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देश भर से रेप सर्वाइवर ने 10,000 किलोमीटर की गरिमा यात्रा की

तर्कसंगत

February 25, 2019

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बलात्कार और मानव तस्करी से प्रभावित हज़ारों महिलाओं ने लगभग 10,000 किलोमीटर लंबा मार्च किया जो  भारत के 24 राज्यों के 200 जिलों से गुजरी. इस यात्रा कोगरिमा यात्रानाम दिया गया जो उन मजबूत महिलाओं के लिए था जिन्होंने समाज से मिल रहे अपमान और निर्वासन का डटकर मुकाबला किया. मंगलवार 19 फरवरी, को मुंबई से शुरू हुई यह यात्रा उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर पहुंच गई. इस यात्रा में कई वकील, नेता, अभिनेता और एक्टिविस्ट भी रेप सर्वाइवर के हमसफ़र बने और उनके सहयोग में साथ आए

 

गरिमा के लिए यात्रा 

इन घृणित अपराधों के शिकार लोग अपना जीवन लंबी कानूनी लड़ाई और स्वास्थ्य इलाज़ में लगा देते हैं, किन्तु सबसे मुश्किल बात यह है कि इन विषम परिस्थिति में समाज उन्हें नफरत और अपमान से हाशिए पर भी धकेलने की कोशिश करता है. ऐसे में लोगों की मानसिकता बदलने के उद्देश्य से राष्ट्रीय गरिमा अभियान के बैनर अन्तर्गत कई संस्थान 20 दिसम्बर को इस यात्रा में शामिल हुए.

 इस राष्ट्रीय गरिमा अभियान के संयोजक, आसिफ शेख़ जो पिछले 10 सालो से बलात्कार और मानव तस्करी जैसे अपराधों के शिकार लोगों के लिए काम कर रहे हैं, ने तर्कसंगत को बताया कि यह यात्रा उन महिलाओं के समाज से रूबरू होकर अपनी कहानी बताने के लिए है जिससे लोगों का नजरिया रेप सर्वाइवर के लिए बदले

 

 

पिछले 10 सालों में लगभग 11,000 बलात्कार केसों पर हमने कार्य किया है. बलात्कार पीड़ितों की हम कई लेवल पर सहायता करते हैंहम उन्हें दोषियों के ख़िलाफ़ सही धाराओं के साथ केस दर्ज करने में मदद करते हैं. हम इन लोगों के सही इलाज़ का भी ध्यान रखते है. क्योंकि भारत में जब किसी बलात्कार पीड़ित को हॉस्पिटल भेजती है तो उसका मुख्य उद्देश्य केवल बलात्कार के सबूत इक्कट्ट करना होता है. हमारा तीसरा मुख्य उद्देश्य पीड़ितों को सही न्याय दिलाना है.” आसिफ शेख़ 

 

कम या गलत जानकारी एक मुख्य चुनौती

कैसे किसी बलात्कार के केस में ग़लत चार्जशीट प्रभाव डालती है, ये समझाते हुए शेख़ कहते हैंअधिकतर मामलों में पीड़ित को यह जानकारी ही नहीं होती कि दोषी के ख़िलाफ़ क्या धाराएं लगनी चाहिए. जैसे किसी दलित महिला से बलात्कार के मामले में एससीएसटी एक्ट लगना आव्यश्यक है वहीं बच्चों से बलात्कार के मामले में POSCO. ऐसे कई उदाहरण भारत में मिल जाएंगे जहां बलात्कार जैसे मामलों में सिर्फ  शारीरिक हमला जैसी धाराएं दोषियों के खिलाफ लगाई गई है. अथवा दलित महिला से बलात्कार के मामले में मौखिक गालियां वाली धारा लगाकर केस को कमज़ोर कर दिया जाता है. इसलिए हम यह सुनिश्चित करते हैं कि पुलिस इन मामलों में दोषियों के ख़िलाफ़ सही धाराएं लगाए. इसके अलावा पीड़ित को संबल देने के लिए काउंसलिंग आदि हमारी सेवाओं में शामिल है.” इसके अलावा भी बलात्कार पीड़ित को कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

 

 

