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एक पिता ने सरकारी स्कूल को गोद लिया और अब उनका बेटा अपनी सैलरी से स्कूल का ख़र्च उठाता है

तर्कसंगत

February 21, 2019

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हम सभी ने कई कहानियां सुनी होंगी जिसमें नायक अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए निकलता है. खुद की परवाह किये बिना वो सब से लड़ता है परन्तु यहाँ हमारे पास एक सच का नायक है. यह नायक एक साधारण सा कपड़ा पहनता है जिस पर लिखा है “No to Plastic” वह मोटरसाइकिल पर नहीं बल्कि अपनी पुरानी साइकिल पर चलता है जिससे वह पैसे बचाकर जरूरतमंदों की मदद कर सके. 41 साल का ये नायक एक सरकारी कर्मचारी है जिसने कई स्कूलों को गोद ले रखा है और उन्हें जरुरी सुविधायें देकर उनकी मदद करता है. उन्होंने कैंसर जागरूकता शिविरों की शुरुआत भी की है.

डुलगुडेम गाँव के निवासी मनीम श्रीधर रेड्डी ने तेलंगाना के मिर्यालगुडा में लगभग 15 साल पहले लोगों के लिए काम करना शुरू किया था. यह 2002 की बात है जब हैदराबाद में श्रीधर के घर आये कुछ मेहमानों ने उनका जीवन बदल दिया.

 

 

पिता की विरासत को आगे ले गये

1998 में एक माओवादी हमले में श्रीधर ने अपने पिता को खो दिया था. तर्कसंगत से उन्होंने बताया “यह हमला तब हुआ जब उनके पिता अपने एक दोस्त से मिलने गये थे जो तेलंगाना के यादगिरिगुट्टा में पुलिस इंस्पेक्टर थे. माओवादी ने पुलिस स्टेशन पर हमला किया और उनके पिता को सब इंस्पेक्टर समझकर गोली मार दी.”

श्रीधर को उनके पिता की जगह सरकारी नौकरी मिल गई और वो अपनी मां के साथ हैदराबाद चले गये. लगभग दो साल बाद कुछ सरकारी शिक्षक हैदराबाद में उनके घर आये और स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्हें एक सरकारी स्कूल का मुख्य अतिथि बनने के लिए आमंत्रित किया. इस आमंत्रण से श्रीधर आश्चर्यचकित थे. उन्हें बताया गया कि उन सरकारी स्कूलों को उनके दिवंगत पिता ने गोद लिया था और स्कूल की जरूरतों को पूरा करते थे. श्रीधर स्कूल जाने के लिए तैयार हो गए लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि उनकी जिंदगी बदलने वाली थी.

जब वह स्कूल पहुंचे तो यह देख कर दंग रह गये कि उनके परिवार की जानकारी के बिना उनके पिता इतने सारे बच्चों की देखभाल कैसे कर रहे थे? “मैं यह देखकर शब्दरहित रह गया कि मेरे पिता की तरह एक सामान्य व्यक्ति ने इतने छोटे बच्चों के लिए इतना कुछ किया और कभी भी इसके लिये घमंड नहीं किया. बस उस दिन मैंने अपने पिता की विरासत को आगे ले जाने का फैसला किया.”

उन्होंने आगे बताया ”हालांकि मेरे पिता स्कूल को पैसे दे रहे थे फिर भी स्कूल में कई चीजों की कमी थी. छात्रों के लिये कुर्सियाँ और मेज नहीं थीं. बच्चे पुरानी धूल भरी कक्षाओं में पढ़ रहे थे यहाँ तक कि स्कूल में शौचालय भी नहीं था. उस समय मेरे पास करीब 90,000 रुपये थे जिसे मैंने स्कूल को दान दे दिये.”

 

 

सरकारी कर्मचारी से समाज-सेवी

जल्द ही श्रीधर ने स्कूल की पूरी जिम्मेदारी ले ली. वह हर शनिवार और रविवार को वह हैदराबाद से यह देखने जाते हैं कि बच्चों को सभी सुविधायें मिल रही हैं या नहीं. हकीकत में तो यह श्रीधर की एक सरकारी कर्मचारी से समाज-सेवी बनने की शुरुआत थी. उन्होंने बताया कि कई अन्य स्कूलों के प्रधानाध्यपक ने अपने स्कूल की ख़राब हालत के विषय में उनसे संपर्क किया जिससे श्रीधर को समझ आया कि उनके जिले में अधिकतर सरकारी स्कूल दयनीय स्थिति में हैं.

