पर्यावरण

10,376 टन प्लास्टिक कचरा भारत में एकत्रित ही नहीं होता.

तर्कसंगत

Image Credits: indiatoday

February 26, 2019

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134 करोड़ लोगों की आबादी वाला भारत, विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. इतनी बड़ी आबादी ही इस बात का साक्ष्य है कि प्रतिदिन निकलने वाले कचरे से निपटना एक मुश्किल कार्य है. वर्ल्ड वॉच इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेजी से हो रहे शहरीकरण और उतनी ही तेजी से बढ़ रहे उपभोग के कारण, अपशिष्ट (ठोस कचरा) पैदा करने में भारत, विश्व के 10 सबसे बड़े देशों में से है, बिजनेस लाइन के रिपोर्ट के अनुसार.

स्थानीय निकाय का ठोस कचरा, जिसमें कि प्राकृतिक कचरा, धातुएं, कागज, प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट आदि शामिल है, स्थानीय नगर निगम द्वारा घरोंसंस्थानों और ऑफिसों से, नियमित रूप से एकत्रित किए जाते हैं. प्लास्टिक कचरा इकट्ठा होने वाली स्थानीय नगर निगम कचरे का कुल 6.92 फीसद है.

टाइम्स ऑफ इंडिया, के अनुसार भारत में प्रतिदिन 25,940 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है. यह तथ्य कि 40 फीसद से ज्यादा प्लास्टिक कचरा एकत्रित होता ही नहीं, यह काफी चौंकाने वाला है. यही अन एकत्रित कचरा जलनिकासी को अवरुद्ध करने, नदियों को दूषित करने, समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को दूषित करने, गलती से आवारा जानवरों की खाद्य नलिका में फंसने, भूमि और जल प्रदूषण करने और खुले में जलने के कारण वायु प्रदूषण करने का भी मुख्य कारक है

 

मात्र 6 शहरों का प्लास्टिक कचरा, कुल 54 मुख्य शहरों से भी ज्यादा है

यह सभी तथ्य, केंद्र द्वारा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को लिखे गए उस पत्र में है जिसमें उन्हें मात्र एक बार उपयोग में आने वाले उस प्लास्टिक, उपयोग की मनाही है जो स्वत: खत्म होने वाला और पुनर्चक्रण अर्थात रीसाइक्लिंग के लिए उपयुक्त ना हो. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल (CPCB) के एक विवरण के अनुसार, पैदा होने वाले कुल प्लास्टिक कचरे का छठवां भाग, 60 मुख्य शहरों द्वारा से आता है. वहीं मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, कोलकाता और चेन्नई शहर कुल पैदा होने वाले कचरे में, 50 फीसद से ज्यादा का योगदान करते हैं.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने भारत के 60 मुख्य शहरों का अध्ययन किया. जिसने अपनी रिपोर्ट में यह लिखा कि ये शहर 4,059 टन का प्लास्टिक कचरा नियमित रूप से पैदा करते हैं. 2010 से 2012 के दौरान, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल द्वारा शहरों से प्लास्टिक कचरे की पैदाइश पर एकत्रित जानकारी के आधार पर, संपूर्ण भारत की प्लास्टिक कचरा उत्पादन की अनुमानित दर निकाली गई. जिसके यह पाया गया कि कुल पैदा होने वाले 25,940 प्लास्टिक कचरे कचरे में से 10,376 टन को यूंही छोड़ दिया जाता है, कभी एकत्रित नहीं किया जाता.

इस अनएकत्रित प्लास्टिक कचरे के प्रचंडता से बढ़ते हुए ढेरों के प्रभाव को समझते हुए, स्वेच्छा से भारत ने 2018 में, एकमात्र बार उपयोग में आने वाले प्लास्टिक को 2022 तक खत्म करने का प्रण लिया. 21 जनवरी 2019, को केंद्रीय पर्यावरण सचिव, श्री सीके मिश्रा जी ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, को विभिन्न मानक और दिशानिर्देश जारी कर, अनिवार्य रूप से 2022 तक एकमात्र बार उपयोग में आने वाले प्लास्टिक का खात्मा करने का लक्ष्य दिया.

 

एकमात्र बार उपयोग में आने वाली प्लास्टिक के उपयोग को कम करने के लिए उठाए गए कदम

एक बार उपयोग में आने वाली प्लास्टिक पर बैन 23 जनवरी 2019 को प्रभावी हुआ. इस बैन द्वारा, ऐसी किसी भी प्लास्टिक और थर्माकोल से निर्मित किसी भी सामग्री का उत्पादन, उपयोग, खरीद  फरोख्त, आवागमन और भंडारण गैर कानूनी बना दिया गया. इन से पैदा होने वाला कचरा कभी भी प्राकृतिक स्वत: नष्ट नहीं होता. महाराष्ट्र राज्य द्वारा लाए गए इस बैन के बाद, मुंबई ऐसे किसी प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध को लागू करने वाला प्रथम बड़ा शहर बना.

प्लास्टिक उपयोग में कमी करना निश्चित ही एक प्रभावी कदम है. किंतु सरकार को भी देश में आयात होने वाले प्लास्टिक कचरे को रोक लगा देने की जरूरत है. पहले भी सरकारों द्वारा प्लास्टिक कचरे के आयात पर रोक लगाई गई है किंतु स्थानीय विदेशी कचरा व्यापारी सिस्टम में खामियों का फायदा उठाते रहे हैं.

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