शेख़ कहते है कि कानूनी लड़ाई और संस्थानों से लड़ाई में बाहरी लोग मदद कर सकते हैं. किन्तु अपने परिवार और समाज से बहिष्कार में ये मदद बहुत सीमित हो जाती है. इसलिए भी इस गरिमा यात्रा का आयोजन किया गया है ताकि वो अपनी बात खुले दिल से और हौसले के साथ कह सके और अपनी खोई पहचान को दोबारा पा सकें. इस सामाजिक बहिष्कार के कारण को समझाते हुए शेख़ कहते है कि ऐसे मामलों में स्वयं का परिवार ही पीड़ित के साथ उपेक्षा और अछूत व्यवहार करता है

पिछले वर्ष हुई लगभग 2000 बलात्कार पीड़ितों की परेशानियों को समझने हेतु हुई सभा के मुख्य बिंदुओं को बताते हुए शेख़ कहते हैं कि एक 45 वर्षीय महिला ने बताया कि उनके पति ने उन्हें पिछले 10 सालों में छुआ तक नहीं क्योंकि उनके साथ बलात्कार हुआ था और उनका पति समझता है कि वो अछूत हो गई है.

एक मां जिसकी 14 वर्षीय बेटी के साथ बलात्कार हुआ, ने बेटी को परिवार द्वारा बहिष्कृत और उपेक्षित कर देने के बारे में बताया. उनके परिवार वाले न्याय के लिए कोई कानूनी लड़ाई ना लड़कर, बेटी की जल्दी शादी कर उससे पीछा छुड़ाना चाहते हैं

 

छिपे नहीं, ज़ोर से अपनी बात बोलें

शेख़ बताते हैं कि कानून के अनुसार बलात्कार पीड़ित की पहचान सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए. फिर भी यह हुए नुकसान की भरपाई के लिए नाकाफी है. शेख़ कहते हैं कि अपने समाज में बलात्कार को पीड़ित की गलती के रूप में ही देखा जाता है. सो ऐसे में यदि पीड़ित ख़ुद ही निकल के बाहर आता है और लोगों को अपनी आपबीती सुनाता है तो ये निश्चित ही लोगों के नज़रिए पर प्रभाव डालता है

 

 

शेख़ आगे बताते हुए कहते हैं कि बस अभी कुछ दिनों पहले रतलाम, मध्य प्रदेश में जब यह यात्रा अपने पड़ाव में थी कुछ पीड़ितों ने अपनी आप बीती को सुनाया. ऐसे में वहां मौजूद गांव के एक मुख्य व्यक्ति ने बलात्कार शब्द के उपयोग के बारे में आपत्ति जताई

हमारे समाज में एक भाग है जो बलात्कार जैसी घटनाओं को अपना चुका है. वे ये मानते हैं कि ऐसी घटनाएं होती है पर वे पीड़ितों से इसके बारे में सुना नहीं चाहते. मेरा मानना है कि छुपा देना या दबा देना, इस समस्या का हल नहीं” 

ये यात्रा जो 22 फरवरी 2019 को दिल्ली में अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंची उसको लगभग 25,000 बलात्कार पीड़ित सहयोग कर रहे हैं. इसको एक ऐतिहासिक घटना बताते हुए वो कहते है कि ऐसा पहली बार हुआ कि इतने बड़े पैमाने पर बलात्कार पीड़ितों ने अपने बारे में बताया.

 

 

उनके अनुसार पीड़ितों और उनके परिवाजनों को मिलाकर 3 लाख लोगों के आस पास स्वयंसेवक इस यात्रा में शामिल हुए. “हमारा उद्देश्य है कि इस यात्रा के माध्यम से यह संदेश फैले कि बलात्कार पीड़ितों को सहानुभूति की नहीं बल्कि हमारे मदद की जरूरत है. दोषियों को सहयोग ना कर उन्हें अपमानित करेएक लड़की या महिला को अपने ऊपर हुए इस शारीरिक हमले को बयान करते हुए क्यों शरम आनी चाहिएउसने कुछ गलत नहीं किया, उसको कैसी शर्म?” 37 वर्षीय शेख़ कहते हैं

 

सफ़लता सहयोग से आती है

इस यात्रा की सफ़लता के बारे में बताते हुए शेख़ कहते हैं कि इस यात्रा ने पीड़ित के कपड़ों, उम्र, जाति  और प्रकृति के बारे में मिथक तोड़ने में मदद की क्योंकि विभिन्न आयु वर्ग और समाज से आए पीड़ितों ने इस बारे में खुल के बोला

“हमारी यात्रा में, वहाँ नाबालिगों के साथ बलात्कार किया गया था, जबकि बुर्का पहने हुए थे, एक और 60 वर्षीय है, जो तीन पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार किया गया था जब वह जेल में थी. इसके अलावा, 3 साल के बच्चे की माताएं भी थी जो इस अपराध से पीड़ित थीं. उनकी कहानियों से निश्चित रूप से लोगों को सोच को बदलने में मदद मिलेगी और यह कई मिथकों को तोडा जायेगा. इसके अलावा, यह अन्य लोगों को अधिक साहस और शक्ति देगा.”

