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[वीडियो]अनिल मिस्त्री: एक शिकारी कैसे बना सुन्दरवन का रखवाला

तर्कसंगत

Image Credits: Mongabay

February 13, 2019

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सुंदरवन के गांव ने संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए जीवन-यापन के नए तरीके को अपनाया है. मोंगाबे-इंडिया के साथ एक इंटरव्यू में सुंदरवन के वाइल्डलाइफ़ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के मुख्य अधिकारी अनिल मिस्त्री ने बताया कि कैसे बाली द्वीप का गाँव बाघों के शिकार के लिए जाना जाता था, अब  एक शिकार मुक्त क्षेत्र बन गया है. यदि समुदायों को बाघ से बचाया जाता है और उन्हें पर्यटन से आर्थिक लाभ होता है तो यह इंसान और बाघ के आपसी संघर्ष को कम करने में मदद करता है.

मैंग्रोव इकोसिस्टम के संरक्षणवादी अनिल मिस्त्री अपने पूर्वजों और साथियों की राह पर चल पड़े है. भारतीय सुंदरवन द्वीप के गांव को बाढ़ ने तबाह कर दिया है. तेजी से आगे बढ़ने के लिए जंगलों को काट दिया और जानवरों को मार दिया गया, लेकिन एक दिन एक मरती हुयी हिरणी के साथ हुए हादसे ने उनका दिल बदल दिया.

मिस्त्री ने एक स्पष्ट बातचीत में मोंगबे-भारत को बताया,“मुझे बचपन से मालूम था कि इस इलाके में अवैध रूप से शिकार करना और पेड़ों को काटना होता रहा है. गाँव में कोई विकास नहीं हुआ है. बाढ़ ने हमारे गांव को तबाह कर दिया है. अपने आप ही हम अवैध शिकार पर निकल गये. आमतौर पर तो हम हिरण के लिए जाते थे पर अगर हमें बाघ मिले तो उसका भी शिकार कर लेते थे.”

“एक बार शिकार पर मेरे दोस्त ने एक हिरणी को मार दिया जिसके चारों ओर उसके छोटे-छोटे बच्चे थे. घायल हिरणी दर्द से चीख रही थी और अंततः मर गयी. इस हादसे ने मुझे दुःख से भर दिया. तब मिस्त्री सुंदरवन फील्ड डायरेक्टर के पास गये, अपना गुनाह कबूल किया और सुंदरवन के भविष्य के लिए चिंता जाहिर की. इससे प्रेरित होकर मिस्त्री ने बाली नेचर एंड वाइल्डलाइफ कंजरवेशन सोसाइटी नामक एक NGO बनायीं, जो मैंग्रोव इकोसिस्टम की सुरक्षा के लिए काम करती है.” 52 वर्षीय मिस्त्री ने दो दशक पहले की घटना को याद करते हुए हमें बताया.

 

 

मिस्त्री को अब मुख्य रूप से वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के साथ अपने काम के लिए पहचाना जाता है. वह सुंदरवन में उनके मुख्य क्षेत्र अधिकारी हैं, जो वन संसाधनों पर मानवीय दबाव कम करने और अवैध शिकार को खत्म करने के लिए संगठन के संस्थापक बेलिंडा राइट के साथ काम करते हैं.

जीवन यापन के लिए हम यह सुनिश्चित करें कि हम केवल उन संसाधनों का उपयोग करें जो हमारे पास हैं ना कि जंगल पर निर्भर रहें. मैं पूरे आत्मविश्वास से यह कह सकता हूं कि हमारा गांव, जो कभी अवैध शिकार का केंद्र था, यहाँ पिछले 15 से 20 वर्षों में अवैध शिकार की कोई घटना दर्ज नहीं की गई है. अब यह सबसे ज्यादा आर्थिक रूप से स्थिर गाँव है” मिस्त्री ने बताया.

मिस्त्री ने माना कि संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए चुनौतियां बहुत थी. इस परिवर्तन के लिए वह जीवन यापन में हुए परिवर्तन और वन विभाग के सहयोग को श्रेय देते हैं, जिससे आर्थिक रूप में अधिक समृद्धि हुई है.

“यह मुख्य रूप से लोगो कि सोच में बदलाव था जिसकी आवश्यकता भी थी. धीरे-धीरे लोगों ने समझना शुरू किया कि हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों का अधिक खर्च नहीं करना चाहिए, जिसके लिए वन विभाग के कानूनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई” मिस्त्री ने बताया.

