पर्यावरण

हजारों किलों फूल हर दिन मंदिरों से बाहर फेंके जाते हैं, यह टीम उन्हीं फेके हुए फूलों की अगरबत्ती बनाती है

तर्कसंगत

February 18, 2019

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क्या आप अपनी प्रार्थना करने के लिए किसी मंदिर में जाते हैं. आप अपने साथ फूल, अगरबत्ती और अन्य धार्मिक वस्तुएं अवश्य लेकर जाते होंगे. हालांकि, क्या आपने कभी फूल, माला और अन्य वस्तुओं के बारे में सोचा है जो देवता के सामने अर्पित होने के बाद इनका क्या होता है? प्रतिदिन फूलों की पंखुड़ियां अन्य कूड़े के साथ गंगा में फेकी जा रही थी, कानपुर के अंकित अग्रवाल के लिये यह अब एक आम बात हो गयी थी. जो ये जानते थे कि गंगा नदी का पानी इसके कारण जहरीला होता जा रहा है.

जब अंकित ने एक कंप्यूटर इंजीनियर के रूप में अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ दी, तो उनके माता-पिता चिंतित थे कि वह मंदिरों को साफ करने के लिए एक हाई-प्रोफाइल नौकरी छोड़ रहे हैं. आज उन्होनें U.N. असेंबली में खड़े होकर, अंकित ने पूरे देश को गौरवान्वित किया है.

आज, उनके एकमात्र प्रयासों के कारण, यूपी के कानपुर, कन्नौज और उन्नाव में मंदिरों से निकलने वाले फूलों को सभी तरह की अगरबत्तियों, वर्मीकम्पोस्ट और आर्गेनिक थर्मोकोल में बदल दिया जा रहा है. उनकी कंपनी “हेल्प अस ग्रीन” स्थानीय ग़रीब महिलाओं को अपने साथ जोड़कर, उन महिलाओ के हुनर को; कुछ नये उत्पादों के साथ, एक शानदार पहचान दी है. अभी हाल ही में, अंकित अग्रवाल को यूनाइटेड नेशंस यंग लीडर्स अवार्ड मिला है.

 

 

हेल्प अस ग्रीन के पीछे की कहानी

अंकित ने तर्कसंगत के साथ बात करते हुए बताया, मुझे याद है वह मकर संक्रांति का दिन था, जब चेक रिपब्लिक के मेरे एक मित्र एक यात्रा के लिए कानपुर आए थे. हम घाट पर बैठे थे, नदी की दुगम स्थिति से बेपरवाह होने का नाटक कर रहे थे, जब मेरे दोस्त ने मुझे इसके बारे में कुछ करने के लिए उकसाया. मैंने उसे यह कहते हुए समझा दिया कि भारत में यह एक धार्मिक मान्यता है. लेकिन, जब मैंने एक स्थानीय मंदिर को नदी में फूलों के कचरे के ढेर को उतारते देखा, तो मैं दंग रह गया”.

एक बढ़िया समाधान के लिए, अंकित ने अपने बचपन के दोस्त करण रस्तोगी की मदद की, जो नियमित रूप से मंदिर रोज जाया करते थे.

अंकित बताते हैं, “पहले तो हम इस क्षेत्र में काम शुरू करने से हिचकिचा रहे थे, क्योंकि धर्म एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है, और हम इस बात से चिंता में थे कि हमारी पहल का स्वागत किया जाएगा या उनके विचार को अस्वीकार/नकार कर दिया जाएगा”.

इसके साथ ही, उन्होंने ने एक लंबे समय तक सर्वेक्षण किया, जिसके दौरान उन्होंने फूल विक्रेताओं, मंदिर के पुजारियों और भक्तों के साथ बातचीत की और स्थिति की गंभीरता को समझा. हमें पता चला कि कानपुर मंदिरों में हर एक दिन में लगभग दो टन फूलों का कचरा पैदा होता है. यह अफसोस की बात है कि इस संबंध में कोई सरकारी नीति, कोई कानून या पहल नहीं थी, क्योंकि किसी ने भी इस समस्या के बारे में एक विचार भी नहीं उठाया है.

महीनों के सर्वेक्षण और रिसर्च के बाद, मई 2015 में, अंकित ने करण के साथ “हेल्प अस ग्रीन” की शुरुआत की; और उन्होंने मंदिर के कचरे को रीसायकल करने नए तरीके खोजे हैं.

 

फूल चमत्कार का काम करते हैं

हेल्प अस ग्रीन में, मंदिरों में पूजा के भाग के रूप में चढ़ाए गए फूलों के ढेर अगले दिन एकत्रित किए जाते हैं. महिलाएं, जो कभी कचरा इक्कठा का कार्य करने के लिए समाज द्वारा निष्काषित थीं, अब हेल्प अस ग्रीन की फैक्ट्री में वह सभी एक मूल्यवान कर्मचारी हैं. उन सभी का कमजोर कौशल, फूलों की पंखुड़ियों को छाँटने और उन्हें पूरी तरह से आर्गेनिक सुगंधित अगरबत्ती में बदलने में मदद करते हैं. अंकित ने कहा, “हमने अपने पहले उत्पाद का नामकरण करने के लिए “फ्लावर साइकिल्ड” शब्द को चुना है”.

