मेरी कहानी

[वीडियो] मेरी कहानी: ठंडी हवा, पत्थरबाज़ी और बहता खून ; भारतीय ट्रेन में सफर करने का मेरा अनुभव

तर्कसंगत

February 14, 2019

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कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप स्लीपर क्लास में सफर करते हैं या भारतीय रेलवे के जनरल डिब्बे में, अगरआपकी किस्मत ख़राब है तो आपका सफर भी ख़राब ही होने वाला है, लेकिन सोचिये तब क्या जब हर दिन आप बदकिस्मत रहे और हर दिन आपका सफर ख़राब हो. ट्रैन नंबर 74001 दिल्ली-रेवाड़ी के बीच चलती है और इस ट्रेन में खिड़कियां नहीं हैं, इसमें शौचालय भी नहीं हैं और जो यात्री इससे यात्रा करते हैं, वे हमेशा पत्थरबाज़ी के भी शिकार होते हैं. विवेक अरोड़ा इस ट्रैन से अक्सर सफर करते हैं और वह भी एक बार पत्थर से चोट खा चुके हैं. इसके बाद उन्होनें वीडियो बना कर यह बताने कि कोशिश की है कि यात्रियों को किन किन परेशानियों से गुज़ारना पड़ता है जिस पर अधिकारी कई शिकायतों पर भी ध्यान नहीं देते.

तर्कसंगत अपने पाठकों से यह गुज़ारिश करता है कि से ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें ताकि विवेक की बात उच्च अधिकारीयों तक पहुंचे और इस समस्या का हल निकाला जा सके.

 

 

उन्हें अपना अनुभव हमारे साथ साझा किया

जब मैं एक बच्चा था तब से मुझे रेलगाड़ियों में सफर करना अच्छा लगता था. लगभग एक दशक से मैं ट्रेन से काम के लिए रेवाड़ी से दिल्ली आ रहा हूं. एक फोटोग्राफर और फिल्म निर्माता होने के नाते, मेरे कामों के लिए मुझे हर दिन रेवाड़ी, हरियाणा से आने और जाने की आवश्यकता होती है. 2016 से मैं इस 74001 डली-री डमू से आ रहा हूं, जो दिल्ली (DLI) और रेवाड़ी (RE) के बीच चलती है. मगर समय के साथ इस ट्रेन की हालत ख़राब होती गई. मैंने इस मामले की ओर अधिकारियों का ध्यान खींचने के लिए सब कुछ करने की कोशिश की, लेकिन कुछ नहीं हुआ. मुझे ट्रेन में ‘पथराव’ जैसे कुछ बुरे अनुभवों से गुज़रना पड़ा, जो अक्सर होते हैं, मैं भी एक बार अपने सिर पर चोट खाई है और बुरी तरह से खून बहा है, मुझे मालूम था कि मेरे से पहले लोग इस कारण से गया ल हुए हैं मगर नहीं सोचा था कि मेरा भी एहि हाल होगा. नवंबर 2016 में, मैं घर वापस जा रहा था और किसी ने ट्रेन पर एक पथराव किया और मैं हड़बड़ा गया; पत्थर इतनी ज़ोर से लगा कि मेरे बाएं कान ने काम करना बंद कर दिया है और मैं इससे नहीं सुन सकता, उस दिन मेरा काफी खून बहा. उसके बाद, मैं ट्रेन से यात्रा करने मैं सौ बार सोचता हूँ.

 

 

उस पत्थर ने सचमुच मेरे सोच पर चोट पहुंचाई थी. ये मेरे लिए जानलेवा हो सकता था मगर दिल्ली कैंट के पास रहने वाले कुछ लोगों के लिए ये एक मनोरंजन का साधन है, उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है, ये बताने वाला नहीं है कि वो गलत कर रहे हैं.  

इस ट्रैन की खिड़कियों पर शीशे नहीं लगे.अब आप सोचिये दिल्ली की सर्दी में इस ट्रैन में सफर करना कितना तकलीफदेह हो सकता है. जब ठंडी हाव के थपेड़े आपके चेहर और सर पर पड़ते हैं और आप अंत में बीमार पड़ जाते हैं.

ट्रेन में कोई शौचालय नहीं है जो पाषाण युग का एहसास दिलाने जैसा है. मुझे एक बार एक शौचालय का उपयोग करने के लिए 2 घंटे तक इंतजार करना पड़ा जो अपने आप में एक पनिशमेंट से कम नहीं था. मैं दिल्ली कैंट से ट्रेन में सवार होता हूँ और वहाँ से रेवाड़ी पहुँचने में 2 घंटे लगते हैं, वैसे हाल में मैं हमेशा नहीं होता मगर उस बदकिस्मत दिन मुझे पता चला कि उस ट्रेन के सभी वाशरूम सील कर दिए गए थे. इसने मेरे सफर को एक सजा बना दिया है, ट्रेन बीच में स्टेशनों पर 10 सेकंड से अधिक नहीं रुकती है और यह पर्याप्त समय नहीं है. यह एक टॉर्चर था. मैंने अपना धैर्य तब तक बनाये रखा जब तक कि मैं रेवाड़ी नहीं पहुँच गया और ईमानदारी से कहूँ तो यह कठिन भी था, मैं किसी तरह रेवाड़ी स्टेशन पर वाशरूम पहुँच गया. मेरा मूत्राशय उस दिन फटने वाला था, ये काफी ख़राब अनुभव था.

इसलिए मैंने आखिरकार कुछ करने की सोची और अपने काम का इस्तेमाल करते हुए वीडियो बनाया. मैंने सोचा कि अगर मुझे इन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है तो दूसरे लोगों को भी यह सब झेलना पड़ता होगा जैसा कि उम्मीद की जा रही थी, मुझे पता चला कि इस ट्रेन में आने वाला हर कोई इस सफर में होने वाले दिक्क्तों से परेशान है, लेकिन कोई भी वास्तव में इसके बारे में कुछ नहीं कहता है, हो सकता है कि वे कोशिश कर के थक चुके हैं या उन्होंने स्थिति को स्वीकार कर लिया था कि ये ‘तो जैसा है वैसा ही रहेगा’, लेकिन मैं कम से कम एक बार कोशिश करना चाहता था.

मैं शुरू में यह सोचकर उलझन में था कि क्या लोग इस बारे में बात करना चाहेंगे? लेकिन जैसे ही मैंने शुरू किया लोग शामिल हो गए और बात करने के लिए उत्सुक थे … और उन्होंने अपने दिल की बात बाहर की ऐसे जैसे वे मेरे वीडियो बनाने का ही इंतजार कर रहे थे. मुझे चारों ओर से बिना शर्त समर्थन मिला. मुझे लगता है कि यह गाड़ियों के लिए मेरा प्यार था और वह अनुभव जिसने मुझे ये सब कुछ करने की हिम्म्मत दी. 

ये एक आदमी की अपने माध्यम से केवल एक बदलाव लाने की कोशिश है.

 

कहानी: विवके अरोड़ा

 

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