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“मैं सिर्फ विशेष नहीं हूँ, मैं लिमिटेड एडिशन हूँ” – मिलिए इस दिव्यांग सामाजिक कार्यकर्ता और अचीवर से

तर्कसंगत

February 12, 2019

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“आज मैं 80% दिव्यांग हूं और आप सभी 100% सक्षम हैं. अगर मैं अपनी सीमाओं के बावजूद इतना कुछ कर सकती हूं, तो आपको किसने रोक कर रखा है कुछ कर दिखाने से?”, जे. स्वर्णलता ने इस सवाल के साथ, अपने TEDx भाषण में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया.

 

स्वर्ग फ़ाउंडेशन की संस्थापक – भारत का पहला गैर-सरकारी संगठन है, जो न्यूरोमस्कुलर डिसऑर्डर से पीड़ित मरीज़ों की सहायता करते हैं – “स्वर्णलता” एक पेशेवर गायक, लेखक, फोटोग्राफर और मोटीवेशनल स्पीकर भी हैं.

उनकी ना हारने की भावना ने उनकी शारीरिक दिव्यांगता पर काबू पा लिया है और आज उनका यह ताज अविश्वसनीय उपलब्धियों से भरा हुआ है, जिसने सैकड़ों लोगों को नई जिंदगी दी है. तर्कसंगत से बात करते हुए, स्वर्णलता जे. ने भारतीय समाज में दिव्यांगता के बारे में कलंक और रूढ़िवादी धारणा को भंग करने का अपना दृढ़ संकल्प साझा किया.

 

 

बिता समय कुछ खास नहीं था 

बेंगलुरु में एक निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार में चार बेटियों में से दूसरी स्थान पर जन्मी, स्वर्णलता को मुख्य रूप से पैसे की समस्याओं के कारण जीवन में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. उनके परिवार में पितृ सत्ता वाली मानसिकता के कारण ज़िन्दगी आसान नहीं रही. 

10 वीं के बाद, उन्होंने कंप्यूटर साइंस के डिप्लोमा की पढ़ाई के लिए अपना दाख़िला करवाया. कॉलेज के दिनों में उनके साथ एक भयानक दुर्घटना घटी. जबड़ा टूट जाने की वजह से, वह छह महीने तक बोलने या खाने में असमर्थ थी, लेकिन उनके अंदर की आग एक मिनट के लिए भी कम नहीं हुई.

कई सर्जरी के बाद, स्वर्णलता जल्द ही स्वस्थ होने लगी. अपने डिप्लोमा को पूरा करने के बाद, घर पर पैसो की कमी की वजह से वह उच्च अध्ययन करने में असमर्थ रही और स्वर्णलता एक वयस्क बनते ही, अठारह साल की उम्र में अपनी पहली नौकरी की शुरूआत की.

छोटी उम्र में अपने पिता को खो देने के बाद, उन्हें आर्थिक सहायता के साथ-साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी सामना करना पड़ा.

वह अपने जीवंत जीवन के गहरे रंगों को याद करती है और बताती हैं ” कि जब मैंने अपने जीवन के प्यार के साथ शादी की, तो मेरे परिवार ने मुझे अस्वीकार कर दिया क्योंकि यह उनकी इच्छा के विरुद्ध था.”

अपने जीवन में इतनी सारी बाधाओं को पार करने के बाद, जब उनकी बेटी का जन्म 2011 में हुआ तो स्वर्णलता ने उसे एक राजकुमारी जैसी ज़िन्दगी देने की ठान ली, “जिस तरह की ज़िन्दगी जीने के लिए हर लड़की हक़दार है.”

 

करियर की राह बाधाओं से घिरी हुई थी

उनकी पहली नौकरी में एक महत्त्वहीन मुद्दे पर उन्हें निकाल दिया गया था. उन्होंने हर एक दिन अपने कौशल को बेहतर करना जारी रखा और जल्द ही स्वर्णलता आईटीसी, मित्सुबिशी और ऑडी जैसी बड़ी कंपनियों के साथ काम करना शुरू कर दिया – जहाँ पर बहुत सारे लोग उन कंपनियों के साथ काम करने का सपना देखते रहते है.

फिर एक दिन, “जैसे चाँद की चाँदनी, सुबह होते ही ढल जाती है”, ठीक उसी तरह वह मजबूर हो गयी ऑडी से रिजाइन करने के लिए, क्यूंकि वह एक घातक बीमारी से जूझ रही थी, और शायद कॉर्पोरेट जगत की ऑडी जैसी बड़ी कंपनी को लगा कि अब वो उनके काम की नहीं रहीं.

 

 

सबसे बड़ा झटका

जब स्वर्णलता अपने तीसवें दशक की आयु की चौखट पर थी, तब उनके जीवन में सबसे बड़ा आघात हुआ, जिसने उनको पूरी तरह से झकझोर दिया.

