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इस एनजीओ के कारण, दिल्ली की पहली ‘पैड यात्रा’ में लगभग 8000 स्कूली लड़कियाँ ने भाग लिया

तर्कसंगत

February 21, 2019

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“अचार को मत छुओ” या “मंदिर में प्रवेश मत करो ..” ये कुछ ऐसी बातें  हैं जो भारत में बहुत कम उम्र से ही महिलाओं और युवा लड़कियों को सुनने मिलती है .जबकि सभी पीरियड-शेमिंग या इसके साथ आने वाले कलंक के शिकार नहीं होते हैं, लेकिन ग्रामीण या शहरी दोनों वातावरण में ज्यादातर लड़कियां मासिक धर्म के साथ जुड़े हुए सामाजिक निषेध का सामना करती है.



एनजीओ ने पीरियड फेस्ट का आयोजन किया

 जहाँ देश भर में व्यक्तियों और संगठनों ने युवा महिलाओं और लड़कियों को शिक्षित करने और पीरियड्स पर बातचीत शुरू करने के लिए कड़ी मेहनत की है, 5 फरवरी को राष्ट्रीय राजधानी में एक अभूतपूर्व दृश्य देखा गया. हज़ारों स्कूली छात्र, ज्यादातर लड़कियां, रंगीन प्लेकार्ड्स के साथ दिल्ली के कनॉट प्लेस  की ओर मार्च की, सभी का हेतु पीरियड्स के साथ जुड़े सामाजिक निषेध को ख़त्म करना था .

यह दिल्ली के सच्ची सहेली नामक एक एनजीओ की पहल थी, जिसने मासिक धर्म स्वच्छता दिवस फेस्ट और ‘पेड’ यात्रा का आयोजन किया था. संगठन की स्थापना चार साल पहले डॉ. सुरभि सिंह द्वारा की गई थी, जो एक स्त्री रोग विशेषज्ञ और संगठन की अध्यक्षा हैं. तर्कसंगत से बात करते हुए, डॉ. सिंह ने कहा, “मेरी मेडिसिन प्रेक्टिस के दौरान मैंने महसूस किया कि विभिन्न स्तर की विभिन्न स्त्रियों को मासिक धर्म की बहुत ही कम समझ है.”

उन्होंने महसूस किया कि महिलाओं को इस विषय पर शिक्षित करने की आवश्यकता है और इसलिए उन्होंने उस शिक्षा को देश की युवा पीढ़ी को प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित किया है. उन्होने कहा, “मैंने स्कूलों में जाना शुरू कर दिया क्योंकि मैंने सोचा था कि अगर मैं बड़ी उम्र की महिलाओं की मानसिकता को नहीं बदल सकती, तो कम से कम मैं छोटी लड़कियों के दिमाग को ढाल सकती हूं.” युवा लड़कियों के दिमाग को शिक्षित करने के लिए एक स्कूल से दूसरे स्कूल में गयी. इस प्रक्रिया में, उन्हें यह समझ आया कि युवा लड़कियों को भी उनके बुजुर्गों के समान वाली सोच ने घेर रखा था, और यह सोच केवल समाज के एक निश्चित वर्ग तक ही सीमित नहीं है.

 

 

इसलिए, उनके लिए, सही और उपयोगी जानकारी से लड़कियों को अवगत कराना  एक महत्वपूर्ण कार्य था क्योंकि उन्होने सोचा था कि यही इस अज्ञानता के सोच को तोड़ सकता है. उन्होंने कहा, “ज्यादातर लड़कियां मासिक धर्म के बारे में चर्चा को कम से कम समय तक जारी रखती हैं और वे इसके जैविक पहलुओं को नहीं समझती हैं.” जबकि संगठन दिल्ली और उत्तरी भारत के अन्य हिस्सों में काम कर रहा है, सखी सहेली ने और भी बड़ा प्रभाव डालने का फैसला किया. उसने कहा, “हमने फरवरी चुनने का फैसला किया क्योंकि इसमें 28 दिन है और यह बिल्कुल हमारे मासिक धर्म चक्र को जोड़ता है और हमने 5 तारीख को तारीख तय की है क्योंकि एक महिला की अवधि औसतन लगभग पांच दिनों तक रहती है.”



पैडयात्रा पूरे जोरों पर

उस मंगलवार की सुबह को एक अद्भुत नज़ारा था. लगभग 7000-8000 स्कूली छात्र, ज्यादातर लड़कियां दिल्ली के कनॉट प्लेस में पैड के आकार के प्लेकार्ड जिस पर मासिक धर्म में स्त्रियों को शशक्त बनाने वाले नारे लिखे हुए थे हाथों में लेकर परेड करती हैं. संभवतः पहली बार, जो एक बार बंद दरवाजों के पीछे और धीमे से बात कर रहा था ने हजारों युवाओं की भागीदारी देखी, जिन्होंने पीरियड्स या और कोई भी बंधन से बंधने को इनकार कर दिया.
बिना कोई संकोच या शर्म, जो “महीने के उस  समय” का संकेत है, 65 से अधिक सरकारी और निजी स्कूलों की युवा लड़कियों ने परेड में भाग लिया, जिसमें दिल्ली के शिक्षण मंत्री मनीष सिसोदिया ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया. उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स से कहा, “मैं आप सभी से आग्रह करता हूं कि  मासिक धर्म के साथ जुडी शर्मिंदगी और आसपास की खामोशी को खत्म करने के ब्रांड एम्बेसडर बने.”

 

 

इस उत्सव में सभी प्रकार के गीत, नृत्य, नाटक और उत्सव शामिल थे, जो सभी को मासिक धर्म के विषय को सामने लाने के केंद्रीय विषय पर विचार करते हैं. संगठन ने एक “पैड ज़ोन” भी स्थापित किया, जिसमें लड़कियों को मासिक धर्म के समय को मैनेज करने के तरीका सिखाये गये. सिंह ने कहा, “कपड़े के पैड से लेकर सामान्य पैड और यहां तक ​​कि टैम्पोन तक सब कुछ उपलब्ध था जो लड़कियों को अपने निर्णय लेने में मदद करता है.” और भी जागरूकता फैलाने के लिए, लड़कियों ने स्किट में भाग लिया और साथ ही पेंट भी किया.

संगठन, जिसे दिल्ली के अधिकारियों से समर्थन मिला है, अब दूसरों के जीवन को भी प्रभावित करना चाहता है. तर्कसंगत इस तरह के अदभुत कदम उठाने के लिए संगठन की सराहना करता है.

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