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एक शख्स जिसने सड़क से कूड़ा-कचरा उठाने वाले 31 हजार लोगो को नई जिंदगी दी है

तर्कसंगत

February 25, 2019

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तेजी से हो रहे शहरीकरण और तकनीकी प्रगति के इस युग में भी भारत के ग्रामीण इलाकों में मल-मैल और कूड़ा ढोने की प्रथा मौजूद है. इससे भी बुरी बात यह है कि जो लोग ये काम करते हैं उन्हें समाज से अलग माना जाता है और उन्हें उनके मौलिक मानवाधिकारों से वंचित रखा जाता है. हालांकि 2013 में एक कानून बनाकर इस अपमानजनक प्रथा को समाप्त कर दिया है फिर भी कई दलित महिलाओं को इसके लिये मजबूर किया जाता है.

जन साहस संगठन के संस्थापक श्री आशिफ शेख, जो पिछले 16 सालों ऐसा काम करने वालों के लिये और बंधुआ मजदूरी को खत्म करने के लिये काम कर रहे हैं, हमें बताते हैं ”यह हमारे जैसे देश के लिये शर्म की बात है कि एक भी इंसान ऐसा काम करने के लिये मजबूर है.”

 

 

अब तक यह संगठन लगभग 31 हजार कूड़ा-कचरा उठाने वालों और बंधुआ मजदूरों आजाद करा चुका है और उन्हें सामाजिक-आर्थिक भेदभाव से बचा चुका है. भारत के 18 राज्यों के 200 जिलों में काम कर रहा ‘जन साहस’ संगठन कई पीड़ितों को समाज की मुख्य धारा में लाया है साथ ही उन्हें आर्थिक रूप से भी स्वतंत्रता भी दिलवाई है.

 

 

 

शुरुआत

श्री आशिफ शेख मानते ​​हैं कि एक दलित मुस्लिम परिवार में पैदा होने की वजह से उन्हें जीवन के हर मोड़ पर मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. यही वो वजह है जिसने उन्हें जाति के नाम पर हो रहे ऐसे अत्याचारों से लड़ने के लिये हिम्मत दी है. एक छात्र के रूप में उन्होंने ‘साहसी एकता समूह’ की शुरुआत की जो छात्रों को सामाजिक विकास और सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिये प्रोत्साहित करता है जिसके बाद साल 2000 में ‘जन साहस’ की नींव रखी गयी.

 

पहली सफलता

2001 में श्री शेख ने दलित समुदाय के प्रति छुआ-छूत और भेदभाव को पहचानने के लिये “National Campaign for Dignity Program to end forced labour” नाम से एक पहल की शुरुआत करी. सर्वे में उन्होंने पाया कि कूड़ा-कचरा उठाने वाली महिलाओं को इंसान के मल-मूत्र तक उठाने पड़ते थे. एक बहुत बुरी बदबू को सहन करते हुये उन्हें अपने नंगे हाथों से कचरे इकट्ठा करके फेंकने पड़ता था. चाहे चिलचिलाती गर्मी हो या बरसात हो उन्हें मल-मूत्र उठाना पड़ता था फिर वो उनके चेहरे पर गिरे या शरीर पर. यह काम खुद अमानवीय था और इसके अलावा महिलाओं को भेदभाव और हिंसा भी सहन करनी पड़ती थी.

पीढ़ी दर पीढ़ी उनके परिवार को यह काम करना पड़ता है. उन्हें स्थानीय मंदिरों, दुकानों और सार्वजनिक स्थानों पर जाने की मनाही होती है. बच्चों को अछूत माना जाता है यहाँ तक उन्हें स्कूल भी जाना माना है जिससे उनकी प्राथमिक शिक्षा भी नहीं हो पाती है. श्री शेख बताते हैं “यह अछूतों के अंदर के अछूत हैं. यह कोई जाति या एक प्रथा नहीं है बल्कि एक मानसिकता है. ऊँची जाति के लोग दलित और कूड़ा कचरा उठाने वाले, दोनों के साथ एक सा व्यवहार करते हैं.”

‘जन साहस’ ने मध्य प्रदेश के भौरसा से अपना काम शुरू किया जहाँ एक साल में उन्होंने 26 महिलाओं ये काम ना करने के लिए मना लिया. बच्चों ने अपने साथ हुये बुरे वर्ताव को बताया जिससे उनकी माँओं ने इसके खिलाफ खड़ा होने का निर्णय किया.

श्री शेख बताते हैं “महिलाओं ने बहिष्कार करने के लिए अपने टोकरियों को जला दिया था.”

