पर्यावरण

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट – विश्व का तापमान 2030 और 2052 के बीच 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है

तर्कसंगत

Image Credits: Pixabay

February 25, 2019

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संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि ग्लोबल वार्मिंग जिस रफ़्तार से बढ़ रही है और लोग इस समस्या रोकने के लिए जल्द कोई कदम नहीं उठाते हैं तो 2030 से 2052 के बीच विश्व के तापमान में 1.5 बढ़ने की संभावना है. Intergovernmental Panel On Climate Change (IPCC) द्वारा जारी रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ग्लोबल वार्मिंग से तापमान 1.5 बढ़ने में अभी मात्र एक दशक का समय बचा है जिसके बाद अगर आधा डिग्री भी बड़ा तो वातावरण की स्थिति और खराब हो जाएगी जिससे दुनिया और मानव प्रजाति, उनके स्वास्थ्य को काफी नुकसान हो सकता है.

जलवायु परिवर्तन पर विश्व की सबसे बड़ी समीक्षा को अंतिम रूप देने के लिए दक्षिण कोरिया के इंचियोन में पिछले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र के IPCC की बैठक हुई जिसकी मांग 2016 में पेरिस समझौते के बाद करी गयी थी. पेरिस समझौते का लक्ष्य विश्व औसत तापमान को 2 तक सीमित करना था जबकि अब इसे 1.5 पर रोकने का लक्ष्य बनाया गया है. वर्तमान में दुनिया का तापमान पहले की तुलना में 1 अधिक गर्म है.

 

भारत के लिये खतरा

द टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, IPCC की रिपोर्ट में विशेष रूप से भारतीय शहर कोलकाता का नाम लिया गया है जो गर्मी के बढ़ते खतरे का सामना कर सकता है. ऐसा माना गया है कि भारत एक बार फिर 2015 की तरह गर्मी का सामना कर सकता है जिसमें 2500 लोगों की जान गई थी. इसके अलावा यह भी कहा गया कि जलवायु परिवर्तन ने गर्मी से होने वाली मौतों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. भारत उन देशों में से एक है जो विश्व के औसत तापमान 2 के निशान को तोड़ भी सकता है.

ना केवल पर्यावरणीय बल्कि विश्व के तापमान बढ़ने से गरीबी भी बढ़ सकती है क्योंकि इसे खाने की कमी, कीमतों में इजाफा और आय का नुकसान होगा. हालांकि 2 की जगह तापमान को 1.5 पर रोका जाये तो गरीबी दूर करने में मदद मिलेगी. साथ ही एशिया में मक्का, चावल, गेहूं और अन्य फसलों की पैदावार को भी कम नुकसान होगा.

 

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट क्या कहती है?

वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 तक रोकना आसान नहीं होगा इसमें बहुत मुश्किलें आयेंगी. 6000 से अधिक वैज्ञानिक के अध्ययन पर आधारित इस रिपोर्ट से ऐसा लगता है कि यह नामुमकिन काम मुमकिन हो सकता है.

रॉयटर्स के अनुसार रिपोर्ट में बताया गया है कि 1.5 की स्थिति पर, 2030 तक लोगों को कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को 45% तक कम करना होगा जिससे 2050 तक पूरी दुनिया में “कार्बन न्यूट्रल” बन सके. जिम स्केआ, IPCC के सह-अध्यक्ष ने बताया “रसायन विज्ञान और भौतिकी के नियमों के अनुसार 1.5 तक वार्मिंग को रोकना संभव है, लेकिन ऐसा करने से अभूतपूर्व परिवर्तनों की आवश्यकता होगी.”

सारांश में यह भी बताया गया कि 2050 तक बिजली की आपूर्ति को पूरा करने के लिये 70% से 85% ऊर्जा की खपत कम करनी होगी जोकि 1.5 के निशान के अंदर रहने के लिए अब सिर्फ 25% है. इसके अलावा यदि विश्व का तापमान अस्थायी रूप से अधिक भी हो गया तो अतिरिक्त कार्बन हटाने की तकनीक का इस्तेमाल करके 2100 तक तापमान 1.5 से नीचे लाना होगा. इस साल के अंत में पोलैंड में एक सम्मेलन में इस रिपोर्ट पर चर्चा होने वाली है.

क्या 1.5 सुरक्षित है?

हालाँकि 1.5 एक अनुमानित सीमा है फिर भी यह इंसानों के साथ-साथ वनस्पतियों और जीव-जन्तुओ के लिए पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है. तापमान आधा डिग्री बढ़ने पर ही प्रकृति पर बहुत असर डालेगा. ऐसा माना जाता है कि जब ग्लोबल वार्मिंग 1.5 पर पहुंचेगी तो 90% गर्म पानी की Coral reefs गायब हो जायेंगी. 1.5 की सीमा विकास कार्यों के लिए सही है जैसे कि भूख, गरीबी, स्वच्छता आदि. द गार्जियन के अनुसार 1.5 पर विश्व स्तर पर ऐसे लोग ज्यादा होंगे जो पानी की कमी से पीड़ित हो जबकि 2 होने पर खाने की कमी की समस्या ज्यादा होगी और ज्यादा लोग गरीब होंगे. इसीलिए 1.5 लक्ष्य पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है फिर भी 2 के भयानक परिणामों की तुलना में बेहतर है.

 

तर्कसंगत का तर्क 

1.5 पर ग्लोबल वार्मिंग को रोकना एक बहुत बड़ा काम है और जिस तरह हम ऊर्जा की खपत करते हैं उसमें बड़े पैमाने पर सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता होगी. हालाँकि विशेषज्ञों ने बताया है कि यह मुश्किल नहीं है. ग्लोबल वार्मिंग आज स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रही है फिर भी यह हमारी दुनिया को आकार दे रही है. प्रत्येक नागरिक को परिणाम समझना चाहिये और उस पर कार्य करने के लिए ऊर्जा का सही  उपयोग करना चाहिये.

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