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अपनी विधवा माँ के संघर्ष को देखकर, ये अब विधवाओं को सशक्त बना रहे हैं

तर्कसंगत

February 22, 2019

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अपनी कक्षा के अन्य बच्चो के विपरीत, छोटा अमित खुद को असहज पता था जब भी कक्षा में आने वाला नया शिक्षक बच्चों से उनके पिता का नाम और व्यवसाय के बारे में पूछते थे. अपने पिता जी को मात्र 3 वर्ष की लघु आयु में खो देने के बादअमित जैन अपने आस पास भारतीय समाज में विधवाओं की मुश्किलों को देखते हुए बड़े हुए.

आज अपनी 27 वर्ष की आयु में,अमित जैन ने  विधवाओं और पितृविहीन बच्चों के जीवन को हमेशा के लिए बदल देने के लिए संकल्प लिया है. अपनी मां के सहयोग के कारण और उनसे प्रभावित होकर, उन्होनें एक संस्थान की नींव रखीमिट्टी के रंग. यह संस्थान विश्व के कई देशों में काम कर रहा है और और कई विधवाओं, अकेली महिलाओं और उनके बच्चों के जीवन को पुनर्गठन करने में सहयोग कर रहा है. तर्कसंगत के साथ एक विशेष साक्षात्कार में, अमित जैन अपनी यात्रा को साझा करते हैं कि कैसे उन्होंने अपने इंजीनियरिंग के सपने को छोड़ कर कई असहाय महिलाओं के लिए रोजगार ढूंढने और सुनिश्चित करने में लगा दिए

 

पिता के क़र्ज़ का बोझ

महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव भुसावल से आने वाले अमित जैन, उनके साथ खेलने और और उनके साथ साझा की हुई मासूम हंसी के अलावा कुछ और बमुश्किल ही याद कर पाते हैं. 1994 में जब अमित के पिता का स्वर्गवास हुआ, तो अमित के दादाजी ने उनके परिवार की आजीविका को चलाने के लिए उसकी मां को एक छोटी सिलाई की दुकान खुलवा दी

जल्द ही हम लोगों पता चला कि पिताजी हमारे लिए उधार का एक बड़ा बोझ छोड़ गए हैं. मेरे चाचा लोगमेरे और मेरे बड़े भाई की पढ़ाई, किताबो, कपड़ों और अन्य खर्चों को उठाते थे. जब कभी मैं अपनी मां को किसी बहुमूल्य वस्तु को इधरउधर छुपाते हुए देखता था तो तो बड़ा असहज होता था. उनको डर होता था कि अचानक किसी दिन कोई बैंक का अधिकारी हमारे दरवाजे पर धमकेगा और किसी तरह से बचे हुए उस सामान को भी ले जाएगा.” अमित अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं

 

 

मैंने महसूस किया कि मेरी मां को काफी कम इज्जत दी जाती थी और पारिवारिक आयोजनों से उन्हें दूर रखा जाता था, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह एक विधवा थी. यहां कि कुछ साल पहले तक मेरे बड़े भाई की शादी में, कई रस्मोरिवाज में मेरी मां का शामिल होना मना था. उनको अपने हाथों पर मेहंदी लगाने की भी मनाही थी.” अमित बताते हैं. “मेरे काफ़ी विरोध और हस्तक्षेप के बाद परिवार के अन्य सदस्यों ने इन मूर्खतापूर्ण रिवाजों को तिलांजलि दी.”

अपने मां के संघर्ष को देखकर, जिसे कभी जाहिर नहीं किया और और पैसे की कमी को देखते हुए उन्होंने अपने इंजीनियरिंग के सपने को त्याग दिया. अपनी वित्तीय परेशानियों के बावजूद, उन्हें अपने कॉमर्स ग्रेजुएशन के बाद एक अच्छी नौकरी मिली. “मेरे पुणे में सेटल होने के बाद, मैंने मां को भी अपने साथ बुला लिया ताकि उनको बेजार लोगों और समाज के साथ नहीं रहना पड़े.”

 

संस्थान एक दिन में शुरू नहीं हुआ

“2014 में जब हम लोग पुणे में एक अच्छी जिंदगी गुजर बसर कर रहे थे तब मेरी मां मुझसे लगातार समाज के लिए मुख्यत विधवाओं के लिए कुछ करने को मुझे प्रोत्साहित करती रहती थी. मुझे पता लगा कि भारत में लगभग 42 लाख विधवाएं हैं जो अपना जीवन बहिष्कृत और यातनाओं में बिताने के लिए मजबूर है.” अमित बताते हैं.

अमित को सामाजिक क्षेत्र में काम करने का कोई पूर्व अनुभव नहीं था ऐसे में इतने संवेदनशील मामले को सीधे हाथों में लेने की बजाय अमित ने पहले जमीनी स्तर पर अनुभव लेना बेहतर समझा. “मुझे याद है कि कैसे बचपन में हमारी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए, हमारे रिश्तेदार पैसे दिया करते थे. मैं असमंजस में था कि कैसे मैं इन वंचित लोगों की पैसे से मदद कर सकता था. ऐसी भी मैंने इच्छुक दानी लोग और NGOs जो वंचित बच्चों और उनके परिवारों की मदद के लिए तत्पर थे, के लिए मध्यस्थ बनने का विचार सुनिश्चित किया.” अमित बताते है. अमित ने फेसबुक, ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी इस पहल को काफी प्रचारित किया, वह सप्ताहांत पर कई शहरों में जाते थे और वहां से गरीब बच्चों के लिए कपड़े, किताब और अन्य जरूरी सामान इच्छुक दानी लोगों को उनके संपर्क में आते थे, से एकत्रित किया करते थे और उन्हें इस क्षेत्र में काम कर रही गैर सरकारी संस्थानों में आगे मदद के लिए बांट दिया करते थे.