 

बाबासाहब अम्बेडकर के कदमों पर NCDP अभियान

जन साहस की मुख्य रणनीति सामुदायिक सशक्तिकरण रही है जो डॉ अम्बेडकर की जाति और जातिवाद के खिलाफ लड़ाई की तर्ज पर थी. मुक्त हुई महिलाओं के पहले समूह को समुदाय की नेताओं के रूप में प्रशिक्षित किया गया जो आस पास के गांवों में जाकर अन्य बंधुआ मजदूरों जागरूक करते थीं. उन्हें ग्रामीणों का रोल मॉडल माना जाता था. आज यह एक सक्रिय संगठन बन चुका है जो सामाजिक भेदभाव और लैंगिक असमानता को समाप्त करने की दिशा में काम कर रहा है.

 

 

उनके काम करने के तरीका बहुत अनोखा है. उदाहरण के लिए- जब एक भूतपूर्व पीड़ित स्वयंसेवकों का एक समूह गांव जाता है तो वे हर ग्रामीण को एक सभा के लिए बुलाते हैं. अपना अनुभव बताते हैं, जातिगत चुनौतियों पर बात करते हैं, लोगो को बंधुआ के रूप में उनकी दुर्दशा का एहसास कराते हैं. उन्हें बताते हैं कि वे खुद को इस अमानवीय काम से मुक्त करा सकते हैं लेकिन ये तभी हो सकता हैं जब वे ये समझें कि वे एक सामाजिक बुराई का शिकार हैं.

2013 में ‘जन साहस’ ने कूड़ा कचरा ढोने वालों के नेतृत्व में 230 जिलों में एक जुलुस निकला. उन्होंने इस प्रथा को खत्म करने के अन्य NGO को भी अपने साथ जोड़ा.

सफलता का एक और मील का पत्थर “Barefoot paralegals” के माध्यम से आया था. इस अत्याचार से पीड़ित लोगो में से लगभग 65% ने वकील बनने के लिये कानून की पढ़ाई करी जो अब अन्य पीड़ितों के साथ बात करते हैं और उन्हें न्याय दिलाते हैं. वास्तव में “Barefoot paralegals” के प्रयासों की वजह से कुछ सालों में दलित महिलाओं के खिलाफ हुये यौन अपराधों में सजा की दर 2% से बढ़कर 38% हो गई.

‘जन साहस’ बच्चों को पढ़ाने, उन्हें कौशल बनाने, उन्हें उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित करने के लिए सरकारी योजनाओं या गैर सरकारी संगठनों से भी जुड़ा हुआ है. दलित लोग आरक्षण प्रणाली पर हुये विवाद के कारण आज विभिन्न राजनीतिक दलों का मुख्य विषय हैं. श्री शेख बताते हैं कि उनका आंदोलन सीधे तौर पर सामाजिक तथा आर्थिक कल्याण के लिये कार्य करता है और कभी भी किसी राजनितिक मसलों में नहीं पड़ता है.

 

चुनौतियां जो खत्म हुईं

तर्कसंगत  से बात करते हुये श्री शेख ने उन चुनौतियों के बारे में बताया जिनसे उन्हें निपटना था. पहले नीची जाति के समुदायों में भी लैंगिक भेदभाव था. महिलाओं को जबरदस्ती ऐसे काम करने के लिये मजबूर किया जाता था और उन्हें यौन हिंसा का भी सामना करना पड़ता था. जन साहस ने बलात्कार और लिंग आधारित हिंसा के कई बचे लोगों को सफलतापूर्वक बचाया है.

एक और बाधा यह थी कि राज्य या केंद्र सरकार उनके अस्तित्व को कभी नहीं मानती थी – जो कभी-कभी उनके अभियानों में देरी करता था.

 

श्री आशिफ शेख का संदेश

श्री आशिफ शेख ने बताया “हमें समानता की बुनियादी को समझने की आवश्यकता है.” बाकि समाज जातिगत भेदभाव की समस्या को यह मानकर नजरअंदाज करता हैं कि यह केवल दलित समुदाय की चिंता है. उन्होंने कहा “भारतीय संविधान में सभी को समानता के लिए मौलिक अधिकारों को समझने की जरूरत है. जब पूरा समाज हाथ से हाथ मिलाकर ऐसी प्रथाओं के खिलाफ होगा तभी हम एक सुनहरे भारत का सपना देख सकते हैं”

जन साहस संगठन और उनके विकास कार्यक्रमों के बारे में अधिक जानकारी के लिए, उनकी वेबसाइट http://jansahasindia.org. को देखें.

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