पर्यावरण

छत्तीसगढ़: 800 फुटबॉल मैदानों के आकार के बराबर वन क्षेत्र को खनन के लिए पर्यावरण मंत्रालय द्वारा मंजूरी दी गई

तर्कसंगत

Image Credits: hindustantimes

February 27, 2019

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छत्तीसगढ़ में पारसा के ओपनकास्ट कोयला खदान को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (एफएसी) से एक चरण की प्रारंभिक मंजूरी मिली है. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के सुरगुजा और सूरजपुर जिलों में वन क्षेत्र की साफ़ सफाई राजस्थान कोलियरीज लिमिटेड (आरसीएल) द्वारा की जाएगी, जिसे अदानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड की सहायक कंपनी के रूप में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध किया गया है.

पारसा ओपनकास्ट कोयला खदान हसदेव अरण्य नामक बहुत घने जंगल के सबसे बड़े सन्निहित हिस्सों में से एक में स्थित है. इस वन भूमि का क्षेत्रफल 170,000 हेक्टेयर है. इसमें से पहले से ही 841.538 हेक्टेयर उत्पादक वन भूमि, 800 फुटबॉल मैदानों के आकार के बराबर है, जिसमें खनन के लिए मंजूरी दे दी गई है. हसदेव अरण्य में 30 कोल ब्लॉक हैं.

 

इसके पीछे की कहानी

2009 में, पर्यावरण मंत्रालय ने अपने समृद्ध वन क्षेत्र के कारण हसदेव अरण्य को खनन के लिए “नो-गो” क्षेत्र में रखा था. इस दौरान, पर्यावरण मंत्रालय ने इन कोयला क्षेत्रों में स्थित नौ प्रमुख कोयला क्षेत्रों और कोयला ब्लॉकों की जांच की. बाद में उन्होंने क्षेत्रों को “गो” और “नो-गो” के रूप में वर्गीकृत किया, जो इस बात पर आधारित था कि उनके पास अखंडित/बिना वर्गीकृत वाले वन थे. हालांकि, 2011 में, खनन के लिए नो-गो क्षेत्रों के रूप में वर्गीकृत किए गए कोयला ब्लॉकों ने खनन शुरू कर दिया क्योंकि नो-गो और गो पॉलिसी लागू होने में विफल रही. अभी, हसदेव के तट पर दो सक्रिय खदानें मौजूद हैं.

 

राज्य सरकार के पास अभी अंतिम रास्ता बाकी है

15 जनवरी, 2019 को आयोजित FAC की बैठक में कहा गया कि इसने एक विशिष्ट शर्त के तहत सैद्धांतिक मंजूरी देने का फैसला किया है. जिस शर्त पर एफएसी ने जोर दिया है, वह यह है कि राज्य सरकार प्रस्तावित वन भूमि के उत्तरपूर्वी भाग में बहुत घने जंगल की मौजूदगी या अनुपस्थिति की पुन: पुष्टि करेगी. इसके आधार पर दूसरे चरण की मंजूरी दी जाएगी.

वनों के डायरेक्टर जनरल सिद्धांत दास ने इस मुद्दे पर कहा कि परियोजना को पहले चरण  की मंजूरी दे दी गई थी. उन्होंने आगे कहा कि उनकी परिक्षण के दौरान, उन्हें पता चला कि क्षेत्र का एक छोटा हिस्सा बहुत घना जंगल हो सकता है. इस वजह से, उन्होंने राज्य सरकार को इसकी फिर से जाँच करने का सुझाव दिया. राज्य सरकार लंबे समय से इस परियोजना की देखरेख कर रही है. यह भी कहा कि जंगल के किसी भी घने हिस्से में खनन से बचने के लिए, उन्होंने यह सुझाव दिया है.

FAC की बैठक के समय में आगे कहा गया है कि छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त मुख्य सचिव(वन) एक बड़ी समिति के साथ एक लंबी अवधि के लिए एक और साइट का निरीक्षण करना चाहते हैं, लेकिन FAC ने फैसला किया कि एक नई समीक्षा से कोई डेटा दोबारा जांच के लिये मान्य नहीं किया जाएगा. उन्होंने कहा कि कंपनी को पर्यावरणीय मंजूरी और अंतिम रूप से आगे बढ़ने के लिये राज्य सरकार से मंजूरी मिलने के बाद खदान चालू हो सकती है.

 

कौन होगा इसका पीड़ित

यह सच है कि ऐसे घने वन क्षेत्र में खनन के खुलने से वातावरणीय संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के सामाजिक संयोजक आलोक शुक्ला ने कहा कि अगर क्षेत्र में खनन शुरू होता है, तो इससे हाथियों को होने वाले नुकसान के साथ-साथ इलाके में पानी की कमी को भी बढ़ावा मिलेगा. उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्र में आदिवासी पूरी तरह से वन उत्पादित वस्तुओ पर निर्भर हैं, और इसे खनन के साथ बदलने से उन्हें नुकसान होगा. उन्होंने यह भी कहा कि यहां रहने वाली आदिवासी आबादी के बीच वनाधिकार को लागूं करने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है.

 

 

छत्तीसगढ़ के सबसे समृद्ध हसदेव अरण्य वन क्षेत्र में परसा कोल ब्लॉक के लिए अदानी के दवाब में मोदी सरकार की मेहरबानी से ग्रामसभाओं का विरोध, जैव विविधता, हाथियों की आवाजाही, हसदेव नदी का कैचमेंट, लंबित वनाधिकार सहित सघन वन क्षेत्र आदि तथ्यों को नजरअंदाज कर स्टेज 1 स्वीकृति दी गई.

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) की कानूनी शोधकर्ता कांचा कोहली ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हाल ही में सैद्धांतिक स्वीकृति कई कानूनी आवश्यकताओं को पूरा किए बिना दी गई है. उन्होंने आगे कहा कि हसदेव भारत के कुछ अखंडित जंगलों में से एक है, जिसका न केवल पारसा ओपेनकास्ट खानों के लिए बल्कि अन्य आस-पास के खानों के लिए भी उपयोग किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि 2014 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा आवश्यक हसदेव अरण्य के पारिस्थितिक अध्ययन और जैव विविधता का मूल्यांकन अभी भी बाकी है. साइट निरीक्षण ने इन रिपोर्टों को अपनी परीक्षा में शामिल भी नहीं किया है.

 

 

राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) के निदेशक एसएस मीणा ने कहा कि वह दूसरे चरण की वन मंजूरी मिलने के बाद खनन कार्य शुरू कर सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि खनन की आज्ञा/कॉन्ट्रैक्ट आरसीएल को दिया गया है ना की अडानी को.

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