“तकनीकी रूप से तो इन स्कूलों को सरकार सारी सुविधायें देती है फिर भी कुछ जरूरतें कम रह जाती हैं. उदाहरण के लिए, सरकार केवल बच्चों को किताबें देती है लेकिन अगर कोई बच्चा ड्राइंग या पेंटिंग या किसी खेल में रुचि रखता है तो उसे कोई विकल्प नहीं है. यही कारण है कि मैंने उन्हें किताबें, पेंटिंग का सामान, सामान्य ज्ञान की किताबें और अन्य खेल का सामान देने का फैसला किया ताकि उन्हें एक स्वस्थ विकास मिले और वो अपने लिये एक अच्छा करियर भी चुन सके.

अब तक श्रीधर दो स्कूलों को गोद ले चुके हैं. जल्द ही इस जिम्मेदारी उनकी जेब को खाली कर दिया और वह समझ गए कि वह अकेले इसे आगे नहीं बढ़ा सकते और उन्होंने अपने दोस्तों से मदद माँगने का फैसला किया.

 

 

इंटरनेट की शक्ति

“कॉलेज के खत्म होने के बाद मेरे कई दोस्त बेहतर नौकरी की तलाश में अलग-अलग शहरों में चले गये और कुछ दोस्त विदेश चले गये. उन तक पहुंचने के लिए मैंने इंटरनेट का सहारा लिया और इससे बहुत मदद भी हुई. इसीलिये मैंने इंटरनेट का पूरा इस्तेमाल करने का फैसला किया” श्रीधर ने बताया.

2007 में, श्रीधर ने Manna Miryalaguda नाम से एक फेसबुक पेज बनाया जिसका अर्थ है “हमारा शहर मिर्यालगुड़ा” पूछने पर बताया कि यह नाम सभी लोगों को एकजुट करेगा और उनके गांव को एक नई पहचान देगा.

उन्होंने बताया कि उनके पेज को जिस तरह की प्रतिक्रिया मिली उसे देखकर वह बहुत खुश थे. उनका कहना है कि अब उनके फेसबुक पेज पर 23,000 से ज्यादा लोग जुड़े हुये हैं. मेरे दोस्त और मेरे रिश्तेदार ही नहीं बल्कि कई ऐसे लोग भी जुड़े हैं जो मुझे जानते भी नहीं हैं लेकिन दूसरों की मदद करना जरुरी समझते हैं.

अब तक श्रीधर ने अपने फेसबुक पेज के सहारे ही लगभग 34 स्कूलों को गोद लिया है. श्रीधर बताते हैं “अब गाँव के कई लोग मेरे साथ इस मिशन में जुड़ना चाहते हैं.”

 

प्रयास-जो दिखाई देता है

एक स्कूल के दौरे पर,हमने महसूस किया कि सरकारी स्कूल खुले इलाकों में हैं फिर भी बच्चों के लिए कोई खेल का मैदान नहीं है. इन बच्चों को एक खेल का मैदान दिलाने के लिए श्रीधर और उनके दोस्तों ने स्कूल के पास झाड़ियों को साफ करने और इसे खेल के मैदान में बदलने का फैसला किया.

“मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ मुकुंदपुरम के सरकारी स्कूल में गया, जो मिरियालगुडा से लगभग 20 किमी दूर है. हमने वहां झाड़ियों को साफ किया जिसमे हमें तीन दिन लग गये. इसके बाद बच्चों ने अपनी छोटी कक्षाओं में रहने के बजाय मैदान में खेलना शुरू कर दिया” उन्होंने बताया.

उत्साहित श्रीधर ने आगे बताया “मुकुंदपुरम के सरकारी स्कूल के दो बच्चे उमा और शिल्पा बहुत अच्छे वॉलीबॉल खिलाड़ी हैं और अपनी प्रतिभा के दम पर आगे की पढ़ाई के लिये छात्रवृत्ति भी प्राप्त की है. यह सिर्फ हमारा प्रयास नहीं अपितु बच्चों का भी प्रयास था. तेलंगाना कल्चरल एसोसिएशन ऑफ़ पोर्टलैंड ने भी हमारी बहुत मदद की. अब यहाँ के बच्चों का भविष्य बेहतर होगा.”

