सप्रेक

बिहार के संजीव कुमार पिछले 14 साल से छुआछूत को ख़त्म करने की कोशिश कर रहे हैं

तर्कसंगत

February 20, 2019

SHARES

एक देश जहाँ लोग स्वतंत्रता और खुली मानसिकता की बातें करते हैं वहीं देश के कई हिस्सों में जाति-वर्ण व्यवस्था और छुआछूत एक कड़वी सच्चाई है. 2019 में ये कल्पना करना मुश्किल है लेकिन छुआछूत हमें चकाचौंध करने वाली वास्तविकता है.

हम पढ़ते हैं कि छुआछूत एक गलत प्रथा है. हम बहस करते हैं, इसके बारे में लिखते हैं लेकिन हकीकत में कितने लोगों ने कोई भी बदलाव लाने के लिए कुछ भी किया है?

वर्ष 2005 में दिल्ली के संजीव कुमार ने MBA किया और मॉडलिंग में अपना करियर बना रहे थे. 24 साल का यह नौजवान अपने पांच भाई-बहनों में सबसे छोटा था. उसी साल अपनी बहन की सास के देहांत के बाद उनकी स्मृति में आयोजित एक सभा में भाग लेने के लिए उन्हें बिहार के खगड़िया जाना पड़ा. शायद वो यह नहीं जानते थे कि उनका बिहार दौरा हमेशा के लिए उनकी जिंदगी बदल देगा.

 

डोम जाति से मुलाकात

उस आयोजन में मेहमानों के लिए एक पारंपरिक खाने की व्यवस्था की गई थी. अच्छे भोजन की सभी ने खूब तारीफ की और हमेशा की तरह बहुत सारा खाना कूड़े में चला गया.

संजीव ने तर्कसंगत से बातचीत में बताया “मैं खाना खाने के बाद टहल रहा था. तभी एक अंधेरे कोने में मैंने कुछ लोगों को कूड़ादान खंगालते हुआ देखा, जो बचा हुआ खाना खा रहे थे. पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि उन लोगो को अछूत माना जाता है और उन्हें सभी लोगो के साथ बैठकर खाना खाने की मनाही है. यह सुनते ही मैं आश्चर्यचकित रह गया और तुरंत ही अपनी बहन और उनके ससुर से बात करने चला गया.”

उन्होंने मुझे बताया कि वे लोग डोम प्रजाति के अछूते लोग हैं. उन्हें समाज के साथ घुलने-मिलने की इजाजत नहीं है और मुझे भी उनके पास जाने के लिए मना किया गया. हालाँकि मैं अपने माता-पिता के साथ दिल्ली लौट आया था लेकिन उन लोगों का वो खाना खाने का दृश्य मुझे बार बार दिखाई देता था. मैं डरा हुआ रहता था. मैं जहां भी जाता था उनकी तस्वीर मेरे पीछे आती थी. यहाँ तक कि मैं रैंप पर नहीं चल पाया और तो और मैंने अपने आस-पास के हर व्यक्ति को नापसंद करना शुरू कर दिया था. शायद उस दिन तक मैं इस छुआछूत की हकीकत से अनजान था.”

संजीव वैसे तो अपने घर दिल्ली में थे लेकिन उनकी आत्मा बिहार के गांव में उन लोगों के साथ रह गयी थी जिन्होंने कभी आजादी का स्वाद नहीं चखा था.

“मैंने अपने माता-पिता से कहा कि मैं बिहार जाकर उनके लिए कुछ करना चाहता हूँ. मैं उनके अधिकारों के लिए लड़ना चाहता हूँ लेकिन यह खतरे से खाली न था. मेरे माता-पिता ने मुझे समझाया कि ये बात राजनीति की है. मुझे अपने माता-पिता को यह समझाने में एक साल लगा कि यहां रहना, महंगे होटलों में जाना, अच्छा खाना खाना मेरे लिए नामुमकिन सा हो चुका था. एक ही देश में मुझे ऐसा लगता था कि हम और वो अछूत दो अलग-अलग दुनिया में रह रहे हैं. आखिर वो कैसे और क्यों अलग थे? उन्होंने क्या किया था? उनकी क्या गलती थी ? मुझे इन सवालों के जवाब ढूंढने थे जिन्होंने मुझे एक साल तक परेशान किया था. मुझे उस डरावनी तस्वीर को मिटाना पड़ा जिसने मेरे होश उड़ा रखे थे.”उन्होंने बताया.

 

 

सफर की शुरुआत

2006 में, संजीव ने अपना घर छोड़ दिया. एक छोटे से बैग में कुछ कपड़े लेकर वह उस ट्रेन में बैठ गये जो बिहार जा रही थी. उन्होंने अपनी बहन के घर रहने का फैसला किया.

