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भारत पाकिस्तान का पानी नहीं रोक सकता

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Image Credits: jagran

February 25, 2019

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अपने के ट्वीट में, केंद्रीय जल मंत्री नितिन गडकरी ने कहा:” हम भारत से पाकिस्तान जाने वाली नदियों का पानी रोक देंगे. हम पूर्वी नदियों के पानी को डायवर्ट करेंगे और जम्मू और कश्मीर और पंजाब में अपने लोगों को आपूर्ति करेंगे.”

इंडस रिवर सिस्टम में कुल जल निकासी क्षेत्र 11,165,000 वर्ग किमी से अधिक है.

वर्ल्ड बैंक ने सिंधु नदी के बेसिन के पानी को आवंटित करने के लिए कई वर्षों तक भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की और इसके बाद सिंधु जल संधि को लागू किया.

उरी घटना के बाद, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था : “रक्त और पानी एक साथ नहीं बह सकते.” अब भाजपा के पीएम इन-वेटिंग नितिन गडकरी ने यह कह डाला कि भारत पाकिस्तान की पानी में कटौती करेगा. यह भी किसी जुमले से कम नहीं है, क्यूंकि यह वास्तविकता से बहुत दूर है. इस बयान से श्री गडकरी ये बताने की कोशिश कर रहे थे कि भारत इस बार पुलवामा के लिए जवाबी कार्रवाई करेगा. सिंधु बेसिन की तीन पश्चिमी नदियों को रोक करके, जो पाकिस्तान में बहती हैं और उनके अधिकांश कृषि और बिजली उत्पादन में काम आती है. सच्चाई यह है कि रक्त के प्रवाह को रोका जा सकता है, लेकिन पानी का प्रवाह जारी रहेगा.

सिंधु नदी प्रणाली में कुल जल निकासी क्षेत्र 11,165,000 वर्ग किमी से अधिक है. यह वार्षिक प्रवाह के मामले में दुनिया की 21 वीं सबसे बड़ी नदी है. यह पाकिस्तान का एकमात्र साधन भी है. अंग्रेजों ने पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र को सिंचित करने के लिए एक जटिल नहर प्रणाली का निर्माण किया था. विभाजन ने पाकिस्तान में इस बुनियादी ढांचे का एक बड़ा हिस्सा रह गया था, लेकिन भारत के हिस्से में हेडमास्टर बांध आ गया, जिससे पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र के ज़मींदारों और रईसों में असुरक्षा की भावना घर कर गयी. विश्व बैंक ने सिंधु नदी के बेसिन का पानी पाकिस्तान को आवंटित करने के लिए कई वर्षों की मध्यस्थता की जिसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लागू किया. प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति अयूब खान ने 19 सितंबर, 1960 को कराची में संधि पर हस्ताक्षर किए.

IWT इंडस वाटर ट्रीटी के अनुसार, तीन “पूर्वी” नदियों – ब्यास, रावी और सतलुज पर नियंत्रण भारत को दिया गया था, जबकि तीन “पश्चिमी” नदियों – सिंधु, चिनाब और झेलम – पर नियंत्रण पाकिस्तान को दिया गया था.

चूंकि पाकिस्तान की नदियाँ पहले भारत से होकर बहती थीं, इस संधि ने भारत को सिंचाई, परिवहन और बिजली उत्पादन के लिए उपयोग करने की अनुमति दी, साथ ही भारत के परियोजनाओं के लिए सटीक नियम बनाए गए. यह संधि पाकिस्तानी आशंकाओं का एक तरह से परिणाम थी, पाकिस्तान को डर था कि चूंकि सिंधु बेसिन की नदियों का स्रोत भारत में थीं, इसलिए यह संभावित रूप से पाकिस्तान में सूखा और अकाल पैदा कर सकती थी, खासकर युद्ध के समय में. 1960 में संधि के बाद से, भारत और पाकिस्तान ने तीन युद्ध लड़े हैं, लेकिन संधि के अनुसार पानी का प्रवाह एक दिन के लिए भी बाधित नहीं हुआ है.

देखने से यह ट्रीटी पाकिस्तान के पक्ष की ज़्यादा लगती है क्योंकि यह पश्चिमी नदियों के पानी का 80 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान को देता है. लेकिन वास्तविकता यह है कि क्योंकि इस क्षेत्र का भूगोल ही ऐसा है जो पाकिस्तान को ज़्यादा पानी देता है. मुख्य कश्मीर घाटी अपने अधिकतम 100 किमी चौड़े और 15,520.30 वर्ग किमी क्षेत्र में है. जबकि हिमालय लद्दाख से कश्मीर घाटी को विभाजित करता है, पीर पंजाल रेंज, जो पश्चिम और दक्षिण से घाटी को घेरती है, इसे उत्तरी भारत के महान मैदानों से अलग करती है. इस सुरम्य और घनी बस्तियों की घाटी की समुद्र तल से औसत ऊंचाई 1,850 मीटर है लेकिन आसपास के पीर पंजाल रेंज की औसत ऊंचाई 5,000 मीटर है. इस प्रकार, पीर पंजाल रेंज कश्मीर घाटी और देश के बाकी हिस्सों के बीच स्थित है और एक बाधा है जिससे पानी और कहीं जा सकता है और न ही कश्मीर घाटी के संरक्षक इसके किसी भी हिस्से में अधिक पानी जमा करने की अनुमति देते हैं. चूँकि पानी को कहीं और संग्रहीत या उपयोग नहीं किया जा सकता है, इसे पाकिस्तान में बहते रहना है.