 

 

उनका यह मानना है कि 65 दिनों की लंबी यात्रा जाति अवरोध को खत्म करने में सफल रही. “जब हम इस अभियान की योजना बना रहे थे, हमने सोचा था कि कई दलित और यहां तक कि उच्च जाति की महिलाएं भी होंगी, जो भेदभाव ला सकती हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हमने देखा कि अलग अलग धर्म और जाति की महिलाएं इस एक कारण से एकजुट हैं. इतने दिनों में, हम एक साथ रहे, सोये और खाये भी लेकिन एक भी समस्या नहीं थी.”

संयोजक, राष्ट्रीय गरिमा अभियान ने भी हमें बताया कि कई वकील, शिक्षक, कार्यकर्ता, अभिनेता और राजनेता भी विभिन्न स्थानों पर यात्रा में शामिल हुए. “हम आईआईटी खड़गपुर, आईआईएम मद्रास भी गए और छात्र प्रतिक्रियाएं भी काफी आशाजनक थीं. कई कॉलेजों में, कई युवाओं ने यौन उत्पीड़न की अपनी घटना के बारे में भी राज़ खोला.

 

थोड़ा प्रतिरोध

हालांकि, सिक्के के दो पहलू होते हैं, जबकि यात्रा को कई लोगों ने सराहा, कुछ ने यह भी कहा कि उन्हें लगा कि इससे उनके गांवों की छवि खराब होगी. शेख ने कहा कि यात्रा में 80 लाख से अधिक लोगों ने किसी न किसी तरह से भाग लिया, लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ जब कुछ लोगों ने यात्रा में भाग लेने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि जब वे भंवरी देवी के पास गए, तो राजस्थान के बस्सी के भतेरी गांव में एक बलात्कार करने वाला बच गया, उसके सामने भी बदसूरत वास्तविकता थी। इनमें से एक, भंवरी देवी, जो 1992 में एक रेप सर्वाइवर थी, उन्हें उच्च जाति के पुरुषों द्वारा बलात्कार किया गया था, क्यूंकि उन्होनें आरोपी की बेटी के बाल विवाह को रोकने की कोशिश की थी. उनकी शिकायत के बाद ही कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए ‘विशाखा’ दिशानिर्देशों का गठन किया गया था.

उन्होंने हमें बताया कि जब इस आयोजन को आयोजित करने के लिए यात्रा भंतेरी जयपुर जिले के भंवरी देवी गाँव में पहुँची, तो गाँव का एक भी व्यक्ति, जिसकी लगभग 3000 लोगों की आबादी नहीं थी, ने इस कार्यक्रम में भाग लिया। भंवरी देवी का उल्लेख करते हुए, शेख ने कहा कि ऐसे लोग हैं जिन्हें अपना सारा जीवन न्याय के लिए लड़ना पड़ता है। जिन्हें ये सारे साल सिर्फ लोगों को समझाने के लिए बिताने पड़ते हैं कि उनके साथ जो हुआ वो उनकी गलती नहीं थी.

 

 

उन्होंने भविष्य के बारे में बात करते हुए कहा कि यात्रा का समापन 22 फरवरी को हुआ, लेकिन उस दिन से समाज में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. “हमें उम्मीद है कि इस अभियान को और अधिक सक्रिय रूप से शुरू किया जाएगा क्योंकि हमें बहुत समर्थन और स्वागत की प्रतिक्रिया मिली है. हमें उम्मीद है कि अगले एक साल में, 200 जिलों में जाने वाली यात्रा उस विशिष्ट क्षेत्र में बलात्कार से बचे लोगों की मदद करने में सक्षम होगी. ”भारतीय की 90- 95% आबादी किसी न किसी रूप में यौन उत्पीड़न का सामना करती है, बस लोग इसके बारे में बोलना नहीं चाहते हैं. अगर लोग इसके बारे में बात करना शुरू कर देंगे, तो ही चीजें बदल सकेंगी.

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