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HUMAN FOR HUMANITY – एक 24 साल के इंसान ने पुरानी प्रथाओं को तोड़ा और लोगो को मासिक धर्म के प्रति जागरूक किया

तर्कसंगत

February 14, 2019

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“क्या आपके साथ भी ऐसा होता है?” राजस्थान की 40 साल की बुजुर्ग महिला ने अनुराग चौहान से पूछा. अपने शुरुआती 20 के दशक में ऐसा सवाल सुनकर अनुराग आश्चर्य चकित रह गया.

अनुराग और उनकी टीम राजस्थान के एक गाँव में थी, जो शहर के तेज़ शोर-शराबे से दूर था. वे महिलाओं और लड़कियों को मासिक धर्म और उसकी स्वच्छता पर जागरूक करने की कोशिश कर रहे थे. ये वो विषय था  जिस पर बंद दरवाजे के अंदर ही बात होती थी. हालांकि उस महिला के सवाल पर हर कोई हंस रहा था पर वो सवाल अनुराग के मन में एक गहरी चोट कर गया. उसने महसूस किया कि हिंदुस्तान की कई महिलायें अभी भी मासिक धर्म के बारे में बहुत ही कम जानती हैं.

 

जमीनी स्तर पर कोई बात नहीं करता

Human for Humanity के 24 साल के संस्थापक अनुराग चौहान ने तर्कसंगत से बात करते हुए कहा, ” हालांकि लोग मासिक धर्म पर बात करते हैं पर फिर भी उसका प्रभाव जमीनी स्तर पर नहीं हुआ है.” सीधे शब्दों में अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि मासिक धर्म की स्वच्छता और सफाई की बातों ने अभी उन लोगों के जीवन को नहीं छुआ है जो देश के भीतरी इलाकों में रहते हैं.

 

 

जबकि अनुराग अपने परिवार के खुले विचारों के कारण बहुत कम उम्र से ही मासिक धर्म के विषय के प्रति संवेदनशील हो गए थे. यह महसूस करने में उन्हें ज्यादा समय नहीं लगा कि स्थिति हर जगह एक जैसी नहीं है. उन्होंने कहा ,”मैं उन महिलाओं और लड़कियों से मिला हूँ जो मासिक धर्म होने पर राख, जूट या सूखी पत्तियों का इस्तेमाल करती हैं.” यह कई भारतीय महिलाओं की दुखद हकीकत है फिर भी या तो वे मासिक धर्म में प्रयोग होने वाले सैनेटरी पैड का इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं या उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं है.

अनुराग, जिन्होंने हमेशा सामाजिक कार्य करने में अपना समय लगाया है, ने इस मुद्दे की ओर ध्यान दिया जो भारतीय महिलाओ को पीड़ा दे रहा है और इस तरह WASH नाम की पहल की शुरुआत हुई जिसका उद्देश्य महिलाओं को मासिक धर्म के बारे में जागरूक करना था. अनुराग का घर और WASH का मुख्यालय दोनों ही देहरादून में हैं और गत तीन वषों से वे लोगो की सहायता कर रहे हैं.

 

मासिक धर्म और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता

यह पहल सिर्फ जागरूकता फैलाने का ही काम नहीं करती अपितु महिलाओं को पर्यावरण के प्रति अनुकूल सैनिटरी पैड भी देते हैं और साथ ही उन्हें यह भी सिखाते हैं कि इसे कैसे बनाया जाता है. उन्होंने बताया ,”पैड गांव की औरतों और स्कूली छात्र बनाती हैं जो दसवीं, बारहवीं या कॉलेज में पढ़ती हैं.” पैड ऐसे सूती कपड़े से बने होते हैं जिन्हें दोबारा इस्तेमाल  करके फिर से बनाया जा सकता हैं. अनुराग ने बताया कि उनके पैड बड़े ब्रांडों के जैसे नहीं हैं फिर भी राख, सूखी पत्तियों और रेत से बेहतर है. इसे महिलाओं और लड़कियों को नि:शुल्क बांटा जाता हैं. देहरादून, दिल्ली और राजस्थान के बाद, WASH ने अपनी अनूठी पहल के साथ महाराष्ट्र में भी कदम रखा है.

 

 

मेडिकल की पढ़ाई करने वाले डॉक्टर, WASH के लोगो के साथ आस पास के कई कस्बों और गांवों में मासिक धर्म, हार्मोनल परिवर्तन, किशोरावस्था से लेकर तरुणावस्था, खान-पान आदि के बारे में जानकारी देते हैं. संगठन के 1500 लोग देश में मासिक धर्म के बारे में लोगो को जागरूक करने का काम कर रहे हैं.

2018 में, WASH ने Breaking The Bloody Taboo अभियान शुरू किया. अनुराग और उनकी टीम ने महिलाओं को इस पुरानी सोच से बाहर निकालने का प्रयास किया. राजस्थान में लोगो ने एक मंदिर में उन महिलाओं के साथ एक सत्र का आयोजन किया जिनके मासिक धर्म चल रहे थे. एक अन्य सत्र में अनुराग ने महिलाओं को तुलसी के पौधे दिये और उन्हें हर महीने एक पौधा लगाने को कहा साथ ही इसके फायदे के बारे में बताया.

 

 

अनुराग ने हमें बताया की, “महिलाओं को कहा जाता है कि वे मंदिरों में नहीं जा सकतीं या मासिक धर्म होने पर तुलसी के पौधे को नहीं छू सकती हैं.” इस अभियान और अनुराग के प्रयासों ने इन आधारहीन बातों को खत्म करने में मदद की है. WASH के पास इस पूरे साल के लिए कई नयीं योजनायें हैं जो मासिक धर्म और उसके बारे में जागरूक करती हैं.

कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय अध्ययनों में भारत में मासिक धर्म स्वच्छता की दयनीय स्थिति को दिखाया गया है. वर्ष 2015-16 में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे ने 15-24 वर्ष की आयु की 166,064 ग्रामीण महिलाओं का सर्वे किया था जिसके अनुसार 51.8% महिलायें अपने पीरियड्स के समय पैड की जगह कुछ अस्वच्छ चीजें इस्तेमाल करती थीं. तर्कसंगत अनुराग चौहान द्वारा पुरानी प्रथा को तोड़ने और भारत में ग्रामीण महिलाओं के बीच मासिक धर्म के प्रति क्रांति लाने के प्रयासों की सराहना करता है.

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