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राजस्थान: 56 विद्यालय 56 गाँवो में बदले; बच्चों को जीवन का एक नया अवसर मिलता है

तर्कसंगत

February 18, 2019

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राजस्थान के उत्तरी भाग के चूरू जिले के एक कस्बे राजगढ़ के अंदरूनी हिस्से में कई छोटे स्कूल हैं, जहाँ  दीवारें नहीं है, बंद पुस्तकालय और सुस्त वातावरण है. बच्चे सीखने के लिए शायद ही कोई प्रेरणा के साथ स्कूल आते है और उनमें से कई ने स्कूल छोड़कर कहीं और जाकर अपनी खुश ढूंढ ली है.

लेकिन यह सब अब अतीत की बात है, 2008 में स्थापित पिरामल फाउंडेशन फॉर एजुकेशन एंड लीडरशिप नामक एक संगठन ने इन स्कूलों की शिक्षा प्रणाली को आकार देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. संगठन के संस्थापक और सीईओ आदित्य नटराज के मन में कई विचार थे. उनमें राजगढ़ में स्कूलों का विकास और उनकी शिक्षा प्रणाली थी.

उन स्कूलों में जहाँ नीरस वातावरण है, छात्रों को स्वाभाविक रूप से सीखने का मज़ा नहीं मिला. एक खुशहाल माहौल बनाने के इरादे से, संगठन ने एक स्कूल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया.



लाइब्रेरी की मरम्मत 

“मैं राजगढ़ के सरकारी स्कूलों में पिछले 18 महीनों से काम कर रही हूँ, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि छात्रों को स्कूल आकर अपने हुनर को निखारने का कुछ सीखने का मौका मिल सके. पर्यावरण एक बच्चे की रुचि को आकार देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है, जो मुझे लगता है कि इन स्कूलों में नहीं थी. मैं वर्तमान में गांधी फैलोशिप का हिस्सा हूँ जो दो साल का यूथ लीडरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम है, और मैं एक ऐसी प्रक्रिया का हिस्सा होने पर गर्व करती हूँ, जो बच्चों की भलाई के लिए काम करता है.” पलक शर्मा ने तर्कसंगत से बातचीत में कहा. पिछले कुछ समय से पलक इस पहल का हिस्सा हैं.

जब पलक पहली बार अपनी टीम के साथ राजगढ़ आई, तो दो चीजें थीं जिसने उन्हे सबसे ज्यादा प्रभावित किया. “पहली स्कूलों में दीवारों पर कोई रंग नहीं था, जिससे एक बेरंग वातावरण बना हुआ था. दूसरा, स्कूलों के पुस्तकालय कभी नहीं खोले गए थे. “वे मेरे लिए मृत प्रतीत होते थे, पुस्तकों का उपयोग कोई नहीं कर रहा था, हालांकि वे स्कूल थे, जहां किताबें और ज्ञान पर बच्चों का फ़ोकस होना चाहिये. छात्रों की भी रूचि न देखकर मुझे आश्चर्य हुआ और मैंने उनके लिए कुछ करने का फैसला किया.

अब तक, उनके प्रयासों से राजगढ़ के 56 गांवों में 56 स्कूलों को नया रूप और आकार देने में मदद मिली है. शुरू में, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि प्रत्येक पुस्तकालय को खोला जाए और उचित तरीके से काम में लाया जाये. उन्होंने सुनिश्चित किया कि छात्र पुस्तकालयों में सीखने के इरादे से आये.

“हम यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि बच्चों को इस प्रक्रिया में मजबूर नहीं किया जाए, लेकिन यह भी कि वे अपनी रुचि से आये. इनमें से अधिकांश बच्चों के परिवारों ने पढ़ाई नहीं की है, और जिन्होंने की भी है वो लगभग न के बराबर. पलक ने कहा कि बच्चों को प्रेरित करने के लिए कोई नहीं था और ऐसे सुस्त स्कूल के माहौल के साथ, यह स्वाभाविक था कि वे स्कूल छोड़ देते और सीखना नहीं चाहते थे.