पाकिस्तान को दी गई तीन पश्चिमी नदियों में से, सिंधु, जो कारगिल के पास भारतीय क्षेत्र से बहती है, फिर लगभग पूरी तरह से पाकिस्तान-नियंत्रित क्षेत्र में बहती है. झेलम का उद्गम अनंतनाग के पास वेरीनाग से होता है, और यह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में प्रवेश करने से पहले कश्मीर घाटी में 200 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करता है. श्रीनगर से बहने के बाद, यह वुलर झील को भरता है और फिर बारामूला और उरी से पीओके में जाता है. इस पर बनाई गई हाइडल परियोजनाएं घाटी में अधिकांश बिजली की आपूर्ति करती हैं.

चिनाब, जिसे चंद्रभागा के नाम से भी जाना जाता है, हिमाचल प्रदेश में लाहौल स्पीति से निकलता है और जम्मू क्षेत्र से होकर पाकिस्तानी पंजाब के मैदानी इलाके में आता है. चिनाब का जलग्रहण क्षेत्र लम्बा और संकरा है और ज्यादातर भारत में है. लेकिन चिनाब गहरी घाटियों से होकर गुजरता है और नदी लगभग 24 मीटर प्रति किमी की रफ़्तार से गिरती है, जिससे भौतिक बाधाओं और भारी आर्थिक लागतों पर असर पड़ता है.

IWT द्वारा भारत को आवंटित तीन पूर्वी नदियाँ ब्यास, रावी और सतलज हैं. ये जल पंजाब में और कुछ हद तक हरियाणा में कृषि को बनाए रखते हैं, और इनका पर्याप्त उपयोग किया जाता है. इसमें से पाकिस्तान को जो पानी जाता है आमतौर पर धारा प्रवाहित रखने के लिए ही पर्याप्त है. लेकिन फिर भी पाकिस्तान ने समय-समय पर भारत को अपनी बाढ़ के लिए दोषी ठहराया है. इसके बावजूद, IWT ने दोनों देशों के लिए बहुत अच्छा काम किया है. यहां तक कि जब भारत और पाकिस्तान 1965, 1971 और कारगिल में 1999 में युद्ध किया तो भी पानी बिना किसी रुकावट के बहती रही. कारण यह है कि आईडब्ल्यूटी ट्रीटी इसलिए काम करती है क्यूंकि ये दोनों ही देशों के भौगोलिक दृष्टि से दोनों देशों को सूट करता है.

पुलवामा की घटना ने भारत और नरेंद्र मोदी सरकार के भीतर बहुत गुस्सा पैदा कर दिया है, जो प्रतिशोध की धमकी देकर भारत में पाकिस्तानी मूल के आतंकवाद को रोकने के लिए सत्ता में आये थे, जिसे पूरा करने में उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. उरी के बाद, यह पता चला कि वादे और वास्तविकता के बीच एक खासा अंतर है. पीएम के चुनाव पूर्व भाषणों को अब उन्हें ताना मारने के लिए वापस उपयोग किया जा रहा है. मोदी सरकार हथियारों के इस्तेमाल के विकल्प कम कर रही है. दुबारा सरकार चुने जाने तक इसे एक तरह से नजर अंदाज कर सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यही है.

कश्मीर विश्वविद्यालय के भूविज्ञान और भूभौतिकी विभाग में पृथ्वी विज्ञान के प्रमुख डॉ. शकील अहमद रोशशू ने हाल ही में कहा: “मान लेते हैं कि हम तर्क की खातिर पानी की आपूर्ति बंद कर देते हैं. लेकिन पानी कहां जाएगा? इस पानी को स्टोर करने के लिए हमारे पास बुनियादी ढांचा नहीं है. हमने जम्मू-कश्मीर में ऐसे बांध नहीं बनाए हैं जहां हम पानी का भंडारण कर सकें. और एक पहाड़ी राज्य होने के नाते, तमिलनाडु या कर्नाटक के विपरीत, आप दूसरे राज्य में पानी नहीं भेज सकते हैं.

इसलिए आप तकनीकी रूप से पानी को रोक नहीं सकते.”

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