मेरी कहानी

मेरी कहानी: अगर पड़ोसी मेरे घर घुस कर मेरे युवाओं को कट्टरपंथी बना सकता है और मैं कुछ नहीं करता तो शायद गलती मेरी ही है.

तर्कसंगत

Image Credits: jagran/MajDPSingh/facebook

February 22, 2019

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मेजर देवेंद्र पाल सिंह कारगिल युद्ध के वेटरन हैं. पुलवामा हमला जिसमें सीआरपीएफ के 44 से अधिक जवान शहीद हुए थे. उसके बाद एक समाचार चैनल पर चर्चा पैनल का हिस्सा बनने के लिए उन्हें हाल ही में आमंत्रित किया गया था. इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. कई लोगों ने “बदला” के लिए पाकिस्तान पर चढ़ाई कर देने की कवायद करने लगे, यह बिना समझे कि युद्ध शुरू करना आसान है, क्योंकि वे लड़ाई के परिणामों को न झेल सकते हैं न महसूस कर सकते हैं. मेजर डीपी सिंह ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा था, “एक सैनिक, तिरंगा, देश और इसकी इज्जत की खातिर मुस्कुराते हुए अपना जीवन जीने के लिए तैयार है. लेकिन सवाल यह है कि कब तक? ”

हम आपके साथ खड़े हैं, हम शहीदों और उनके परिवारों द्वारा खड़े हैं. हमें इस हमले का बदला लेना चाहिए.

और कुछ दिनों के बाद सब कुछ सामान्य हो जायेगा. वास्तव में यह सब हल्ला गुल्ला भी एक बिज़नेस है. राजनीतिक पार्टी हो, मीडिया हाउस हो या आम जनता हो. जीवन और अपने हाथ पाँव को खोने का दर्द कोई नहीं जनता. एक सैनिक को तिरंगा, देश और उसकी इज्जत की खातिर मुस्कुराते हुए अपनी जान देने के लिए तैयार किया जाता है. लेकिन सवाल यह है कि कब तक? सवाल यह है कि क्या हम कुछ प्रयास कर रहे हैं जिससे इस पूरे सिस्टम में सुधार आये?

आज सुबह मैं ज़ी न्यूज़ पर था और सिपाही के प्रति जो उनका सम्मान है, वह मैंने देख लिया.

 

ज़ी टीवी की बहस पर मैंने बयानबाजी पर तर्क का इस्तेमाल करने की कोशिश की. टीवी एंकर सुश्री अदिति त्यागी ने टिप्पणी की, “शायद आपने पुलवामा की तस्वीरें नहीं देखी हैं, इसलिए आप इस बात से सहमत नहीं हैं कि केवल बदला ही समाधान है. मैं इन चीजों से ऊपर उठ चुका हूं और मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं थी कि एक महिला जो ये चिल्ला रही है कि  “हम आपके साथ हैं”  उसे ये तक नहीं पता कि मैं एक युद्ध (करगिल) का घायल हूँ जो कुछ साल पहले ही हुआ था. उस बात के लिए जब उसने मेरा परिचय कराया, तो वह ये भी नहीं जानती थी कि मैं एक मेजर रैंक का ऑफिसर हूँ.

जवाब में मैंने उससे कहा, ‘एक सिपाही अभी भी तिरंगा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार है, लेकिन इसके साथ ही हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि कश्मीरी के युवाओं को लांस नायक नजीर वानी,  जैसा बनाया जाये न कि वक़ास जैसे जिहादी आतंकवादी. हमारी कोशिश इस तरफ भी होनी चाहिए. यदि मेरा पड़ोसी मेरे घर में घुस कर मेरे युवाओं को कट्टरपंथी बना सकता है और मैं उनकी रक्षा करने में असमर्थ हूँ , तो शायद गलती मेरी ही है.’

40 परिवारों बर्बाद हुए है और अगर हमने कोई समाधान नहीं खोजे तो आगे और भी होंगे. इससे पहले कि आप बदला लें, कृपया उन परिवारों, माता-पिता, पत्नियों और बच्चों से पूछें कि क्या वे अपने घरवाले  के बिना एक ज़िन्दगी जीने को तैयार हैं? जब तक अगली पीढ़ी सकारात्मक रूप से प्रेरित नहीं होती है तब तक हमें कोई बदलाव नहीं दिखता है और यह एक चक्र बन कर रह जायेगा ‘आक्रमण’ फिर हमारा बदला फिर उनका आक्रमण और फिर हमारा बदला. 

