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गरीबी में उनकी पढ़ाई नहीं हुई, अब वह विधवाओं, कैदियों और बीमार माता-पिता के बच्चों को मुफ्त स्कूली शिक्षा देते हैं

तर्कसंगत

February 22, 2019

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जब अनीता (बदला हुआ नाम) के मालिक को पता चला कि उसका पति जेल में हैं उन्होंने उसे अपने घर से निकल दिया. ये खबर जल्दी ही सब जगह फ़ैल गयी और उसके लिए सारे दरवाजे बंद हो चुके थे. असहाय और मजबूर अनीता ने अपने और अपने बेटे के अच्छे कल की उम्मीद में एक वेश्या के रूप में काम करना शुरू कर दिया लेकिन जल्दी उनकी मुलाकात विनायक देवकर से हुई जो उनकी जिंदगी में एक मसीहा बनकर आये.

पुणे के एक सामाजिक कार्यकर्ता विनायक देवकर पिछले चार सालों से विधवाओं, तलाक-शुदा महिलाओं और बीमार माता-पिता के  245 गरीब और वंचित बच्चों के लिए मुफ्त अंग्रेजी स्कूल चला रहे हैं. येरवडा जेल परिसर में अनीता से मिलकर उनके हालात जानने के बाद उन्हें बहुत बुरा लगा और उन्होंने उसके बेटे की जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया. महाराष्ट्र जेल के तत्कालीन एडीजी बी.के. उपाध्याय से मिलकर विनायक ने कैदियों के 27 बच्चों को अपने स्कूल में दाखिला दिलाया और उनकी पढ़ाई करवायी.

 

 

विनायक देवकर ने तर्कसंगत को बताया कि कैसे गांधीजी की विचारधारा ने उन्हें गरीबों और जरूरतमंदों के प्रति अपना जीवन समर्पित करने के लिए प्रेरित किया.

 

संघर्ष से भरा हुआ जीवन

जन्म से अनाथ विनायक को तीन महीने की उम्र में एक बूढ़े दंपति ने गोद ले लिया था जो अपनी रोज़ी रोटी के लिए पत्थर की खदान में काम करते थे. जब तक विनायक के पिता जिन्दा थे उन्होनें अपना बचपन विश्रांतवाड़ी की बस्तियों में बिताया और दसवीं तक पढ़ाई एक स्थानीय स्कूल में पूरी की. उनके पिता के देहांत के बाद उनकी असहाय विधवा माँ को जरूरतें पूरी करने के लिए एक बार फिर से बहुत संघर्ष करना पड़ा. पारिवारिक परिस्थितियों के कारण विनायक ने दसवीं बोर्ड की परीक्षा छोड़ और दसवीं में फ़ैल हो गए परिणाम-स्वरुप उन्होंने एक छोटी सी नौकरी करना शुरू कर दिया और अपने घर को संभाला. उनकी कम उम्र में ही शादी हो गयी थी परन्तु एक स्थिर नौकरी पाने में वे असफल रहे. अपना घर चलाने के लिए उन्हें लॉटरी टिकट बेचीं यहाँ तक होटलों में भी काम किया लेकिन मुसीबतों के बोझ ने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी थी. उनको सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उनकी सबसे बड़ी ताकत, उनकी मां का कैंसर के वजह से देहांत हो गया.

 

 

विनायक ने बताया “अपने कड़े परिश्रम और दृढ़ निष्ठा के साथ मैंने रियल एस्टेट में काम किया. उस काम में काफी तरक्की हुई और फिर तीन साल बाद मैंने अपना खुद का काम करना शुरू कर दिया. 28 साल का होने तक मेरी जिंदगी में काफी चीजें बेहतर हो रही थीं लेकिन तभी मुझे अपने दिल की बीमारी के बारे में पता चला. अपने जीवन की शुरुआत में अपने बच्चों को ऐसे बुरे दिनों में देख पूरे एक साल तक मैं निराशा में डूब रहा.”

 

एक चार साल के बच्चे ने सब बदल दिया

“एक साल यूँ ही गुजर गया और फिर एक त्यौहार पर में एक 4 साल के छोटे लड़के से मिला, जो दिल की बीमारी से जूझ रहा था. उसकी माँ अपने बेटे की सर्जरी के लिए सब से पैसों मांग रही थी. मुझे गहराई से समझ में आया कि मेरे जैसे हजारों हैं जो ऐसी बीमारियों से जूझ रहे हैं, यहां तक ​एक बच्चा भी इससे जूझ रहा है. उसकी मां की मदद करने के लिये मैंने घर-घर जाकर 10, 15, 30, 50 रुपये के रूप में छोटा छोटा चंदा इकट्ठा किया जिससे करीब 1.2 लाख रुपये मिले. हमने उसका इलाज कराया और एक सफल सर्जरी के बाद सौभाग्य से वह लड़का ठीक हो गया” विनायक ने बताया.

कई दिनों तक विनायक अपनी स्थिति के बारे में सोचते रहे और केवल यह निष्कर्ष निकाल पाये कि उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिये ना कि तनावग्रस्त होकर अपने स्वास्थ्य को बिगाड़ना चाहिये.