 

शिकारी से संरक्षणवादी अनिल मिस्त्री

 

How a poacher turned conservationist in the Indian Sundarbans

With a lack of progress in his village, Anil Mistry, like many others, took to poaching to earn a living. But a change of heart transpired and Mistry formed an NGO for the protection of mangroves, which in turn meant conservation of the animals in the Sundarbans and an alternative means of livelihood.https://india.mongabay.com/2019/02/05/how-a-poacher-turned-into-a-conservationist-in-the-indian-sundarbans/

Posted by Mongabay-India on Monday, 4 February 2019

 

दिल से कोशिश करने पर इंसान और बाघ के बीच संघर्ष को कम किया जा सकता है. पहले हर महीने चार से पांच बाघ बस्तियों में घुस आते थे. मिस्त्री अब तक 70 बाघों को पकड़ कर छोड़ चुके हैं. मिस्त्री ने अफ़सोस के साथ बताया कि एक बार खुद को बचने के लिए एक बाघ को गोली मारनी पड़ी जिससे उसका पैर टूट गया था. हालाँकि अब बाघों का अवैध शिकार बंद हो चुका है और द्वीप के चारों ओर फेंसिंग (नुकीले तार) लगाने से बाघों को गाँवों में आने से भी रोका गया है.

“बाघ ने जंगल में बहुत लोगो पर हमला किया है लेकिन बाघ गाँवों में नहीं आते और ना ही इंसानों को मारते हैं. हमने उनके स्थान पर कब्जा कर लिया है. मेरे पूर्वजों ने यहां आकर बस्तियां बसाने के लिए जंगलों को काटा और जानवरों को मार डाला. हमने उनके जंगल पर कब्ज़ा कर लिया है और अब खाने वे तलाश में वे इधर उधर भटकते हैं. यह उनकी नहीं अपितु हमारी गलती है.” मिस्त्री ने टिप्पणी करते हुए कहा.

मिस्त्री इंसानो और बाघों के संघर्ष की पारंपरिक परिभाषा से असहमत हैं. “अगर कोई गांव से जंगल में जाता है तो इसे संघर्ष नहीं कहा जा सकता है, यह आत्महत्या है. संघर्ष तब होता है जब एक बाघ गाँव में घूमता है और लोग बड़ी संख्या में उसे देखने के लिए इकट्ठा होते हैं जिससे घबराकर बाघ इधर-उधर भागने लगता है और लोग उसके हमले का शिकार हो जाते हैं.” उन्होंने विस्तार से बताया.

उन्होंने कहा “कि इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च, सुंदरबन बायोस्फीयर रिजर्व और डब्ल्यूजीआई जैसे गैर सरकारी संगठन के लोग पूरी ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं, लेकिन कई ग्रामीण सुंदरवन टाइगर रिजर्व के निषिद्ध क्षेत्रों में प्रवेश करते है. कुछ लोगों को समझ में नहीं आता कि हम जंगलों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और जिनको समझ आता है वो संगठन के लोगो की सहायता करते हैं, फिर भी कुछ लोग निषिद्ध वन क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं. सुंदरवन की सुरक्षा करने वाले देवता बोनोबिबी के प्रति विश्वास भी मैंग्रोव में बाघ से बचने की गारंटी नहीं देता. संरक्षणकर्ताओं ने बताया, “जो लोग बोनोबिबी में विश्वास करके केकड़ों के शिकार के लिए जाते हैं, उनमें से कई वापस नहीं आते हैं और यही कारण है कि गांवों में इतनी परेशानियां हैं.”

 

 

मिस्त्री ने बताया कि “सुंदरबन रिजर्व के अंदर लगभग 86 शाही बाघ हैं जोकि किसी का भी शिकार करने के लिए पर्याप्त हैं. ये स्विमिंग टाइगर भारत के अन्य स्थानों पर पाए जाने वाले टाइगर से अलग हैं. यहाँ हर एक रॉयल बंगाल टाइगर है. वे स्लिम और फुर्तीले हैं क्योंकि उन्हें बड़ी जगह में शिकार करना होता है. उनका एक विशिष्ट रंग है. वे मित्र नहीं हैं, आप उन्हें कार से नहीं ले जा सकते. इन बड़े टाइगर के बारे में एक विचित्र बात है जो आप भूल नहीं सकते वे तैराकी में बहुत समय बिताते हैं.” सुंदरवन में बाघों के बारे में अधिक जानकारी रखने वाले मिस्त्री स्थायी सामुदायिक पर पर्यटन को मदद भी करते हैं. “अगर यहां पर्यटक आएंगे तो यह बहुत अच्छा होगा क्यूंकि यही एक कमाई का जरिया है. पहले पर्यटन से होने वाली कमाई का 25 प्रतिशत हिस्सा यहां के स्थानीय लोगो द्वारा शुरू की गयी ‘संयुक्त वन प्रबंधन’ समिति में जाता था जो अब 45 प्रतिशत है.”

अपनी बात समाप्त करते हुए मिस्त्री ने कहा ,“बाघ संरक्षण, स्थानीय समुदाय की आर्थिक समृद्धि के लिए भी अच्छा है. यहाँ लोग और बाघ एक साथ रहेंगे. पिछले 10 से 15 वर्षों में कोई अवैध शिकार नहीं हुआ है. अगर हम एक साथ होकर पर्यटन को बढ़ावा देते हैं तो यहाँ के लोगो और समुदायों के पास पैसा आएगा जिससे वे संरक्षण का विकल्प चुनने और जंगल में जाने से रोकने के लिए प्रोत्साहित होंगे.”

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