उस टीवी एंकर को यह बात समझाने में मुझे थोड़ी मेहनत लगी और जब दूसरे मेरे बात से राज़ी होने लगे फिर वह भी मान गयी. टीवी एंकर, विशेष रूप से कोशिश करते हैं कि आप उनकी ही भाषा बोलें और उनसे राज़ी हों. कुछ लोग केवल टीवी पर आने के लिए उनके सुर में सुर मिलाते हैं. कोई भी कल्पना नहीं कर सकता कि जीवन या अंग को खोना किसे कहते हैं? और फिर न्याय और बकाया पाने के लिए अदालत के दरवाजे खटखटाते रहिये.

हम चाहते हैं कि सैनिक मर जाए लेकिन उसकी विधवाओं को पेंशन और सही बकाया राशि प्राप्त करने के लिए अदालत के चक्कर लगाने पड़ते हैं (कुछ को यह साबित करने की जरूरत होती है कि उसका पति शहीद है बॉडी भी नहीं मिली थी मगर उसी वक़्त उनसे पेंशन के लिए बॉडी लाने को कहा जाता है). हम चाहते हैं कि सैनिक मर जाएं लेकिन घायल लोगों को सही पेंशन पाने के लिए अदालत जाने की जरूरत पड़ती है (यहां तक ​​कि मैंने एएफटी में सात साल तक लड़ाई लड़ी थी ताकि साबित हो सके कि मैं एक युद्ध में हताहत हूँ और अपनी सही पेंशन पा सकूँ). (सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और अनावश्यक मामलों को वापस लेने के निर्देशों के बावजूद, MoD सबसे बड़ा रोड़ा है)

माननीय सांसद मेजर नवदीप सिंह और श्री राजीव चंद्रशेखर के साथ आरएम (रक्षा मंत्री) मैडम के साथ मेरी आखिरी मुलाकात में, उन्होंने जनवरी के अंत तक विकलांग सैनिकों के खिलाफ अनावश्यक अपीलों को वापस लेने का वादा किया था  … जनवरी समाप्त हो गया और उनके वादे भी और मामले अभी भी चल रहे हैं.

हम चाहते हैं कि सैनिक मर जाए लेकिन उसके बच्चों के शिक्षा भत्ते को वापस ले लिया जाएगा क्योंकि यह सरकारी खजाने पर भारी है (कुल 3000 से अधिक ऐसे मामले हैं और 3 करोड़ प्रति वर्ष का खर्च है) इसे वापस लेने के फैसले को रुकवाने में काफी मशक्कत लगी और इसे विधवाओं पर रक्षा मंत्री द्वारा एक एहसान माना जाता है. विडंबना यह है कि वह भी एक महिला है लेकिन पहली बार में विधवा के दर्द को समझ नहीं पाई.

हम सभी हाल ही के एचएएल मामले को जानते हैं. हम चाहते हैं कि सैनिक मर जाए लेकिन जब वह अपने दोस्तों को बचाने की बात करता है तो हम उसे दोषी ठहराते हैं और उसके खिलाफ मामला दर्ज करते हैं क्योंकि उसने पत्थरबाज को जीप से बांध दिया. लिस्ट काफी लम्बी है. जीवन का मजाक मत बनाइए और और न ही सैनिकों को मारिये. अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए भावनाओं का उपयोग न करें. भारतीय सेना और सीएपीएफ को पता है कि क्या करना है और कब करना है. उन्होनें पहले भी किया है और वे उचित कार्रवाई के साथ स्थिति के साथ इन्साफ करते रहेंगे. आपको हमें यह बताने की जरूरत नहीं है कि हमें क्या करना है. लेकिन आखिरकार उन सभी को बोलने की आज़ादी है. और परवाह किसे है …. आखिर सैनिक आसानी से अपनी जान दांव पर लगाने को तैयार जो है.

जय हिन्द

 

कहानी: मेजर डी. पी. सिंह

 

 

 

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