वह अपने TEDx भाषण में बात करते हुये; यह बताने लगी कि कैसे उनका जीवन पलक झपकते ही बदल गया, मेरी शादी की सालगिरह के ठीक एक दिन पहले 26 अक्टूबर, 2009 का दिन था. मैं सुबह, पूरी तरह से ठीक थी. दोपहर के बाद मुझे थोड़ा सा बुखार आभास होने लगा, इसलिए मैंने बस पैरासिटामोल खा लिया. शाम तक मुझे गले से नीचे तक लकवा मार गया.

जल्द ही अस्पताल की रिपोर्ट में इसकी पुष्टि की गई कि प्रोग्रेसिव मल्टीपल स्केलेरोसिस, एक दुर्लभ न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है, जिसके ठीक होने की संभावना न के बराबर होती है. लकवे और विभिन्न शरीर के अंगों की खराबी के साथ, आज वह कई दैनिक गतिविधियों में कठिनाई का सामना करती है, फिर भी वह हमेशा मुस्कुराने के लिये एक वजह ढूंढ ही लेती है.

 

 

जीवन में बदलाव

वह जल्द ही खुद को, दुनिया से कटा हुआ मानने लगी और परेशान होने की वजह से, डिप्रेशन का शिकार होने लगी.

उन्होंने बताया एक समय वह अपना जीवन समाप्त करना चाहती थी. अपने पति और बेटे को देखते हुए, जो उस समय सिर्फ दो साल का था. मुझे यह एहसास हुआ, कि मेरी बीमारी में उनको कोई दोष नहीं है . तब मैंने जीवन को एक और मौका देने का फैसला किया. उन्हें अस्पताल में अन्य रोगियों को देखकर जीवन के प्रति एक आशावादी दृष्टिकोण लाने में बहुत मदद मिली.

उन्होंने बाद में, दिव्यांग बच्चों के साथ और उनके संघर्षों को देखकर; स्वर्णलता ने अपने आपको बहुत खुशनसीब महसूस किया और उन्होंने निश्चय किया कि अब खुद को तुच्छ नहीं समझेंगी. उनके अन्दर की आवाज ने उन्हें दिव्यांग व्यक्तियों की मदद करने के लिए कुछ करने का आग्रह किया, जिनके लिए हर एक दिन एक नया संघर्ष होता है.

 

 

उन्होंने सक्रिय रूप से कई स्केलेरोसिस के रोगियों के बीच कठपुतली शो, फेस पेंटिंग, मेहंदी, योग और अन्य स्किल बेस्ड वर्कशॉप करवाना शुरू कर दिया. जल्द ही स्वर्णलता उन सभी के लिए आशा की किरण बन गई. उन्होंने बीमारी के बारे में जागरूकता को बढ़ाया.

यही जोश अक्टूबर 2014 को कोइम्बटूर में स्वर्ग फाउंडेशन के जन्म का कारण बना, जिसे उन्होंने अपने पति टी.एस. गुरुप्रसाद के साथ मिलकर स्थापित किया.

 

 

स्वर्ग फाउंडेशन के प्रोजेक्ट्स 

जैसा कि स्वर्ग फाउंडेशन के नाम से ही पता चल रहा है, ठीक उसी तरह आज स्वर्ग फाउंडेशन दिव्यांग लोगों के लिए पूरे भारत में स्वर्ग बना रहा है. शुरुआत में, उन्होंने दिव्यांग जनों की समस्यायों से निपटने के लिए, रोगियों और उनके परिवार के सदस्यों को मनोवैज्ञानिक परामर्श प्रदान करना आरंभ कर दिया.

उन्होंने बताया की एक बार, “जब एक दम्पति को जिसमे पति को मल्टीपल स्केलेरोसिस का पता चला, तो पत्नी के परिवार ने दोनों को जबरन अलग कर दिया. हमने इसमें हस्तक्षेप करते हुये दोनों परिवारों की काउंसलिंग की. जिसकी वजह आज वह दोनों फिर से एक साथ खुश हैं.”

बाद में, बेहतर फंडों के साथ, फाउंडेशन ने दिव्यांग लोगों के लिए उनकी प्रतिपूर्ति की शुरूआत करी, अब उन्हें मासिक दवा, उपचार के लिये पैसा, स्वयं की अनुकूलता के हिसाब से व्हीलचेयर और वॉकर, फिजियोथेरेपी और विशेष बच्चों के लिए शिक्षा में मदद मिलने लगी.

