सप्रेक

इस राजस्थान के मैकेनिक ने 1000 से अधिक, जंगली जानवरों की ज़िन्दगी बचायी है

तर्कसंगत

February 20, 2019

SHARES

राष्ट्रीय राजमार्गों/ नेशनल हाईवे पर चलने वाली गाड़ियों में यात्रा करते समय हम अक्सर उन पर हमारे सामने आ जाने वाले जानवरों को घायल कर देते है. यद्यपि हम उन्हें तड़पते हुए देखते हैं, हम कभी भी यह भी नहीं सोचते कि हमारी ज़िम्मेदारी है एक बार झुककर/रुककर, उन बेजुबानो के जख्मों को देख ले कि वह बच गए या नहीं. वह वाहनों द्वारा बिना किसी कारण के टक्कर के कारण अपनी जान से हाथ धो बैठते है और तो और इन निर्दोष जानवरों को कभी भी अपनी जरुरत के उपचार भी नही मिलते है. हालाँकि, कुछ महान हस्तियाँ अभी भी हैं, जो इन जानवरों के जीवन को अपने जीवन से ज्यादा महत्व देते हैं और उनकी किसी भी तरह से मदद करने और उनकी रक्षा करने का प्रयास करते हैं. राजस्थान के एक मैकेनिक पीरा राम बिश्नोई एक ऐसे ही व्यक्ति हैं, जिन्होंने पिछले 10 वर्षों में 1100 से अधिक जानवरों को बचाया है.

 

बचपन से ही पशु प्रेमी थे

पश्चिमी राजस्थान की सीमा के पास एक छोटे से गाँव में एक किसान परिवार में जन्मे, पीरा राम ने अक्सर अपने माता-पिता के साथ काम करने के दौरान मोर, खरगोश, हिरण, खेत में अन्य जानवरों को देखा. वह अक्सर अपने माता-पिता से पूछते थे कि उन्होंने जानवरों को ऐसा करने की अनुमति क्यों दी, जिसके लिए उन्होंने उत्तर दिया कि हम उन पर उतना ही निर्भर है, जितना की वह हम पर हैं. धीरे-धीरे, वह इन जानवरों के प्रति स्नेह बढ़ाते गये और उनसे अलग होने में नाकाम रहे.

 

पहला जानवर जिसे उन्होंने बचाया

राष्ट्रीय राजमार्ग/ नेशनल हाईवे – 56 के पास एक छोटी सी टायर पंचर की दुकान होने से, पीरा अक्सर जानवरों को दुर्घटनाग्रस्त होने के बारे में सुना करते थे. इन जानवरों की सहायता के लिए लगभग 300 किलोमीटर के दायरे में कोई गार्ड या अधिकारी नहीं थे, जिसने उन्हें बहुत असहाय महसूस कराया. अंत में, उन्होंने मामले को अपने हाथों में लेने का फैसला किया. जब उन्होंने एक चिंकारा को दर्द में कराहते हुए देखा और कार की चपेट में आने के बाद वह सड़क पर रेंग रहा था. पीरा घायल जानवर को निकटतम क्लिनिक में लेकर जाते थे और स्वयं उपचार के लिए पैसे देते थे. इस घटना के बाद, उन्हें इन जानवरों को बचाने से कोई रोक नहीं पाया. अगले पांच वर्षों में, उन्होंने सभी प्रकार के संकटग्रस्त जानवरों और पक्षियों को घर पर लाते थे और उनकी देखभाल, उपचार करने के बाद उन्हें आजाद कर देते थे. उनका परिवार, जो जानवरों से उतना ही प्यार करता था, जितना वह उन्हें इस तरह के नेक काम करते देख उनसे ज्यादा खुश थे.

 

10 साल में 1100 से अधिक जानवरों को बचाया

पीरा ने काला हिरण, भारतीय ख़रगोश, कुरजां पक्षियों, बंदर और रेगिस्तानी लोमड़ी जैसे दुर्लभ प्रजातियों का उपचार किया. अपने काम का विस्तार करने के लिए, स्वतंत्र रूप से एक एनजीओ का पंजीकृत करने का फैसला किया, पीरा और चार अन्य कार्यकर्ताओं के साथ 5 जून 2012 को उन्होंने “श्री जम्बेश्वर पर्यावरण एवं जीव रक्षा परदेस संस्था” नामक एक संगठन की स्थापना की. उनके काम ने गाँव के आसपास के कई लोगों को प्रेरित किया, जो एक साथ मदद करने के लिए इकट्ठा हुए. एक 50 बाई 50 फीट के आश्रय में जो शुरू हुआ, वह अब 2.5 हेक्टेयर में फैले हरे-भरे फार्म में बदल गया है, जहां उनके फार्म में लगभग 2000 लोग काम करते हैं और एक समय में 450 जानवरों का इलाज किया जाता है. पीरा ने निर्माण और सुविधाओं के लिए अपने स्वयं के पैसे को उपयोग में लिया है, लेकिन उनके शुभचिंतकों ने भी दान और शारीरिक रूप में आश्रय के कामकाज के बारे में उनकी बहुत मदद की है.