 

 

मात्र 1.5 साल में ही उनका यह अभियान जंगल में आग की तरह फैला और लगभग 100 से ज्यादा तत्पर स्वयंसेवक उनके साथ इस अभियान में शामिल हुए. इसके बाद उन्होंने लैंगिक समानता पर भी काम करना शुरू किया जो उनका काफी समय से ध्येय था. ऐसे मिट्टी के रंग ने पुणे में पहली बार रोशनी को देखा.

कामनवेल्थ युवा परिषद में अमित का आवेदन 2017 में स्वीकार कर लिया गया. वे मलेशिया में हुई लगभग 40 देशों से ज्यादा आए हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं की वार्षिक बैठक में शामिल हुए. लैंगिक समानता और विधवा महिलाओं के पुनरुत्थान पर उनके विचार से कई लोग प्रभावित हुए, जिन्होंने आगे चलकर अपने अपने देशों में समान अभियान का मॉडल निरूपित किया

 

 

आज मिट्टी के रंग केंद्रों की उपस्थिति पाकिस्तान, गांबिया, जांबिया, नेपाल, केन्या, फ्रांस, स्पेन, फ़िजी आदि देशों में है जबकि मुख्य केंद्र पुणे और हडपसर में कार्यरत है. इस साल के अंत तक मुंबई, गुड़गांव और गाजियाबाद में भी केंद्र शुरू होने की तैयारी है. हम अब वंचित विधवाओं और उनके बच्चों का जीवन बदलने के लिए पूरे विश्व में कार्यरत है.” अमित गर्व से बताते हुए कहते हैं.

 

 

‘मिट्टी के रंग’ की वर्तमान परियोजना

पुणे में अमित, अभी लगभग 21 विधवाओं के साथ कार्य कर रहे हैं. उनके लिए रंगोली बनाना, कागज़ और कपड़े के बैग बनाना, आने वाली गणपति महोत्सव के लिए मूर्तियां बनाना, दिवाली के लिए हस्त निर्मित उपहार आदि कौशल निर्माण हेतु कार्यशाला आयोजित करना. “वह काफी गर्व का क्षण था जब एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी ने विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम में रंगोली बनाने के लिए इन महिलाओं को नियमित कार्य के लिए चुना.” अमित उत्साह से बताते हुए कहते हैं

 

 

इस परियोजना का अन्य भाग विधवा महिलाओं को उनके अधिकारों और मिलने वाले शासकीय लाभों से जागरूक करना था. हम उन्हें बैंक और अन्य शासकीय संस्थानों से सुविधा लेने हेतु जरूरी कागजात तैयार करने में सलाह और मदद दिया करते हैं. “हमारे यहां कभी कभी सांस्कृतिक आदानप्रदान के लिए विदेशी समकक्ष भी आया करते हैं, वे इन महिलाओं की पढ़ने लिखने में मदद करते हैं.” अमित जोड़ते हुए कहते हैं

 

 

ऐसे बच्चों के लिए जिन्होंने अपने पिता को अल्पायु में ही खो दिया है, मिट्टी के रंग ने सामुदायिक केंद्रों के साथ पुस्तकालय की स्थापना की है. हर शाम, 6 से 16 वर्ष की आयु के 30 बच्चे एकत्रित होते हैं, जिन्हें पढ़ना सिखाया जाता है. हाल ही में इस पढ़ना सिखाने की अभियान में गरीब तबके के बुजुर्गों और अनपढ़ विधवा महिलाओं को शामिल किया गया है.

 

 

मिट्टी के रंग एक स्वयं वित्त पोषित इकाई है

भारत में मिट्टी के रंग का संपूर्ण वित्तीय भार अमित द्वारा वहन किया जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि वह अपना ध्यान मुख्यत: इस परियोजना में लगाना चाहते हैं ना कि केवल वित्त इकट्ठा करने में. “अपनी इस यात्रा में मैंने पाया, उपेक्षित लोग सबसे ज्यादा मदद और वित्तीय योगदान देते हैं जिन पर हम ध्यान देना भूल जाते हैं.” अमित अपनी इस यात्रा के दौरान हुई कई दिल छूने वाली यादों को बताते हुए कहते हैं.

इंदौर में एक ऐसे ही कलेक्शन अभियान के दौरान मैं एक ऑटो ड्राइवर से मिला जिसे मैंने अपनी नई टीशर्ट उपहार में दी. मोबाइल नंबरों के आदानप्रदान के दौरान मैंने उसे अपने इस अभियान के बारे में बताएं बताया. मैं आश्चर्यचकित था कि संग्रहित किए गए कुल सामान का मात्र 20 फीसदी देने के एवज में वह मुझे एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे पूरे इंदौर शहर में लेकर घूमा. आप यकीन नहीं करेंगे कि उसने उस 20 फ़ीसदी सामान का क्या किया. उसने वह सब अपने पड़ोसी में बांट दिया. उसके खुद के बच्चे, बीवी और मां नए कपड़े पाने की खुशी में सातवें आसमान पर थे.”

 

 

तर्कसंगत का तर्क 

हमारे देश को अमित जैन जैसे अपरंपरागत युवा आइकनों की बहुतायत में जरूरत है. बदलावपरक और एक उत्साही यात्री, अमित जैन मुख्य पेज पर सराहना के लायक है. तर्कसंगतअमित जैन के इस नेक काम की सराहना करता है और दिल से मिट्टी के रंग को, कई जीवन बदलने में सफलता के लिए कामना करता है

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