संजीव ने बताया “मुझे पता था कि मैं उन्हें असली वजह नहीं बता सकता कि मैं यहाँ क्यों आया था वे इसे कभी नहीं मानते. इसीलिये मैंने उनसे कहा कि मैं बस आपसे मिलने और घूमने आया हूँ जिसे सुनकर वे सभी काफी खुश थे लेकिन मेरे दिमाग में एक योजना थी.”

हर सुबह संजीव उस जगह जाते थे जहाँ डोम जाति के लोग रहते थे. उन्होंने उनकी जिंदगी के बारे में जानना शुरू किया. वे लोग एक बचे हुए हिस्से पर रहते थे कभी नहाये कभी नहीं और बाकी दुनिया से उनका कोई मतलब ना था. वो लोग केवल एक काम करते थे शौचालय की सफाई लेकिन अगर एक नल को भी हाथ लग गया तो लोग उसे धोते थे फिर इस्तेमाल करते थे. संजीव ने पिछले साल के खाने के उस दृश्य को याद किया जब उनकी बहन के ससुर ने इतने सारे लोगों के लिए खाने की व्यवस्था करी थी लाखों रुपये खर्च किये फिर भी इन लोगों को कचरे में खाना ढूंढना पड़ा था.

“हालांकि ऐसी छोटी जगह में बात जंगल की आग की तरह फैलती है. जैसे ही ग्रामीणों ने मुझे इन लोगों के साथ नहाते, पढ़ते और उनके साथ दिन बिताते हुए देखा उन्होंने मेरी बहन के परिवार से मेरी शिकायत की. मुझे चेतावनी दी लेकिन मैंने उन्हें अपने मिशन के बारे में बताया. मैंने कहा यहां जो हो रहा है वह गलत है. वो लोग भी हमारी-आपकी तरह इंसान हैं, वो भी मांस और खून से बने हैं, वे दुःख, भूख और हताशा वैसे ही महसूस करते हैं जैसे हम करते हैं. यह गलत है और मुझे ये लड़ाई जीतनी है.” संजीव ने बताया.

अंततः संजीव को घर से निकल दिया गया. असहाय संजीव एक दूसरे गाँव में अपने दादा के घर चला गया. हालंकि उसके दादा का देहांत हो चुका था लेकिन उनके पिता के भाई और उनका बेटा वहां रहते थे.

संजीव ने हमें बताया “वे मुझे अंदर ले गए, लेकिन ज्यादा समय के लिये नहीं. जैसे-जैसे मेरे बारे में बातें फ़ैल रही थी उन्होंने मुझे फ़साने के लिये एक योजना बनाई. एक दिन जब मैं घर गया तो लोगों को रोता हुआ देखा. मैंने फर्श पर एक लाश देखी जो मेरे चचेरे भाई की थी. ग्रामीणों ने मेरे चचेरे भाई को जहर खिला दिया था और इसका इल्जाम मुझ पर लगाने की योजना बनाई थी. उन्होंने मेरे चचेरे भाई को यह कहकर जहर खिलाया कि अगर वह इसे खायेगा तो ठीक हो जाएगा परन्तु वह मर गया.”

“हर कोई जानता था कि मैंने उसे नहीं मारा लेकिन मुझे गाँव से बाहर निकालने के लिये सबने मेरे खिलाफ बोला. एक समझदार खंड विकास अधिकारी ने मुझे उनके जाल से बाहर निकालने में मेरी मदद की जिसके बाद मैंने घर छोड़ दिया. मैंने एक अलग जगह किराये पर एक कमरा लिया जहाँ न तो बिजली थी ना बाथरूम था. मुझे खुले में नहाना पड़ता था लेकिन तब तक मैं डोम लोगों में से एक बन चुका था और हम सब एक परिवार के रूप में रहते थे.”

 

 

छुआछूत के खिलाफ लड़ाई

संजीव ने छुआछूत के खिलाफ लड़ने के लिए तथाकथित अछूत जातियों के लोग, चमार और मुसहर के साथ मिलकर ‘बहिष्कृत हितकारी संगठन’  नामक एक संगठन की शुरुआत की.

मुस्कुराते हुये संजीव ने बताया “मेरी दिनचर्या में 40 गाँवों में जाना, 16 किलोमीटर पैदल चलना, उन लोगों के साथ बातचीत करना और उन्हें सशक्त करना शामिल था. इसके चलते मैंने बहुत सारे दुश्मन भी बना लिये थे.”

संजीव ने इन जातियों के लोगों को मिलाकर अलग पंचायतें बनाई. उनमें से कुछ लोग सरपंच बने और कुछ लोगो ने बाकी काम संभाला. उन्हें सशक्त बनाने के लिए अनेके बैठकें और अभियान चलाये गये.