श्रीधर, जो एक पर्यावरणविद् भी हैं, ने लोगों से अपने वाहनों के स्थान पर सार्वजनिक वाहनों का उपयोग करने का आग्रह किया है. श्रीधर अपनी साइकिल से चलते हैं और अपने कार्यालय तक पहुँचने के लिए हर-रोज 15 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं. उनका मानना है कि इससे वे करीब 5,000 रुपये प्रति माह बचाते हैं जो स्कूल के लिये खर्च करते हैं.

 

 

तेलंगाना के स्कूलों का नीचला स्तर

श्रीधर ने बताया कि ज्यादातर स्कूलों में शौचालय नहीं हैं और यही वजह है कि स्कूलों में लड़कियों का संख्या ज्यादा नहीं है. लड़के खुले में जा सकते हैं लेकिन लड़कियां ऐसा नहीं कर सकती हैं इसीलिये तीसरी कक्षा के बाद ज्यादातर स्कूलों में लड़कियों नहीं है”

 

 

उन्होंने दावे के साथ कहा कि कई बार उन्होंने राज्य शिक्षा बोर्ड को पत्र लिखा है। स्कूल के हेडमास्टर ने भी सरकार से शिकायत की है फिर भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ. जिन स्कूल में शौचालय हैं वे गंदे और बंद हैं. मोदी सरकार का स्वच्छ भारत मिशन क्या कर रहा है उन्हें नहीं पता? उन्होंने और उनकी टीमों ने कई स्कूलों में शौचालय बनवाये और उनकी साफ़ सफाई का ध्यान भी रखते हैं.

 

पछतावा

श्रीधर और उनकी टीम ने स्वास्थ्य शिविर भी शुरू किये हैं. उन्होंने हमें बताया कि नालागोंडा जिले की एनआरआई एसोसिएशन ने उन्हें अपने गांव में कैंसर शिविर शुरू करने के लिए कहा था. हमने एक शिविर लगाया गया और हैदराबाद में इंडो-अमेरिकन कैंसर अस्पताल के डॉक्टरों ने शिविर का निरीक्षण किया. उनका कहना है कि शिविर में लगभग 700 लोग शामिल हुए थे. दुर्भाग्य से लगभग 24 लोगों में उनके कैंसर के बारे में पता चला.

श्रीधर ने बताया कि जैसे ही उन्हें कैंसर का पता चला उन्होंने अपना इलाज करवाना शुरू कर दिया सौभाग्य से 18 लोग जो कैंसर के पहले चरण में थे अब खतरे से बाहर हैं.

श्रीधर अब तेलंगाना में मेकड जिले में काम करते हैं. उन्होंने बताया कि मैंने अपनी सारी छुट्टियां खत्म कर दी है क्यूंकि मुझे कई स्कूलों जाना पड़ता है. उन्होंने खुद दो छात्रों की पढ़ाई का जिम्मा ले रखा है. यह दो बच्चे कौशिक और शंकर गरीब परन्तु बहुत प्रतिभाशाली हैं. वह बताते है कि ”मैंने स्कूल के शिक्षकों से उनके बारे में सुना और उनकी पढ़ाई का ध्यान रखने का फैसला किया. अपने वेतन का 30% हर महीने इन कई स्कूलों में बच्चों के लिए खर्च करते है.”

हालाँकि सभी कामों में बाद भी उन्हें बस एक ही पछतावा है कि वे इतने स्कूलों में जाते हैं जिससे अपने परिवार को समय नहीं दे पाते हैं. “मुझे इसके लिये बुरा लगता है. लेकिन मैंने अपनी पत्नी और अपने बच्चों को समझाया कि ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें हमारी ज़रूरत है और हमें उनकी मदद करनी चाहिए. मुझे लगता है कि वे मुझे समझते हैं यही वजह है कि वे कभी-कभार मेरे साथ स्कूल भी जाते हैं.”

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