 

 

स्वर्णलता ने उनके द्वारा किए गए कार्यों को बयान करते हुए कहा, कि कैसे कोयम्बटूर रेलवे स्टेशन और कई सरकारी कार्यालय अब दिव्यांगो के लिये अनुकूल बन चुके हैं. उन्होंने बताया, “कि आज हमने कोइम्बटूर में सात सरकारी स्कूलों को दिव्यांगों को देखते हुए व्हीलचेयर रैंप और सुलभ शौचालयों के साथ पूर्ण बनाया है. हम विशेष बच्चों को स्कूल वापस लाने में सफल रहे हैं. उनके सभी प्रयासों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

हाल ही में स्वर्ग फाउंडेशन ने तमिलनाडु में पहली दिव्यांग-अनुकूल परिवहन सुविधा “सारथी” की शुरुआत की. सारथी एक लक्ज़री ट्रैवल वैन है जिसमे रैंप, सोफा-कम-बेड, टॉयलेट, टेलीविज़न, गर्म पानी जैसी अन्य कई सुविधाओं से सुसज्जित है, जो हर मरीज को गरिमा के साथ यात्रा करने की अनुमति देती है. इसने काफी लोकप्रियता हासिल की है, इतना अधिक कि संस्थापकों ने सभी के लिए अगस्त को “एक मुफ्त सवारी महीना” बनाने का फैसला किया.

 

 

स्वर्णलता सारथी से जुड़ी कुछ दिल को छू लेने वाली यादों को याद करते हुए बताया कि, सारथी का पहले उपयोगकर्ता एक सज्जन थे, जो एक बड़े कॉर्पोरेट उद्यम के पूर्व सीईओ थे. अचानक आघात ने उन्हें पूरी तरह से पंगु/कमजोर/असमर्थ बना दिया था. सारथी ने उन्हें तीन साल बाद अपनी मां के पास जाने के लिए सक्षम बनाया. आज वह सभी पारिवारिक समारोहों में आसानी से शामिल होकर अधिक सोशल हो रहे है और खुशियों के साथ जीवन यापन कर रहे है.”

 

 

उन्होंने आगे बताया कि मुझे एक नब्बे वर्षीय महिला याद है, जो पिछले बीस वर्षों से बिस्तर पर थी. सारथी की वजह से, उन्होंने दशकों में पहली बार मंदिर की यात्रा की. यह वैन आर्थिक रूप से कमजोर रोगियों की मदद कर रही है जो एक महंगी दिव्यांग-अनुकूल एम्बुलेंस या वाहन का खर्च नहीं उठा सकते हैं.

 

व्यक्तिगत उपलब्धियां

एक गतिशील सामाजिक कार्यकर्ता होने के अलावा, स्वर्णलता जे. अपनी आवाज़ के साथ लोगों को मोहित करती रहती हैं. वह कई ऑनलाइन मंचों के लिए शार्ट स्टोरीज(लघु कथाए) और निबंध भी लिखती हैं. वह एक पेशेवर फोटोग्राफर है, और मल्टीपल स्केलेरोसिस रोगियों के साथ उनकी फोटोग्राफी श्रृंखला पत्रिकाओं और कैलेंडर में छपी है.

स्वर्ग ने इस साल पुरस्कार विजेता “पैरालम्पिक्स एथलीटों” के साथ एक कैलेंडर प्रकाशित किया है. विश्वनाथन आनंद के बारे में सभी जानते हैं की वह शतरंज में पांच बार के विश्व चैंपियन रह चुके है, लेकिन स्वर्णलता ने सभी को जेंनिथा अन्नो, “शारीरिक रूप से दिव्यंगो के लिए विश्व शतरंज चैम्पियनशिप में पांच बार की चैंपियन” के रूप में पेश करना चाहा – जैसा कि उनका विकिपीडिया विवरण बताता है.

स्वर्णलता ने पूरे भारत में 150 से अधिक मोटीवेशनल भाषण/स्पीच्स दिए. उन्होंने पेशेवर मॉडलों को भी कड़ी टक्कर देते हुए, मिसेज इंडिया ब्यूटी पेजेंट साउथ की फर्स्ट रनर-अप भी रही हैं. उन्होंने मिसेज पॉपुलैरिटी का खिताब भी जीता है.

 

 

स्वर्णलता जे. सभी के लिए एक प्रेरणा है. कभी न ख़त्म होने वाली बाधाओं का सामना करने के बाद भी, जीवन के लिए उनका कभी न ख़त्म होने वाला उत्साह, सभी चमत्कारों का गवाह है.

उन्होंने बताया कि, “लोग हमें विभिन्न नामों से बुलाते हैं – शारीरिक रूप से विकलांग, असमर्थ, विकलांग या विशेष/ख़ास. मैं चाहती हूं कि हर कोई यह जान सके कि हम सिर्फ विशेष नहीं हैं, हम लिमिटेड एडिशन हैं.

 

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