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हैदराबाद की दो टीचर जो न केवल छात्रों की बल्कि उनकी माँ की भी ज़िन्दगी बदल रही हैं

तर्कसंगत

February 15, 2019

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ज्यादातर  महिलायें किसी न किसी के बारे में सोचती हैं और उनकी जिंदगी सिर्फ घर तक ही सीमित होती है. इसी वजह से कई बार उनकी पैसों की आजादी को भी नजरअंदाज कर दिया जाता है. हैदराबाद की एक एनजीओ, UMEED, एक ऐसा संगठन है जो इन महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करता है.

UMEED की शुरुआत 2014 में Teach for India के दो शिक्षक गौरी महेंद्र और उदिता चड्ढा ने की थी जिसका उद्देशय दुनिया का महिलाओं के प्रति व्यवहार और उनके जीवन में स्थायी परिवर्तन प्राप्त करना था.

 

कम मजदूरी और अच्छा दाम

उदिता और गौरी एक दूसरे से हैदराबाद में तब मिले थे जब वे Teach for India की तरफ से प्राथमिक सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहीं थीं. गौरी ने तर्कसंगत से बात करते हुए बताया “स्कूलों में ज़्यादातर बच्चे कम आय वाले घरों से थे और नियमित रूप से अनुपस्थित रहते थे. जब हमने इसके पीछे की वजह जानने की कोशिश करी तो पता चला कि उनके घर पर समस्यायें थीं.”

 

 

स्कूल ना जाने के पीछे का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि कई बच्चे स्कूल इसलिए नहीं आते क्योंकि वे बाल मजदूरी करते थे. ट्रैफिक सिग्नल पर अखबार बेचना, खिलौने और गुलाब बेचना या तेलुगु टेलीविजन पर बाल कलाकार के रूप में काम करना. ये बच्चे तेलुगु फिल्मों और टेलीविजन में अतिरिक्त कलाकारों के रूप में काम करते थे. प्रति दिन मात्र 200 रुपये के लिए इन बच्चों को सुबह से लेकर शाम तक सेट पर रहना पड़ता था.

31 वर्षीय गौरी ने बताया “कई लोगों के लिए यह कोई खबर नहीं है क्योंकि ज्यादातर जगहों पर यह आम बात है लेकिन जमीनी स्तर पर काम करने वाले हमारे जैसे लोगो को इसने हिला दिया था. इन बच्चों के माता-पिता, जो आर्थिक रूप से कमजोर थे, उन्हें भी उनके काम करने से आपत्ति नहीं थी क्योंकि यह उनकी आर्थिक रूप से सहायता करता था.

 

 

एक से भले दो

भारतीय घरों में ज्यादातर पुरुष ही पैसे कमाते हैं और महिला घर संभालती है. हालांकि अगर पैसे का अभाव हो तो बच्चे भी घर वालों की मदद करने के लिए काम करना शुरू कर देते हैं. लखनऊ, उत्तर प्रदेश की रहने वाली गौरी हमें बताती हैं कि अपने शिक्षण के दिनों में उन्होंने कई समुदाय के लोगों, अपने छात्रों के माता-पिता और कई परिवारों से बात की, इसके बाद यह निष्कर्ष निकाला कि एक परिवार में पैसों का अभाव इसलिए होता है क्योंकि वहाँ केवल उनके पति ही कमाते हैं.

पर यदि महिलायें भी परिवार में आर्थिक रूप से सहयोग करें तो ये बोझ कम हो जाएगा. गौरी ने बताया कि इससे न केवल महिलाओं को आत्मनिर्भर होने में मदद मिलेगी, बल्कि उनके बच्चों को अपनी शिक्षा में आगे बढ़ाने का मौका भी मिलेगा जिससे उन्हें बाहर जाकर नौकरी नहीं करनी पड़ेगी.

 

 

माताओं को रोजगार के लिए प्रेरित करना

उन दोनों ने अपने छात्रों की माताओं को यह समझाया कि वे न केवल अपने बच्चों को स्कूल भेजें, बल्कि काम करने के लिए खुद भी घर से बाहर निकलें.

गौरी ने बताया “चूंकि हम उन बच्चों को पढ़ाते थे, इसलिए उनसे बात करना आसान था, लेकिन मुश्किल तो इन बच्चों की मॉं को काम करने के लिए समझाना था. बहुत प्रयासों के बाद कुछ महिलाओं ने काम करने के लिए सहमति जतायी लेकिन कुशल प्रशिक्षण की कमी के कारण इन महिलाओं को मुसीबत का सामना करना पड़ा, तब गौरी और उदिता ने महिलाओं को प्रशिक्षित करने का फैसला किया.

गौरी, तिलोनिया राजस्थान के Barefoot College में नये नये तरीके सीखने गयी और वापस आकर उन्होंने महिलाओं को वह सब सिखाया जिससे वे सशक्त बनी और उनके जीवन यापन में आसानी भी हुई. गौरी का Barefoot College में जाना और गांव की समस्याओं का हल निकालने के तरीके ने इस संगठन की नींव रखी.

