मेरी कहानी

मेरी कहानी: मैंने कुछ पैसे उधार दिए थे, जिससे उन्होनें अपनी एक दूकान खोल ली

तर्कसंगत

February 25, 2019

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कुछ महीने पहले मैंने एक गरीब, विकलांग व्यक्ति को देखा, जिसने एक दुर्घटना में अपना पैर खो दिया था. अपने दुर्भाग्य के समय से, उन्होंने अपनी नौकरी भी खो दी थी और अब जैसे तैसे  अपनी ज़िन्दगी बसर कर रहे थे. जब मैं उनसे मिल तो वो भूखे थे.

उनसे बात करते समंय मैंने उनसे पुछा कि वो काम क्या करते हैं और उन्होनें जवाब दिया कि वह  हमारे पारंपरिक भोजन बनाना जानते हैं , पेशे से बावर्ची हैं.

उनकी मदद करने की मेरे प्रयास में मैंने उन्हें लगभग $ 50 का लोन दिया, हालाँकि मुझे वो पैसे वापस पानइ का कोई इरादा नहीं था.

मैंने यह भी पाया कि वह बहुत भावुक थे मगर अपनी विकलांगता से कटाई मायूस नहीं थे वास्तव में ऐसा लगता है जैसे “विकलांगता” उनकी डिक्शनरी में हो ही नहीं.

कुछ दिनों के बाद मैंने देखा कि उन्होनें अपना एक स्टाल खोला है और ‘शमी कबाब’ बेच रहा हैं.

जब उन्होंने मुझे देखा वह मेरे लिए बहुत आभारी थे मगर उस वक़्त मेरे अंदर जो भावना थी वह आंतरिक संतुष्टि और शांति की थी, उन्हें खुश और संतुष्ट देख कर मुझे काफी अच्छा लग रहा था.

मैं यहां अपनी दयालुता का प्रदर्शन नहीं कर रहा हूं, लेकिन अगर हम सभी सिर्फ एक व्यक्ति की मदद कर सकते हैं, तो हमारी दुनिया बेहतर हो जाएगी, यह सब कुछ केवल 50 डॉलर से भी क्या जा सकता है.

अगर आपके पास भी दुनिया को बताने के लिए कोई प्रेरक कहानी है, तो हमें अपनी तर्कसंगत के फेसबुक मेसेंजर पर लिख भेजें.

 

कहानी: फहीम अहमद

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