पीरा ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए कहा, वह अपने आश्रय में जानवरों की जीवित रहने की दर पर गर्व करते है, जो की 45 प्रतिशत है, पशु अस्पतालों की तुलना में बहुत बेहतर है जिनकी दर 11 प्रतिशत से भी कम है. उनका मानना है कि उनके आश्रय और क्लीनिकों में जानवरों की देखभाल करने में अंतर होता है, ”सरकारी पशु चिकित्सा अस्पतालों में, लोग शिफ्ट में और वेतन के लिए काम करते हैं. हालांकि, हमारा काम भावनाओं से है, सीधे दिल से और चौबीसों घंटे है.

 

लेकिन सभी खुश नहीं थे उनके कार्यो से

हालाँकि पीरा यह सभी प्रयासों को एक नेक काम के लिए कर रहे है, लेकिन जानवरों की तस्करी और जानवरों का शिकार करने वाले उनके काम से खुश नहीं थे, क्योंकि वह उनके व्यवसाय में हस्तछेप कर रहे थे. इन शिकारियों द्वारा वन अधिकारियों को शिकायतें यह कहकर भेजी गई थीं कि वह अपने घर में सभी वन्यजीवों को कैद कर रहे थे और उनके साथ बुरा व्यवहार कर रहे थे. वह सभी अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने के इरादे से उनके घर पहुंचे, लेकिन वह जो काम कर रहे थे उसे देख कर हैरान रह गये.

 

अधिकारियों ने मुझे मेरे काम के लिये बधाई दी. मैंने उन्हें वन्यजीवों के संरक्षण के लिए बड़े संगठन के हिस्से के रूप में अपनी सदस्यता दिखाई और उन्होंने मेरी मदद करने का भी फैसला किया. पीरा ने द बेटर इंडिया को बताया, ”उन्होंने मुझे सरकारी सदस्यता हासिल करने में भी मदद की हैं”. वन विभाग ने यह भी सुनिश्चित किया कि संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित रूप से गश्त करने के लिए गार्ड की ड्यूटी लगायी जाये. उनके जीवन पर भी कुछ हमले हुए हैं, उनमें से कोई भी उन्हें सिर्फ़ डराने के लिए पर्याप्त धमकी नहीं दे रहा था. वह कहते है कि वह जानवरों की रक्षा करने में मर जाना पसंद करेंगे न की उन पर हो रहे नरसंहार/हमले को खड़े होकर देखना चाहेंगे. पीरा इन तस्करों और शिकारियों के खिलाफ पीछे हटने से इनकार करते है और अमृता देवी का जिक्र करते हुए कहते है कि वह पेड़ों और जानवरों की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों की आहूति देने वाली विरासत से है, जिसमें साल 1730 में अमृता देवी, उनकी तीनों बेटियां और 300 अन्य बिश्नोई लोगों के साथ सिर कलम किया गया था. जब वे खेजड़ी के पेड़ों से चिपके थे, तो उन्हें कटने से बचाने के लिए. वह इन जानवरों के जीवन को अपने जीवन से ज्यादा महत्व देते है और ठीक इसी तरह उनके एक साथी कर्मचारी, जिन्होंने हाल ही में कुछ राजपूतों से एक घायल हिरण को बचाने के लिए अपनी जान गँवा दी.

 

अपने पुण्य कार्य के लिए अब उनकी एक पहचान है

दी रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड नामक संस्था, ने हाल ही में अपने पुरस्कारों के आठवे संस्करण में पीरा को “अर्थ हीरोज” नामक पुरस्कार से सम्मानित किया. आरबीएस फाउंडेशन के प्रमुख एन सुनील कुमार का कहना है, कि पीरा ने न केवल इन जानवरों की मदद करने में अपना महत्वपूर्ण समय और संसाधन लगाए हैं, बल्कि इसके आसपास में एक समुदाय का निर्माण भी किया है. सुनील ने द बेटर इंडिया को बताया, “करुणा और संरक्षण दो अलग-अलग चीजें हैं, और पीरा रामजी का काम करुणा के साथ अपने कार्य को एक संस्था स्तर पर ले जाने का प्रयास है”. पीरा के अनुसार, उनके जैसे बहुत से लोग हैं जिनके पास एक बड़ा उद्देश है और इन जानवरों की मदद करने के लिए इच्छाशक्ति भी है लेकिन संसाधनों की बहुत कमी है.

तर्कसंगत जानवरों की बेहतरी और उनके कल्याण के लिए काम करने में उनके प्रयासों की सराहना करता है.

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...