“अछूतों को गंगा जल तक छूने की इजाजत नहीं थी मैंने इस नियम को तोड़ने का फैसला किया. लगभग 400-500 लोग गाते बजाते हुये घोड़ों के साथ गंगा स्नान करने गये. पानी सभी के लिए है और इस पर हम सबका अधिकार है. गंगा जितनी उनकी है उतनी ही हमारी भी है. हमें देखते ही लोग पीछे हट गये, हमें किसी ने नहीं रोका. हम सब खुद को एक योद्धा की तरह देख रहे थे. वहां पहुंचकर महिलाओं ने अपने मटके में गंगा भरा और वो नियम टूट गया.” उन्होंने बताया.

तब से संजीव ने समूह का नेतृत्व किया. उन लोगों ने साफ-साफ कहा कि वे अब शौचालय साफ नहीं करेंगे, बचा हुआ खाना नहीं खाएंगे, देवताओं की पूजा करेंगे और गंगा में स्नान भी करेंगे. वे अब किसी भी प्रकार के भेदभाव को स्वीकार नहीं करेंगे.

“मुझे हर कदम पर धमकी दी जाती थी. मुझे गुंडों ने उठाया और लगभग मार ही डाला था. वहां के विधायकों ने मुझे जान से मारने की धमकी दी थी और कई मौकों पर मुझ पर हमला भी करवाया, विशेष कर जब हम लोगों के साथ हिंदू देवताओं की पूजा करने लगे थे. मुझे मारा गया और लगभग आधा मरा हुआ छोड़ दिया लेकिन हर बार मैं जीने में कामयाब रहा. शायद मैं जीने के लिए ही था या शायद मैं जल्द ही मर जाऊंगा लेकिन यह मायने नहीं रखता जब तक मैं जिन्दा हूं इन लोगों के लिए काम करूँगा.” संजीव ने आत्मनिर्भरता से कहा.

“पिछले कुछ सालों में हमें कई लोगों का समर्थन मिला है जिसने हमारी पैसे जुटाने में मदद की है. आमिर खान ने भी हमारा समर्थन किया है. भारत सरकार ने हमारे रहने के लिए जमीन और घरों की व्यवस्था की. उन लोगो के पास अब एक जीवन है. ऐसे लोग हैं जो उन्हें गले लगाते हैं, हाथ मिलाते हैं. सबसे अच्छी बात यह है कि उन्होंने अपने हक़ के लिए लड़ना सीख लिया है. बीते 14-15 सालों में इन गांवों में बहुत कुछ बदल गया है लेकिन अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है. पर बहुत लोग अभी भी उनसे नफरत करते हैं, उन्हें अछूत मानते हैं. वे मुझसे भी नफरत करते हैं क्योंकि मैं उनमें से ही एक हूं और एक दिन वे मुझे मारने में सफल हो भी सकते हैं. अगर मैं मर भी गया तो मुझे पता है कि वे अपने लिए लड़ेंगे क्योंकि मैंने एक क्रांति की शुरूआत कर दी है” संजीव ने बताया.

 

 

संजीव दिल्ली में अपने परिवार से भी जुड़े हुये हैं और वे कभी-कभी उनकी पैसों से मदद भी करते हैं लेकिन संजीव वापस जाने के लिए तैयार नहीं है. बिहार के गांवों और यहाँ के अद्भुत लोगों ने उसका दिल जीत लिया है.

मुझे इस बात का अफ़सोस नहीं है कि मैंने मॉडलिंग, अपना शहर, परिवार सब छोड़ दिया. दुनिया को बदलने का जुनून मेरे अंदर स्वाभाविक रूप से आया और मैंने अपने दिल सुनी. मैं यकीन मानता हूँ कि हम अंग्रेजो से मुक्त हैं लेकिन हम वास्तव में तब तक स्वतंत्र नहीं हैं जब तक हम एक समान नहीं हैं. हर कोई अपनी माँ के गर्भ से एक सा ही पैदा होता है लेकिन उनकी जातियाँ हम तय करते हैं. हमें किसी भी इंसान को इंसान के अलावा किसी और रूप में देखने का अधिकार नहीं है.

इन सब के बीच संजीव के माता-पिता ने उसे शादी के लिए भी राजी कर लिया. उन्हें लगा कि अब मैं दिल्ली वापस आ जाऊंगा लेकिन मैं इसके लिए तैयार नहीं था. जब मेरी पत्नी गर्भवती थी तब उसने मुझे छोड़ दिया। आज मेरा एक बेटा है लेकिन मैंने उसे आज तक नहीं देखा.” संजीव ने बताया.

संजीव हमें उम्मीद देते है कि एक दिन हम सब स्वतंत्र होंगे. हम सब एक साथ मिलकर करुणा और प्रेम के साथ रहेंगे. वह हमें लड़ने की इच्छा और खुद के लिए खड़े होने का दृढ़ संकल्प देते हैं. तर्कसंगत संजीव कुमार को उनके साहस और इच्छा शक्ति के लिए सलाम करता है.

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...