दीवारों की पेंटिंग

पहल का अगला लक्ष्य स्कूलों की दीवारों को चित्रित करना था, लेकिन पेशेवर कलाकारों द्वारा नहीं. हमने छात्रों से दीवारों को खुद पेंट करने का आग्रह किया. यह भी, मुझे विश्वास है, उनके लिए एक महान सीखने का अनुभव था, क्योंकि ये पेंटिंग  स्क्रिबब्लिंग नहीं थीं, लेकिन भूमिति व्याकरण, शब्दों के सिद्धांत थे. मैं बता सकती थी कि बच्चों को इसे करने में कितना मज़ा आया. उन्होंने अपने स्वयं के हाथों से एक खुशहाल रंगीन वातावरण बनाया, “तर्कसंगत के साथ बातचीत में, प्रोग्राम मैनेजर प्रभात गौतम ने कहा.

 

 

नये वातावरण में स्कूलों ने छात्रों को नियमित रूप से आते देखना शुरू किया. छात्रों के पढ़ने के लिए आते ही पुस्तकालयों मे एक नयी जान आई .

तर्कसंगत  से बात करते हुए, GASSS Nyangal Chotti School जो 56 स्कूलों में से एक है जिस पर संगठन ने काम किया है, उसी के हिंदी शिक्षक, महेंद्र सिंह ने कहा, “संगठन के लोगों ने हमारे स्कूलों के लिए बहुत कुछ किया है, और हमने कोशिश की उनके साथ यथासंभव सहयोग करें. ये बच्चे जिस वातावरण से आते हैं, उन्हें सीखने के लिए बहुत प्रेरणा नहीं मिलती है. इस संगठन ने स्कूलों के पर्यावरण को बेहतर बनाने में हर एक कदम पर मदद की है. एक शिक्षक के रूप में, एक बच्चे को एक शिक्षित व्यक्ति के रूप में विकसित होते देखना एक बड़ी खुशी है. शिक्षा, हमारे जीवन के सबसे बड़े हिस्सों में से एक है.”



चुनौतियां और प्रेरणा

“उन छात्रों के साथ जुड़ना जो पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं और उन्हें बढ़ने में मदद करना एक सुंदर अनुभव रहा है. जिन पुस्तकालयों में बहुत कम किताबें थीं और हर समय बंद रहती थीं, वे अब उन पुस्तकों से भर गई हैं, जिन्हें हमने सामुदायिक क्राउडफंडिंग के माध्यम से खरीदा था. इसके अलावा, स्कूलों ने किताबों में भी योगदान दिया, और गांव के सरपंच ने हमें उसी के लिए धन जुटाने में मदद की. हमने गैर-सरकारी संगठनों के साथ भी सहयोग किया जो छात्रों की भलाई की दिशा में काम करते हैं. हमें लोगों का भरपूर समर्थन मिला है और काफी सराहना भी मिली है. बच्चों को अब किताबों से इतना लगाव हो गया है कि वे छुट्टियों में लाइब्रेरी आते हैं, और  गांवों के बुजुर्ग लोग उन्हें कहानियां सुनाने के लिए शामिल होते हैं, ”पलक ने कहा.

कार्यक्रम के दौरान, पलक और अन्य सदस्य गाँव के लोगों के साथ रहते थे और उन्हीं का हिस्सा बन गए थे. पलक के मुताबिक, मुख्य चुनौती गांवों में महीनों बिताने की रही है. महानगरों के आराम से आने पर इन गांवों में समय बिताना आसान नहीं  है.

पलक ने कहा, “बच्चों के साथ संबंध बनाने में हमें बहुत समय लगा है, लेकिन अंत में उनका स्वागत करने वाला स्वभाव ही हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है.”

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