 

 

“फ्लावर साइकिल्ड” अगरबत्ती केवल सिर्फ़ एकलौती वस्तु नहीं है जिसका उन्होंने नवीनीकरण किया है. हेल्प अस ग्रीन फूल, पत्तियों और तनों के सड़े हुए कचड़े से हाई ग्रोथ को बढ़ावा देने वाले वर्मीकम्पोस्ट (एक प्रकार की जैविक खाद) तैयार करता है. उन्होंने स्थानीय कॉफी की दुकानों, नारियल की भूसी और अन्य प्राकृतिक कचरे से एकत्रित कॉफी अवशेषों को जोड़कर अपने वर्मीकम्पोस्ट को प्रीमियम क्वालिटी वाली खाद में सफलतापूर्वक बदल दिया है.

आईआईटी, आईआईएम और अन्य प्रमुख संस्थानों से फंडिंग सहायता के कारण, हेल्प अस ग्रीन ने हाल ही में अपनी रिसर्च एंड डेवलपमेंट विंग शुरू की है, जहां रिसर्च विशेषज्ञों ने “ फ्लोरोफोम”- दुनिया का पहला आर्गेनिक थेर्मोकोल का आविष्कार किया है. अभी यह उत्पाद अपने आखरी चरण में है और जल्द ही मार्केट में बिक्री के लिये उपलब्ध होगा.

 

 

एक पैकेट बीज बोंये और उन्हें पेड़ बनने में मदद करे

हर सुबह, जब फूलों के कचरे का ट्रक लोड होकर “हेल्प अस ग्रीन” वर्कशॉप में पहुंचते हैं, तो इसमें प्लास्टिक के पैकेट होते हैं, जिन्हें अलग करने में कर्मचारियों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है. यह सुनिश्चित करने के लिए कि समस्या को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है, कंपनी ने तुलसी के बीजों के साथ अगरबत्ती के पैकेट को पैक करते है, जिससे पैकेट खाली होने पर बचे हुए बीजो को मिट्टी में लगा/बों दिया जाता है, जो आगे चलकर एक भव्य, मनमोहक सुगंध वाली तुलसी का पौधा बनेंगे. अंकित ने गर्व के साथ यह बताया कि, “ धर्म को स्थायी बनाने के हमारे प्रयास का सभी ने बहुत स्वागत किया”.

 

अब पिछड़े वर्ग के लोगो के जीवन में अंतर आया है

रंजना अपने बच्चों की शिक्षा के लिए एक अस्पताल में काम करती थी, जिसमे उन्हें रोगियों का रक्त, मवाद या शारीरिक स्राव को साफ करने जैसे कार्य को करने के लिए जिम्मेदारी सौंपी गयी थी. उनके साथ अक्सर अछूतके रूप में दुर्व्यवहार किया जाता था, और उनके पड़ोसी उनके बच्चों के साथ बातचीत करने से बचते थे. हेल्प अस ग्रीन में उनके रोजगार ने परिस्थितियो को बदलने में बहुत मदद की है, और उन्हें अब यह लगता है कि अब वह बहुत नेक काम कर रही है. उनके लिए, अब जातिगत भेदभाव पूरी तरह से स्पष्ट हो गया, जब आज एक पुजारी और एक ऊंची जाति के लोग उनके घर पर चाय के लिए आते है.

हेल्प अस ग्रीन में काम करने वाली लगभग 78 अन्य महिलाओं के लिए यह कहानी समान रूप से दिल को छु लेनी वाली है. उनमें से अधिकांश महिलाए स्वच्छता कार्यकर्ता के रूप में काम करती थी और अनचाहे भेदभाव का सामना करती थी.

 

 

अंकित बताते है, हम न केवल इन सभी महिलाओ को उचित वेतन, स्वास्थ्य और रिटायरमेंट प्लान का लाभ प्रदान करते हैं, बल्कि हमने कार्य-प्रक्रिया को आरामदायक बनाने के लिए, सभी महिलाओ को एक दैनिक बस सेवा की भी व्यवस्था की है. हमारे पास 2022 तक लगभग 5000 महिलाओं को जोड़ने की योजना है”.

उन्होंने एक कर्मचारी के बारे एक किस्सा बताया, जिसने अपने वेतन से एक रेफ्रिजरेटर खरीदने के बाद हर किसी को मिठाई बाटी थी. घर पर ठंडा पानी पीना उसकी जीवन भर की इच्छा थी.

 

अब तक का सफर

अंकित गर्व से बताते हैं, “हमने प्रतिदिन 12 किलोग्राम फूलों के कचरे को रीसायकल करने की शुरुआत की थी, अब हम रोजाना 4.4 टन फूलों कर रहे हैं”. यह डेटा ही उनकी भारी सफलता का सबसे बड़ा सबूत है. जल्द ही, यह जोड़ी मथुरा और वाराणसी के मंदिरों के साथ सहयोग करने की योजना बना रही है, जहां प्रतिदिन क्रमशः 12 टन और 21 टन कचरा उत्पन्न होता है.

वित्तीय बाधाओं से लेकर धीरे-धीरे एक पूरे नए उद्योग को विकसित करने तक, अंकित और करण के लिए चुनौतियां बहुत बड़ी थीं. इस जोड़ी ने दृढ़ता बनाई और उनके प्रयासों को फोर्ब्स इंडिया के साथ-साथ बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने भी मान्यता दी. अब संयुक्त राष्ट्र द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया है, अब वह समाज में सकारात्मक बदलाव लाना जारी रखना चाहते हैं.

 

तर्कसंगत ने हेल्प अस ग्रीन के शानदार प्रयासों की सराहना की और अधिक लोगों को उनके उदाहरण को अपनाने का आग्रह किया.

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