पर्यावरण

तेलंगाना के इस गांव ने ऑर्गेनिक फार्मिंग से किया गरीबी और किसान आत्महत्या का उन्मूलन

तर्कसंगत

February 26, 2019

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एक समय था जब तेलंगाना के वारंगल का इनाबावि गांव, इलाके के अन्य गांव की तरह शुष्क मैदानों के कारण दरिद्र था. ग़रीबी और बढ़ते उधारों से निराश किसान हार मानकर आत्महत्या भी कर लेते. किंतु मात्र 52 घरों वाले इस गांव ने हार मानने से इनकार कर दिया और एक दूसरे की नियति के साथ जुड़ गए.

2006 में इस गांव ने एक कृषि इतिहास लिखा जो तेलंगाना का ऐसा पहला गांव बना जो पूर्णत: जैविक था और जहां उर्वरक, कीटनाशक और आनुवांशिक संशोधित फसल के लिए कोई जगह ना थी. इसके बाद से इस गांव का रुख़ कई लोगों ने किया जो इस गांव से सतत विकास की प्रेरणा लेना चाहते थे, जिसकी प्रसिद्धि की झलक, प्रसिद्ध अभिनेता श्री आमिर खान द्वारा संचालित एक मशहूर कार्यक्रम सत्यमेव जयते, में भी देखने को मिली.

बंजर भूमि, बड़ी कपास मिलों और धूल भरी व्यस्त कपड़ा बाजारों से गुजरते हुए, चरती भेड़ों और गायों, हरे भरे खेतों और बैलगाड़ियों को देख सकता है जो किसी भी गांव के चित्र को निरूपित करते हैं. इस जैविक कृषि को शुरू करने से पूर्व गांव वाले अपनी कई समस्याओं से जूझ रहे थे. कृषि में लगातार बढ़ रही धन की आवश्यकता, कम पैदावार, किसानों की आत्महत्या और स्वास्थ्य चिंताओं ने किसानों को एक पूर्वप्रभावी समय में पहुंचा दिया. उन्होंने कीटनाशक को ना कह, जैविक कृषि को बढ़ावा दिया. यह उनके जीवन में कई सकारात्मक बदलाव लेकर आया

 

कई समस्या, एक हल

चर्मरोग, कृषि हेतु कीटनाशकों का प्रयोग करने वाले महिला पुरुष किसानों में, एक आम बात है. “गर्भवती महिलाएं जो अपने गर्भ के प्रारंभिक सप्ताहों में थी कीटनाशकों के उपयोग के कारण उनके बच्चे गिर जाते थे.” पॉन्नम पद्मा जिनका भी एक ऐसा ही गर्भपात हुआ था, ने villagesquare.in को बताया.  इसके अलावा भी किसानों में सिर दर्द, सांस लेने में तकलीफ़, तंद्रा आदि समस्याओं की शिकायत थी.

सबसे ज्यादा इनमें से किसानों को आत्महत्याओं ने प्रभावित किया. फसल बर्बाद होने से बढ़ते उधार ने कई किसानों को आत्महत्या के लिए उकसाया. यह मरने वाले किसान के परिवार की वित्तीय समस्याओं को ही बढ़ाता था

 

 

गांव के सरपंच पोन्नम मलैया ने गांव वालों के साथ कई परामर्श किए. गांव वालों में पहले से ही एकता के भाव थे, जातीय आधार पर भी उनके बीच कोई विभाजन ना था. अपनी समस्याओं के निराकरण हेतु वे सभी साथ आए. Centre for Sustainable Agriculture (CSA) and Centre for Rural Operations and Programs Societ(CROPS) 

जैसे संस्थान आगे आए और इनाबावि गांव को केमिकल रहित बनाने के लिए प्रेरित किया. गांव वालों ने भी संपूर्ण जैविकता का प्रण लिया.

