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में बात करने के लिए प्रशिक्षित नहीं किया जाता है, जिसके कारण लड़कियों को पीरियड्स की सही जानकारी नहीं मिलती है.” साथ ही आयरन टेबलेट्स जिसकी कमी से लड़कियों को एनीमिया हो सकता है, वो तक सही समय पर नहीं बांटी जाती है. यह सब तब हो रहा है जब राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के पास ग्रामीण क्षेत्रों में मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश हैं, लेकिन  श्रीलेखा ने कहा कि वास्तविकता में उसका पालन मुश्किल से ही किया जाता है.

जबकि वर्ष 2015-16 में झारखंड सरकार ने केंद्र सरकार की 2011 की मासिक धर्म स्वच्छता योजना (एमएचएस) की जगह स्कूलों में लड़कियों के बीच अच्छी क्वालिटी वाले सैनिटरी नैपकिन बाँटने के लिए 25 करोड़ रुपये  निर्धारित किए थे, श्रीलेखा का अनुभव कहता है कि काफी कम पैसे ही पाकुड़ और साहिबगंज की लड़कियों तक पहुँचती हैं.

 

 

वह एक और चीज पर  महत्व देती है जिस पर काफी समय ध्यान नहीं दिया जाता. पीरियड्स स्वच्छता से संबंधित सरकारी कार्यक्रम स्कूल जाने वाली लड़कियों पर ही केंद्रित होते हैं, जहाँ उन्हें मुफ्त सैनिटरी नैपकिन प्रदान किए जाते हैं. हालाँकि, श्रीलेखा ने डेढ़ दशक के काम के बाद यह समझ लिया है कि ग्रामीण भारत में बड़ी संख्या में लड़कियां या तो ड्रॉपआउट हैं या शादीशुदा हैं. तो मलतब ये कि लड़कियां इस मौके को चूक जाती हैं जो स्कूल जाने वाली लड़कियों को मिलता है.

 

डिस्पोजल की समस्या 

डिस्पोजल की समस्या बहुत सारी युवा लड़कियों के लिए एक समस्या है. जुलाई 2018 में पाकुड़ के एक हाई स्कूल में कुछ युवा लड़कियों के साथ बातचीत करने पर, श्रीलेखा को इसका एहसास हुआ. जब किशोर लड़कियों को अपने पीरियड्स के बारे में खुलकर बात करने का पहला मौका मिला तो उनके लिए इस्तेमाल किए गए नैपकिन को निपटाने की समस्या के बारे में पता चला. उन्होंने कहा, “जो लड़कियां अपने पीरियड्स पर होती हैं, वे या तो उन दिनों में स्कूलों नहीं आती  हैं या अपने स्कूल से घर लौटने के बाद ही अपना नैपकिन बदल सकती हैं.”

जब उन्होनें अधिकारियों से नैपकिन के डिस्पोजल के बारे में सवाल किया, तो मामले के लिए जिम्मेदार अधिकारियों ने तुरंत उत्तर दिया कि कौन गंदे नैपकिन का निपटान करेगा? जवाब से हैरान, श्रीलेखा समझ गई कि भले ही सरकार अपनी योजनाओं और नीतियों के माध्यम से बदलाव लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन यह जमीनी स्तर तक नहीं पहुंच रही है.
जबकि केंद्र और राज्य सरकार दोनों की नीतियां बड़े शहरों और कस्बों में बदलाव ला रही हैं, जिन गांवों में श्रीलेखा काम करती हैं, वे अभी भी पीरियड्स हाइजीन से संबंधित सबसे बुनियादी बातों के लिए तरस रहे हैं, जो सामाजिक कलंक और गलतफहमियों को दूर करने के लिए जरूरी है.

 

Change.org पिटीशन

श्रीलेखा पीरियड्स स्वच्छता के बारे में जागरूकता फैलाने और यह सुनिश्चित करने के लिए इच्छुक हैं कि संबंधित सेवाएं जैसे कि आयरन टैबलेट वितरण, डिस्पोजल की जानकारी आदि क्षेत्र में लड़कियों के लिए आसानी से उपलब्ध कराई जाएँ. उस उद्देश्य के लिए, श्रीलेखा ने Change.org से एक पिटीशन भी शुरू की है. मेनका गांधी सहित अन्य नोडल निकायों के साथ साथ झारखंड के पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय से यह आग्रह किया कि झारखंड के दूरदराज के समुदायों में युवा लड़कियों को आवश्यक जानकारी और सेवाओं के साथ आंगनवाड़ियों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रदान की जाये, इस उद्देश्य के लिए, उन्होंने पांच पॉइंट की लिस्ट भी तैयार की है. उनके पास 32,000 से अधिक हस्ताक्षर हैं और अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए कई और हस्ताक्षर मिलने की उम्मीद है.

श्रीलेखा, मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में बात करने के अलावा झारखंड के इन हिस्सों में किशोरों के साथ कई अलग-अलग मुद्दों पर भी काम करती हैं। ग्रामीण झारखंड में अपने अधिकांश दिन बिताते हुए, युवा लड़कियों और लड़कों की समस्याओं को समझते हुए, वह अपने गृहनगर कोलकाता कभी-कभी ही जाती हैं.

 

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