 

 

वर्ष 2002 में, 37 वर्षीय विनायक ने ‘जीवन मित्र प्रतिष्ठान’ नामक एक एनजीओ की शुरुआत की जिसका उद्देश्य उन लोगो के लिये पैसे जुटाना था जो हृदय, गुर्दे, कैंसर जैसी घातक बीमारियों से जूझ रहे हैं और आर्थिक रूप से कमजोर हैं.

 

रोगियों, विधवाओं और बच्चों को बचाने वाले

अपनी पूरी जिंदगी लोगों की सेवा और समाज के लिये काम करते हुये विनायक ने कई बड़े लोगों, कॉर्पोरेट संगठनों और व्यापारियों मिलकर पैसे जुटाये जिससे बहुत कम खर्चे में लोगों का अच्छा इलाज हो सकें.

“मुझे याद है कि एक लड़की के पिता रोते हुए मेरे पास आये और अपनी बेटी की बीमारी के बारे में मुझे बताया. जब मैं उनके घर गया जो वह लड़की बिस्तर पर लेती थी जिस पर हर जगह खून गिरा हुआ था. वह अपने असहाय माता-पिता की इकलौती संतान थी. मैंने उसे ठीक कराने की कसम खाई और घर घर जाकर उसके लिये पैसे इकट्ठे किये जिससे जल्दी ही उसका इलाज हुआ और वह लड़की कुछ ही समय में ठीक हो गई. कुछ साल बाद जब वह अपने बेटे के साथ मुझसे मिलने आयी और मेरा धन्यवाद किया मैं ख़ुशी से रो पड़ा ” विनायक ने अपने द्वारा बचाये गये कई लोगों में से एक के बारे में बताया.

साल 2006 से विनायक घरों से इकट्ठी की गई पुराने अखबार की रद्दी को बेचकर लगभग सौ विधवाओं को 300 रुपये महीने देकर मदद कर रहे हैं जो अपनी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं.

 

 

सामाजिक क्षेत्र में लगभग एक दशक बिताने के बाद, जब उनके बच्चों को बड़ी और अच्छी नौकरी मिल गई, विनायक ने आर्थिक रूप से कमजोर विधवा और तलाकशुदा माँओ के बच्चों के बारे में सोचना शुरू किया जो अच्छी शिक्षा नहीं ले पा रहे थे” मैं गरीबी के कारण अपनी पढ़ाई नहीं कर पाया इसीलिये मैं नहीं चाहता की कोई और बच्चा ऐसी स्थिति से गुजरे. इसके लिये उन्होंने वर्ष 2014 में शुरू में महात्मा गांधी स्कूल की शुरुआत की, जो अब महाराष्ट्र सरकार का एक पंजीकृत प्राथमिक शैक्षणिक संस्थान है, जहाँ लगभग 245 बच्चे पढ़ाई करते हैं. यहाँ के शिक्षकों और सहायक कर्मचारियों को अच्छी पगार देने के अलावा यह स्कूल बच्चों को अच्छी और प्रतिष्ठित शिक्षा भी प्रदान कराता है. स्कूल बच्चों को किताबें, स्टेशनरी, ड्रेस, चिकित्सा देने के अलावा उनकी अन्य जरूरतें भी पूरी करता है. सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि स्कूल का पूरा खर्चा विनायक देवकर के ईमानदार और निस्वार्थ भाव से होता है.

 

मेरे आदर्श – गांधीजी जिन्होनें मेरी जिंदगी बदल दी

पुणे में एक डॉक्टर ने मुझे महात्मा गांधी की प्रसिद्ध आत्मकथा ‘My Experiment With Truth’ गिफ्ट की जिसने नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग जैसे दिग्गजों को भी प्रभावित किया है. उस पुस्तक ने मेरे जीवन को बदल दिया. वह बताते हैं कि गांधीजी का अपना करियर छोड़कर अपने देशवासियों के साथ खड़े होने ने उन्हें बहुत प्रेरित किया. आज बहुत से लोग गांधीजी को बुरा बोलते हैं लेकिन वे यह नहीं जानते हैं कि उन्होंने अपने देशवासियों को बेहतर बनाने के लिए व्यक्तिगत रूप से कितना बलिदान किया है” विनायक ने हमें बताया.

 

 

वह बताते हैं कि कैसे लोगों को किसी की मदद के लिए 500 रुपये देने में हिचकिचाहट होती है जबकि वही लोग एक मंदिर के लिए 35000 रुपये का दान देने में सोचते भी नहीं हैं. आज-कल सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे लोग पैसे के पीछे भाग रहे हैं और केवल अपने सुख और आराम की परवाह करते हैं. जो लोग गरीब हैं या किसी बीमारी से जूझ रहे हैं उनके बारे में सोचने के लिए उनके पास एक पल भी नहीं है. कभी-कभी लगता है कि ऐसे पड़े लिखे होने से मेरा अनपढ़ होना ज्यादा अच्छा है.

तर्कसंगत  विनायक की अद्भुत भावना और समाज के प्रति उनकी निस्वार्थ सेवा की सराहना करता है.

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