निर्णय सिर्फ 1 दिन में नहीं हुआ बल्कि शुरू में कुछ गांव वाले इसको लेकर संशय में थे. इस विचार को अपनाने में एक लंबा समय लगा. एक गांव वाला याद करते हुए बताता है कि कई प्रश्न उनके दिमाग में लगातार कौंधते थे. “क्या यह फायदे का सौदा होगा? क्या यह हमारी स्वास्थ्य चिंता को समाप्त कर देगा? क्या ये हमारी उधारी को कम कर देगा?” जब CSA और CROPS ने किसानों के इन संदेहों का जवाब दिया तो वे अपने खेतों में केमिकल रहित कृषि के लिए तैयार हो गए

 

कई इनाम 

गांव में लगभग सभी का मुख्य पेशा कृषि ही था और सभी के पास थोड़े एकड़ जमीन भी थी सो सभी 52 परिवारों ने कुल 272 एकड़ जमीन पर कठिन परिश्रम शुरू किया. उन्होंने परंपरागत बीजों, कीटनाशकों और खातों की ओर रुख किया. पशुओं ने फिर कृषि में अपनी महत्ता प्राप्त की. जहां हर घर में लगभग 5 गाय थी, एक निजी डेयरी ने उपयोग के अतिरिक्त बच्चे दूध को एकत्रित करने का जिम्मा लिया. जिसने उनकी कृषि कमाई में योगदान किया

किसान अब जैविक अपशिष्ट से कंपोस्ट बनाते और गाय के गोबर से खाद तैयार करते. लहुसन, हरी मिर्ची, कड़वी नीम और अन्य जैविक पदार्थों से वे कीटनाशक तैयार करते. गेंदा और तेज खुशबू वाले पौधों को खेत के किनारों पर रोप कर एक ऐसी घेराबंदी तैयार की गई कि विषैले कीटाणु दूर ही रहते. गायों की रहने वाली जगहों से निकलने वाले गारे से भी अब खाद बनाने लगे. “केमिकल वाले उर्वरक जहां  ₹3500 प्रति एकड़ पड़ते थे वही यह जैविक उर्वरक मात्र ₹500 प्रति एकड़ पड़ने लगे.” पॉन्नम ने villagesquare.in को बताया.

पहले गांव में सिर्फ एक तालाब था. किसान पानी की उपलब्धता के अनुरूप ही कृषि किया करते थे. ज्यादातर सिर्फ एक ही कपास की खेती कर पाते थे. साल की बचे हुए महीनों में जमीन खाली ही रहती. जबकि जैविक की ओर रुख़ करने के बाद, उन्होंने कई विशेषज्ञों से अपने पानी के स्रोतों के सर्वोत्तम प्रबंधन के लिए राय मांगी. उन्होंने लगभग 26 ट्यूबवेल खोदे और 11 खुले कुएं. उन्होंने बारिश के पानी का संग्रहण शुरू किया.

 

पानी का समझदारी से उपयोग 

पानी के समझदार उपयोग ने उनकी शुष्क जमीन को कपास, सब्जियों और दालों की फसल से हरा भरा कर दिया. उन्होंने बहुफसल और फसलों के बीच बदलाव को अपनाया. उन्होंने आनुवांशिक संशोधित कपास को उगाना बंद कर दिया. कपास के लिए उपयुक्त मिट्टी होने के कारण उन्होंने जैविक कपास उत्पादन को उसकी मांग के अनुरूप बढ़ावा दिया. “खरीदार यहां आते ताकि वे अपनी चाही गई कपास की मात्रा पा सके.” मल्लया ने villagesquare.in को बताया.

 

 

यहां तक कि अगर गाय भी बीटी कपास खाती तो बीमार पड़ जाती थी.” एक किसान ने बताया. अब गांव किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं से रहित है. अब किसी भी प्रकार की त्वचा की खुजली, शुष्कता और अन्य कोई चर्म रोग की बीमारी भी नहीं है.

किसानों ने अपने बीच ही एक स्व सहायता समूह बनाया है जहां भी अपने अपने बीज एक दूसरे से साझा करते हैं और अपनी कृषि उपज के लिए संयुक्त रूप से मोलभाव करते हैं. वे अपनी कृषि उपज को मार्केटिंग ब्रांडसहज आहाराके नाम से बेचते हैं जिसका अर्थ हैप्राकृतिक खाना“. “2006 से ही इनाबावि कृषि क्षेत्र में पूर्ण जैविक गांव में प्रथम स्थान पर लगातार बना हुआ है.” श्री जी वी रमनजनेयालू, कार्यकारी CSA ने villagesquare.in को बताया. इनाबावि की उपज की बाजार में काफी मांग है क्योंकि वो जैविक है.

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