 

सिर्फ पांच महिलाओं से शुरुआत

Barefoot College से कई दिनों तक सीखने के बाद 2014 में उदिता और गौरी ने महिलाओं को हस्तशिल्प का काम सिखाने का फैसला किया. दिलचस्प बात यह है कि UMEED ने सिर्फ पांच महिलाओं के साथ शुरुआत की थी.

UMEED के माध्यम से महिलाओं को सरल, सुंदर और पर्यावरण के अनुकूल हस्तशिल्प बनाना सिखाया गया. इसके बाद हम कई बड़े और प्रसिद्ध कार्यक्रमों, संगठनों और सामाजिक स्थानों पर सामान बेचने के लिए जाने लगे.

गौरी ने तर्कसंगत को बताया “UMEED में महिलाओं के लिए तीन चरण होते हैं. पहला कदम ‘कुशल प्रशिक्षण’ है, जिसमें महिलाओं को हस्तशिल्प बनाना सिखाया जाता है. दूसरा है ‘महत्त्व और सही सोच’ क्यूंकि केवल कौशल ही महत्वपूर्ण नहीं है, इसलिए अनेक सत्रों में इन महिलाओं के व्यक्तिगत बढ़ावें पर जोर दिया जाता है. तीसरा है ‘लोगो तक पहुँचना.’ हमारा उद्देश्य इन महिलाओं को मजदूर नहीं अपितु व्यवसायी बनाना है. यही वजह है कि दुनिया के लिए उनका प्रदर्शन भी महत्वपूर्ण है. लोगो तक पहुँचाने की प्रक्रिया में हस्तकला के स्टॉल खोले जाते हैं. अपने उत्पादों को बढ़ावा देने और महिलाओं को और सीखाने के लिए हम विभिन्न कॉर्पोरेट घरानों में भी जाते हैं.

अब तक, UMEED के लिए काम करने वाली करीब 30 महिलाएं हैं. उनमें से ज्यादातर रविवार को आतीं हैं और सामान अपने घर ले जाती हैं फिर अगले हफ्ते वे कच्चे माल से बने उत्पादों को लाती हैं. अच्छी तरह से जांच के बाद इन उत्पादों को बेचने के लिए भेजा जाता है. हस्तशिल्प के अलावा महिलायें दीवाली, क्रिसमस आदि त्योहारों के लिए सजावट का  सामान भी बनाती हैं. गौरी का दावा है कि प्रत्येक महिला अपने उत्पादों से लगभग 3000 से 5000 रुपये तक कमाती है.

 

जुझारू और अपने हक़ के लिए खड़ी होने वाली

UMEED महिलाओं और बच्चों के लिए अलग-अलग सत्र भी आयोजित करता है. इनमें से एक का नाम है ‘अच्छा-बुरा’. जिसमें महिलायें अपने काम में आ रही समस्याओं के बारे में चर्चा करती हैं. गौरी ने बताया “अगर कोई महिला हमारी मदद मांगती है, तो हम उनकी मदद करते हैं.”

गायत्री (बदला हुआ नाम) के लिए एक जबरदस्ती की शादी से बाहर आना बहुत मुश्किल था. जब उन्होंने संगठन से मदद मांगी, तो उन्हें उचित मार्गदर्शन और समर्थन दिया गया. वह कई वर्षों तक UMEED का हिस्सा थीं. गायत्री अब एक स्वतंत्र महिला है, जो उस शादी से मुक्त अपनी शर्तों पर जिंदगी जी रही हैं.

इसी तरह अपने बीमार पति और बच्चों की देखभाल करने के लिए राइमा (बदला हुआ नाम) को बहुत मुश्किल हो रहा था पैसों की तंगी इतनी थी कि उसके 13 साल के बेटे ने परिवार की मदद के लिए सड़कों पर काम करना शुरू कर दिया. सौभाग्य से UMEED को सही समय पर राइमा की समस्या के बारे में पता चला हमने उनकी मदद की और वो UMEED के साथ जुड़ गयी.

गायत्री और राइमा जैसी कई और महिलाएं हैं, जो अब सशक्त हो रही हैं. भारत में महिलायें सालों से प्रतिबन्ध में थीं. महिलाओं और बच्चों के प्रति इन सामाजिक समस्याओं और बाधाओं को ध्यान में रखते हुए UMEED एक सहायता प्रणाली के रूप में कार्य करता है.

UMEED प्यार, आशा और साहस की यात्रा है जिसका उद्देश्य कई और महिलाओं को बेहतर भविष्य और सम्मानजनक जीवन प्रदान करना है. UMEED अधिक से अधिक महिलाओं के साथ काम करने और जमीनी स्तर पर नेतृत्व करने की दिशा में काम करने के लिए तैयार हैं. तर्कसंगत UMEED के प्रयासों की प्रशंसा करता है और आशा करता है कि उनकी इस यात्रा में और अधिक लोग जुड़ेंगे.

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